पुस्‍तक मेला- बढ़ते उत्‍सव, सिकुड़ती किताबें (रविवारीय)

लो जी फिर आ गया पुस्‍तक मेला !पिछले तीन बरस वर्ष से हर साल जनवरी में। पिछले कई वर्ष के चित्र दिमाग में छितरा रहे हैं। सर्दियों की गुनगुनी धूप में सुबह ग्‍यारह-बारह बजे प्रगति मैदान में प्रवेश करती भीड़। ज्‍यादतर बच्‍चे, स्‍कूल, कॉलिज के छात्र नौजवान । छुट्टी का दिन हो तो और दस बीस गुना ज्‍यादा। लेकिन यह क्‍या। बच्‍चों , छात्रों ने अपने मम्‍मी-पापा के साथ अंग्रेजी स्‍टॉलों की राह पकड़ ली है, तो कुछ अधेड़, ज्‍यादतर साठ पार बूढ़े हिन्‍दी के हाल की तरफ बढ़ रहे हैं । मानो किसी अदृश्‍य छलनी ने उन्हें अलग अलग रास्ते बता दिए हैं .बहुमत के दबाब में हम भी बढ़ती भीड़ की तरफ चलते हैं। इसलिए भी कि दिल्‍ली के जिस मध्‍यवर्गीय समाज के हम हिस्‍से बन चुके हैं और जिन दोस्‍तों, उन के बच्‍चों को बहला फुसलाकर इस पुस्‍तक मेले के दरवाजे पर लाये हैं , उन सब ने उन्‍हीं स्‍टॉलों पर मिलने का वायदा किया है जहां सिर्फ अंग्रेजी के स्‍टॉल हैं ,कम्‍पयूटर, सीडी, कोर्स मैटिरयल, हों या अंग्रेजी की नावल। मां-बाप भी क्‍या करें। बच्‍चों ने साफ मना कर दिया कि हिन्‍दी के स्‍टॉलों में नहीं जाएंगे। वहां हमारे लिए क्‍या है?
सचमुच ऐसी भीड़ अंग्रेजी के स्‍टॉलों पर कि आप दंग रह जाएं। लगभग छीना झपटी का सा दौर। छुटटी के दिन स्‍टॉल के मालिकों ने दो – तीन गुने नौजवान कर्मचारी बढ़ा लिए हैं। यही दो चार दिन तो होते हैं कमाई के। दिल्‍ली का शायद ही कोई अंग्रेजी प्रकाशक हो जो इस विश्‍व पुस्‍तक मेले में आने को लालायित न रहता हो। इतने ऊंचे किराये-भाड़े के बावजूद भी। रेपिडिक्‍स, अंग्रेजी की डिक्‍शनरी, जी.के. की किताब तो लाखों में बिक जाती है चेतन भगत,अमीष त्रिपाठी से लेकर लखमीर सिंह की कोर्स,कुंजी की किताबें भी. दिन छिपते छिपते आप खुद इन बच्‍चों के चेहरो पर, उतस्व की उमंग देख सकते हैं। दोनों हाथों में चार-चार थैले लटकाए। दिल्‍ली, जयपुर की नकल पर अब ये अंग्रेजी उत्‍सव छोटे शहरों की तरफ भी बढ़ रहे हैं।
पुस्‍तक मेला या उत्‍सव यही तो है।…………………..
लेकिन यह आधा सच भी नहीं है पुस्‍तक मेले के उत्‍सव का।आएये आपको ले चलते हैं हिंदी के पंडालों की तरफ –अपनी माटी,अपना देश अपनी भाषा !मगर हिन्‍दी के पंडालों में सुबह से ही वीरानी छाई है। इसलिए स्‍वयं मालिक प्रकाशक भी दोपहर तक पहुंचते है। शनिवार, रविवार की छुटटी को छोड़कर । जो बड़े-बूढ़े लेखकनुमा झोला लटकाए इधर आ गए थे वे जरूर फेरीवाले की तरह पुस्‍तक मेले को सार्थकता दे रहे हैं। ये शत प्रतिशत लेखक हैं।खुशी में एक दूसरे से गले मिलते सैल्‍फी लेते, फोटो खिंचाते और हां अपनी नयी किताब दिखाते और उसके विमोचन का सबको समय और तारीख नोट कराते। अब पुस्‍तक देने की भी सामर्थ्‍य नहीं बची क्‍योंकि हिंदी प्रकाशक इतनी उदारता से प्रतियां देता नहीं और इतनी ऊंची कीमत पर लेखक नाम का पेंशन विहीन, पंख कटा प्राणी खरीद सकता नहीं। तो लीजिए पुस्‍तक के पहले पन्‍ने पर खड़े खड़े ऑटोग्राफ दे दिए। धन्‍य हैं आप भी, लेखक भी और पुस्‍तक मेला।अंग्रेजी में पाठक ,हिंदी में लेखक .तीस चालीस की उम्र के थोड़े बहुत विश्व विद्यालयों के प्रोफेसरों के झोले ढोते भविष्य में हिदी के भरोशे नौकरी के उमीदवार .
हिन्‍दी स्‍टॉल में असली हलचल शुरू होती है शाम को।सूर्यास्त के करीब. दिन अंग्रेजी का शाम हिंदी की . कभी कभी तो एक ही वक्‍त पर दर्जनों स्‍टॉलों पर एक साथ एक-दो दर्जन लेखकों की अमर कृतियों का विमोचन। स्‍टॉल छोटा है लेकिन लेखकों के प्रशसकों की भीड़ बड़ी। भले ही महज पन्‍द्रह मिनट का मामला हो।अमरता चंद लम्हों की ही होती है ! लेखकों, शुभचिंतकों का गिरोह वक्‍त से पहले आ जमा है- व्‍हाटसअप और दूसरी सूचना क्रांतियो की बदौलत .एक एक दिन के सैंकड़ों बुलावे! कहां जाएं का करी ! इतना महत्‍व तो छेदी लाल लेखक, पाठकों को जमाने ने आज तक नहीं दिया। स्‍टॉल पर खड़े खड़े इस उस से मिलते – जुलते टांगे भी थक गयी हैं लेकिन स्‍टार आलोचक, महान विमोचक अभी तक नहीं पधारे हैं। अब अस्‍सी बर्ष की उम्र पार करने पर तो उन्‍हें ये सम्‍मान और शाल ( जल्‍दी ही दूसरे ज्ञानपीठी पुरस्‍कार) मिलने शुरू हुए हैं और इसलिए हर महान लेखक उन्‍हीं के कर कमलों से ‘विमोचित’ होना चाहता है। जिस इक्‍कीसवे स्‍टॉल पर वे आज विमोचन कर रहें हैं वहां के लोग, लुगाई, लड़कियां उन्‍हें छोड़े तब न। आई.आई.सी. के वे दर्जन भर विश्‍व कवि भी उन्‍हें कहीं नहीं जाने दे रहे। जल्‍दी क्‍या है साहित्‍य का मामला धीरे- धीरे ही चलता है प्रभों! देर से जाने पर कद और ऊंचा होता है .यह वेदिक् परम्परा है .
इंतजार करते करते इस बीच इधर के स्‍टॉल की कुछ भीड , कुछ लेखक झटपट इधर उधर की छोटी दुकानों में पुस्‍तक विमोचन के लिए चले गए हैं। फोटो, सैल्‍फी ही तो होनी है बाकी सब काम तसल्‍ली से फेसबुक कर देगा। अहा! क्‍या लोकतंत्र है सूचना का ! अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का दुनिया में डंका बजाने का! इस बार प्रकाशक ने ऐतिहासिक किताबों की दस प्रतियां ही रखी हैं वो भी विमोचन के हाथों में पकड़ने के लिए। फिर वहीं वापस। दस प्रतियों के दस बार विमोचन हो चुके हैं पुस्‍तक मेले के दस दिनों में। विमोचन के एन वक्‍त प्रकाशक के चेहरे पर कुछ नूर लौटा है वरना सुबह से तो वह मक्‍खी मार रहा था और घाटे का हिसाब लगाते-लगाते डिप्रेसन में था। यहां ज्‍यादा प्रति ले आऊं तो मुफ्त में चली जाती हैं! इन्‍हीं नौटंकियों से हताश-निराश हिन्‍द, मेघा जैसे कई प्रकाशकों ने भाग लेना भी बंद कर दिया है। घाटे का सौदा है हिन्‍दी के लिए! कुछ प्रकाशक अपनी साख और सनद बचने की खातिर आते हैं तो कुछ राजभाषा अधिकारियो से लाइब्रेरी खरीद के आर्डर की उम्मीद में .सबसे घाटे में है मसिजीवी लेखक .उसे न नाम मिला , न नामा .काश इन विमोचनो में अंग्रजी की तरह हज़ारो की भीड़ होती !
लेकिन अदभुत संगम, मिलन स्‍थल है हिन्‍दी लेखकों के लिए पुस्‍तक मेला। इलाहाबाद, मुगलसराय, कटनी, ग्‍वालियर,वनारस, कोलकाता से लेकर जम्‍मू, खुर्जा यानि कि पूरे उत्‍तर भारत ,दूर दराज से . एक से एक अच्‍छी नस्‍ल के घोडों की परेड नुमा .ये लेखक सच्‍चे मायनों में भारतीय भाषाओं के पुरोधा हैं। अफ्रीकी लेखक न्‍यू थ्योंगी के शब्‍दों में ‘किसी भी देश की भाषा बोली, संस्‍कृति इन्‍हीं के भरोसे बची हैं। ‘दिल्‍ली तो सिर्फ तिजारत की जगह है. साहित्‍य का सबसे बड़ा शमशान घाट । यह शहर एक अच्‍छी किताबों की दुकान भी नहीं बचा पाया हिन्‍दी का उतसव तो क्‍या मनायेगा!। सब को पता है चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात। इतनी छोटी होती जा रही है लेखक विरादरी, हिंदी पुस्‍तकों की दुनिया कि डर लगता है.हिन्‍दी पंडाल हिन्‍दी की समूची सिकुड़ती दुनिया का अक्‍स।
माफी! पुस्‍तको की नहीं,सिर्फ हिन्‍दी पुस्‍तकों, साहित्‍य की सिकुड़ती दुनिया! कहानी, उपन्‍याय, नाटक, समीक्षा, आलोचना सभी की। कविता तो बीस-तीस वर्ष पहले ही इस दुनिया को कूच कर गयी है .यकीन नहीं हो तो किसी भी प्रकाशक, पाठक से पूछ लीजिए वह आपकी बात पूरी सुनने से पहले ही दूसरी तरफ मुंह फेर लेगा। लेकिन कवि ह्दय है कि मुह फेरने के बावजूद भी संग्रह छपवायेगा, नाक पर नकद गड्डी मारकर और किसी सरकारी महकमे में हुआ तो घर घर बांटेगा भी ,मिठाई के साथ। उसे महाकवि बनना है अपने को मनवाना है। पढ़ता वह भी नहीं है दूसरों की कविता। उसे अपनी मौलिकता के नष्‍ट होने का डर रहता है।
लेकिन धीरे-धीरे उपन्‍यास, कहानी का साहित्‍य भी टायफाइड का शिकार हो रहा है। यदि जोड़ तोड से कोर्स में नहीं लगी तो 500- 700 का संस्‍करण उसकी अंतिम सीमा है। कुछ वर्ष पहले कम से कम सरकारी खरीद तो थी .कई प्रकाशकों को तो मध्‍यप्रदेश, छत्‍तीसगढ़ की सरकारों और राजा राम मोहन लाइब्रेरी के आर्डरों ने रातों रात करोड़पति अम्‍बानी,अडानी बना दिया अब तो किन्‍हीं दूसरे ‘घूरे’ के दिन फिर रहे हैं जहां शाश्‍वत धर्म, सरस्‍वती , वैदिक काल से खोज खोज कर लायी और छापी जा रही है। महापुरूषों की खोज और उनके साहित्‍य ,विचारों का ऐसा स्‍वर्ण काल भारत में पहले कभी नहीं था। शायद गुप्त काल की वापसी। महानता की शुरूआत।
लेकिन हिन्‍दी पुस्‍तकों की दुनिया में यह सांस्‍कृतिक पतन रातों रात नहीं हुआ। न्‍यायालय की शब्‍दावली में कहा जाए तो सारे आरोप उन्‍हीं पर सिद्ध होते हैं जिनकी इधर उधर घूमती प्रेत छायाओं ने हिन्‍दी पुस्‍तक स्‍टॉलों को शमशान में बदला है। यदि केवल प्रकाशक दोषी होता तो बंगाली, अंग्रेजी के प्रकाशकों पर भी यह आरोप लगता। क्‍यों लोग लौट -लौटकर बंगाल में कोलकाता के पुस्‍तक मेले की तारीफ करते नहीं अघाते? दिल्‍ली का पुस्‍तक मेला तो पिछले तीन वर्ष से वार्षिक हुआ है, कोलकता में तो यह शुरू से ही था। बंगाल के गांव गांव से बसें मुफ्त में चलायी जाती है। प्रवेश भी मुफ्त .फिर दिल्‍ली में क्‍यों नहीं? क्‍या लेखकों ने साहसिक आवाज उठायी? कोलकोता मेले में कहीं लेखक का कोना है ,तो कही पेटिंग्‍स का! नाटक, संगीत ,लिटिल मैगजीन गोष्ठी ,लोक नृत्‍य की ऐसी छटा! सचमुच का उल्‍लास !उत्‍सव! बच्‍चे पूरे वर्ष ‘गुल्‍लक’ में पैसा जमा करते हैं अपनी पसंद की बंगाली किताबें खरीदने को । लगभग सात सौ स्‍टॉलों में नब्‍बे प्रतिशत बंगाली भाषा की होती हैं। इसमें चालीस-पचास प्रकाशक बंगला देश के भी आते हैं। और इतनी सस्‍ती की दुनिया भर में इससे अच्‍छी और सस्‍ती-मौलिक और अनूदित पुस्‍तकें नहीं मिले। हिन्‍दी के भी पांच-सात प्रकाशक कोलकाता पुस्‍तक मेले में होते हैं लेकिन ज्‍यादातर दिल्‍ली और दिल्‍ली की संस्‍कृति लादे ,ऊंची कीमतों वाले। अंग्रेजी का आतंक धीरे-धीरे बढ़ रहा है लेकिन दिल्‍ली के मुकाबले कोसों दूर। अपनी भाषा में पुस्‍तक , संस्‍कृति, संगीत का आनंद दिल्‍ली के दुर्गा पूजा के स्‍टॉलों में आज भी है।
दिल्‍ली के किसी बच्‍चे को हिन्‍दी की किताब के लिए गुल्‍लक में पैसे जोड़ते-सुना है? यदि हो तो गिनीज बुक्‍स उसका फोटो खींचने को तैयार है। तो क्‍या दोष बच्‍चों का है? नयी पीढ़ी का है? सिर्फ प्रकाशकों का है? सिर्फ सरकार का है? नहीं हिन्‍दी समाज और उसके पहरूए बडबोले राजनेताओं और उनके पिछलग्‍गू छाया बने लेखकों, बुद्धिजीवियों का है। जिस बंगाल, मलायम, केरल, महाराष्‍ट्र में पुस्‍तक संस्‍कृति की प्रशंसा करते ज्‍यादातर समझदार लेखक विरादरी नहीं अघाती, उसका शताश अनुकरण भी करती है? हाल ही में किसी बच्‍चे को मैनें हिन्‍दी की किताब, पत्रिकाएं देनी चाहीं, मां-बाप ने बड़े वेमन से रखी” पता नहीं बच्‍चे हिन्‍दी पढ़ते नहीं आजकल!’ एक स्‍कूल के मुख्‍य अतिथि के रूप में बुलावे पर आयोजक का विनम्र सुझाव था- बच्‍चे अंग्रेजी में सुनना पसंद करते हैं।‘ दिन भर शील अश्‍लील खुशर फुसर हिन्‍दी में पर हिन्‍दी की किताब से ऐतराज! शिक्षा संस्‍थान, सरकार, न्‍यायालय से हिन्‍दी गायब होती रही और हम राष्‍ट्रवाद बनाम मार्क्‍सवाद में वक्‍त काटते रहे। समाज के जर्रे-जर्रे में फैले इस आडंबर की अनंत गाथाएं हैं। लेकिन इसमे सबसे कसूरबार वह बुद्धिजीवी, लेखक वर्ग है जिसे तसलीमा नसरीन समाज का ‘चेतना रक्षक’ मानती है। न उसने कभी स्‍कूलों में हिन्‍दी बोलने पर दंड के खिलाफ आवाज उठाई ,न विश्‍वविद्यालयों में अपनी भाषाओं में पढ़ाने की। और तो और कुछ अति भ्रष्‍ट दोगले अंग्रेजी को शेरनी का दूध कह कर महिमा मंडित भी सरेआम करते हैं। बावजूद इसके इन बुद्धिजीवियों को न हिन्‍दी संस्‍थानों के मुखिया पद को हथियाने में शर्म आती न, न सरकार की नकली हिन्‍दी समितियों में सुविधा लेने में । हर सरकारी खरीद में भी इन्‍होंने उन ग्रंथावलियों को भर दिया है जिन्‍हें पिछले बीस-तीस वर्ष में एक भी पाठक ने नहीं पढ़ा।जितनी बड़ी रकम इनकी जेबों में ठूंसी गयी ,उतनी ऊंची किताब की कीमत होती गयी . गरीब हिंदी पाठक से मीलो दूर !लेखको की पुरुष्कार लिप्सा ,राजनेतिक गिरोहबंदी भी कम जिम्मेदार नहीं रही .
इसलिए पुस्‍तक मेला या उत्‍सव सच्‍चे मायने में अंग्रेजी के लिए ही है। नेहरू युग हो, उसके पराभव काल की सरकारें हो या भारतीय संस्‍कृति, राष्‍ट्रवाद की महान अनगूंजों की सरकार। भारतीय भाषाएं तो चेरी की तरह इस उत्‍सव में शामिल होती हें। पिछले कुछ वर्षों के स्‍टॉलों पर नजर दौडाएं तो यह स्‍वयं सिद्ध है। पिछले वर्ष अंग्रेजी के स्‍टॉल 448 थे, और हिन्‍दी के 272, उर्दू के 16 तथा पंजाबी के 10 .बाकी हर भारतीय भाषा का बेमुश्किल एक। तीन प्रतिशत अंग्रजी जानने वालो की बिक्री सत्तर प्रतिश्त !कहाँ है स्वदेशी आन्दोलन,जागरण ,जनवाद ,राष्ट्र गान के गिरोह ? और तो और जिस मैथिली भाषा को संविधान की अनुसूची में शामिल किए पन्‍द्रह वर्ष हो गये उसका एक भी स्‍टॉल नहीं था। कहां मुंह छिपाकर बैठ गए उसके हिमायती ? क्‍या सिर्फ राजनीति के लिए यह था? संविधान में भाषा की राजनीति भोजपुरी, अवधी राजस्‍थानी को शामिल करने की बातें पूरे समाज के लिए आत्‍मघाती कदम ही साबित होगी। सबको अंग्रेजी से एकजुट होकर लड़ना होगा।शहरों से दूर गाँवों में हिंदी पुस्तको का पाठक है और करोड़ों में लेकिन उसे किताब से दूर रखने की हर साजिश रची जा रही है .
एक और खतरनाक पक्ष पिछले वर्षों में हिन्‍दी के स्‍टॉलों में बढ़ा है और वह है धार्मिक, बाबावादी, प्रवचन स्‍टॉलों का। आधे से ज्‍यादा यही हैं और यही थोड़ी बहुत भीड़ . यह देश आगे जा रहा है या पीछे ? विज्ञान प्रसार ,चेतना पूरी तरह नदारत।
हिंगलिश के बूते हिंदी में बेस्ट सेलर की नयी दुकाने खोलने वाले बडबोले लाख दावा करें ,चेतन –संस्कृति के आगे वे कहीं नहीं ठहरते .यह भाषाई , संस्क्क्रितिक अवशाद के क्षण है किसकी शुरुआत अंग्रेजीदां नेहरु के समय ही हो गयी थी .नेहरु भक्त नहीं भूले जो उलाहना नेहरूजी ने महादेवी, निराला को दिया था ‘कि हिंदी में कुछ अच्छा लिखा ही नहीं जा रहा “.आज सब उसी का विस्तार है .इसे किसी सच्चे गाँधी की आवाज़ ही चुनौती दे सकती है .
वक्‍त आ गया है जब पूरा समाज, सरकार, शिक्षा अपनी भाषा के इन प्रश्‍नों पर गंभीरता से विचार करे और इस बार जिस ‘यूरोप के देश’ पुस्‍तक मेले का विशेष आकर्षण है उनसे सीखें। यूरोप के हर देश में कोई शॉपिंग माल ऐसा नहीं होगा जहां उनकी अपनी भाषा में पुस्‍तकों-अखवारों बच्‍चों-बड़ों सभी के लिए कौना न हो। डिजीटल दुनिया के बावजूद दुनिया भर में पुस्‍तके आज भी उसी चाव से पढ़ी जा रही है- वह चाहे कागज पर हों या कम्‍पयूटर, मोबाइल पर. कट्टर राष्‍ट्रवादी या रूढि़वादी मार्क्‍सवाद की आड़ लेकर सिर्फ मोबाइल, कम्‍पयूटर को दोष देकर आप नहीं बच सकते।
पुस्‍तकें बचाना सभ्‍यता बचाना है।

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