पुस्तकें : मेरी दोस्त, मेरा ईश्वर

हमारे होने में मैं की भूमिका कुछ नहीं होती । हम वही होते हैं जैसी परिस्थितियां हमें गढ़ती जाती हैं । अपने मामलों में मुझे लगता है पुस्ततकों ने ज्या दा बड़ी भूमिका निभाई ।

पुस्तक या शब्द को मैं ईश्वर से भी पवित्र और ऊंचे स्थान पर रखता हूं । पुस्तक यानि कि छपे हुए शब्द । वो कागज पर हों या कंप्यूटर की स्क्रीन या आई-पैड पर । दुनिया बदली है और यह बदल रही है तो इन्हीं शब्दों की मार्फत । सुने हुए शब्द की भी मेरे लिए सीमित महत्ता है क्यों कि जितनी आजादी अपने सामने खुली किताब या पृष्ठ से ले सकता हूं उतना किसी और माध्यम से नहीं । यह तो हुई अपने सिद्धांत के दावे की बात । अब मैं लौटना चाहूंगा कि आखिर मैं ऐसा क्यों मानता और समझता हूँ ।

कई बार तो अपने अतीत से डर भी लगने लगता है कि यदि सही किताबों की संगति नहीं मिली होती तो क्या मैं जैसा भी नागरिक हूँ वैसा बन पाता । पश्चिम उत्तर प्रदेश का एक छोटा-सा गॉंव । पांच-सात भाई-बहन । छोटे-मोटे खेती के कामों में जुटे । घर और हमारे घेरों (जहां हमारी भैंस और बैल रहते थे) में करीब आधा मिलोमीटर का अंतर था । घर भी बहुत बड़े नहीं थे । दो छोटे-छोटे कमरे, एक रसोई, एक आंगन । इसलिए दस की उम्र होते-होते हम घेर उर्फ जंगल में रात को सोने लगे थे । तो दिन कहां बीतता ? ज्यादातर जंगल और खेतों के आसपास । नीम के पेड़ के नीचे तो कभी किसी मैदान में बच्चों के साथ कंचे खेलते या कबड्डी और गेंद्दड़ी जैसे खेलों में मस्ती । मेरी उम्र के बच्चों को जानवरों को चराने जाना, उन्हें नहलाना या उनके लिए चारा काटने जैसे छोटे-मोटे काम करने पड़ते थे । ऐसा भी कम नहीं हुआ कि इधर भैंसें चर रही हैं उधर हम पूरे दिन कंचे या ताश खेल रहे हों । फिर इसी बीच में बड़े भाई या मॉं की आवाज आती और हम कंचे छोड़कर काम में जुट जाते । ऐसे किन क्षणों में किताब पढ़ने की आदत बनती गई उसे याद करने की कोशिश कर रहा हूं ।

इसमें कागज के उस टुकड़े का भी हाथ हो सकता है जिस पर रखकर हम पैसे दो पैसे के चने या मुरमुरे, दाल लेते थे । कई बार तो उस आधे पन्ने की कहानी पढ़ते-पढ़ते और भी पढ़ने की उत्सुकता होती । शायद पुस्तकों के प्रति और, और जानने के संस्कार के ये पहले कदम होंगे । हमारे बचपन के आसपास कम-से-कम घर में तो शायद ही कोई किताब थी । पिताजी दिल्ली में एक छोटी-सी नौकरी में थे और हमारी मॉं जो निरक्षर थीं वो हम सबको गांव में खेती, किसानी के साथ रखती थीं । सिर्फ दो अपवादों को छोड़कर ।

एक- जंगल में मेरे दादा जी रहते थे । अपनी उम्र के 40वें वर्ष में उनके पैर को लकवा मार गया था इसलिए वे ज्यादा दूर तक नहीं चल-फिर सकते थे । लाठी के सहारे सौ-दो सौ कदमों तक सीमित रहते थे । शायद इस असहायता ने उन्हें किताबों के नजदीक ला दिया था । एक पुराने से कपड़े में कुछ किताबें बंधी रहती थीं । जिनमें मुझे याद है एक सुख सागर था और एक-आध कुशवाहा कांत आदि के उपन्यांस, कहानी, घर का हकीम, डॉक्टैर जैसी किताबें भी । दोपहर को बाबा को खाना ले जाते थे और बाबा जैसे ही सोने के लिए जाते मैं चुपके से उनकी किताब उठा के नीम के नीचे या बराबर की दूसरी कोठरी में पढ़ने लग जाता । बहुत डरते-डरते । क्योंकि बाबा एक असुरक्षा बोध के नाते हमें किताब नहीं देते थे कि यदि फट गई तो शायद वे और अपाहिज हो जाएंगे । सुख सागर किताब थी भी बड़ी रोचक । मेरे दिमाग में अभी भी धर्म की कुछ चीजें हैं तो उसी की बदौलत जैसे जय और विजय नाम के देवता या राक्षस कैसे अगले जन्म में रावण या कुम्भैकरण बने । राजा परीक्षित की कहानी । सर्प यज्ञ प्रसंग अथवा महाभारत की कथाएं । बेहद सघन रोचकता से बुनी हुई । हिंदी में सचित्र महाभारत की भी किताब इसी बीच बाबाजी के पास आई और उन्होंने तो पता नहीं कितने दिन में पढ़ी लेकिन मैंने बहुत जल्दी खत्म कर ली । संशलिष्ट कथा है । एक-एक चरित्र आगे-पीछे के जन्मों और करमों से जुड़ा हुआ । महाभारत की पूरी कथा का आज तक इतना असर है कि मेरे दिमाग में रामायण कभी प्रवेश नहीं कर पाई । रामायण की कथा के प्रति मैं कभी भी वैसा आसक्त नहीं हुआ जैसा महाभारत या दूसरे उपन्यास या कथाओं से ।

तो जब तक दोपहर के बाद दो तीन बजे थोड़ी दोपहरी कम होने पर हम बच्चे अपनी-अपनी दो तीन भैंस और पड्डे-पड़ियों को लेकर चराने जाते तब तक मैं उन पुस्तकों का भरपूर आनंद लेता । किताबों के इस आनंद से मैं यदि पीछे मुड़कर देखूं, तो कई बीमारियों और बुराईयों से बचा । इस बीच आस-पास फैले बच्चे कोई ताश खेल रहा होता तो कोई कंचे या दूसरी शरारतें । जिसमें मार-पीट झगड़ा, चोरी और दूसरे ऐब-कुटेब भी शामिल हैं । निश्चित रूप से बहुत छोटी उम्र में पुस्तकों ने मुझे इन विकृतियों से दूर रखा ।
हम पांच भाई हैं । दो मुझसे बड़े, दो छोटे । जब मैं छठी क्लास में आ गया तो भैंस चराने आदि का काम छोटे भाइयों ओमा, कांती को मिल गया और हमें तरक्की कराके कुछ दूसरे बड़े काम दे दिये गये जैसे- खेतों में निराई करना, कभी-कभी हल के पीछे गेहूं बोना, बैलों को सानी करना…, फिर हल चलाना । छठी, सातवीं तक आते-आते भैंस दोहना यानि कि दूध निकालना भी आ गया था । गाय बहुत बचपन में थीं लेकिन याद है कि वे दूध कम देती थीं उसकी शैतानियां, मरखनापन ज्यादा मशहूर था । इसलिए बाद के दिनों में गाय कभी नहीं पाली और आज तक मैं यह मानता हूं कि गाय माता भोली नहीं होती । भोली होती है तो भैंस और दूध भी ज्यादा देती है । इतनी सीधी भी कि बचपन में जब वे घास चर रही होती तो हम उसकी पीठ पर बैठने का आनंद ले रहे होते । इतना आनंद कि पीठ पर बैठे-बैठे ही हम पोखर, बम्बें (छोटी नहर) में उसी के साथ प्रवेश कर जाते । जानवरों को तो तैरना ईश्वर ने सि‍खाया होगा लेकिन हमने इन भैंसों के साथ बचपन में तैरना सीख लिया ।

होमवर्क, ट्यूशन, अंग्रेजी सिखाने को हरदम सिर पर सवार मॉ-बाप, शिक्षक के मुकाबले अपना बचपन वाकई कितना अच्छा था । इतनी आजादी ? मनमर्जी करने, खेलने को इतना खुला आसमान । मॉं-बाप अपने-अपने काम-धंधों में व्यस्त । रचनात्मकता के लिये शिक्षाविद इसी स्वातंत्रता की बात करते हैं जो हमारी परिस्थितियों से हमें बिना मांगे खुद मिल गयीं ।

शब्द से जुड़ा एक और प्रसंग यहां बांटना चाहूंगा । उम्र वही रही होगी दस-बारह वर्ष की । सीता राम, सीता राम के गुण गान को हमारे दिमाग में भर दिया गया । पड़ौस के एक मोटे ताजे हनुमान नुमा दामाद थे जो अक्सर अपनी ससुराल यानि कि हमारे गांव में आकर रहते थे । वे दिन भर मुंह से सीता राम, सीता राम जैसे शब्द बुदबुदाते थे । न अपने गांव में कुछ करते थे, न हमारे गांव में । इसके बावजूद भी पूरा गांव उन्हें एक श्रद्धा की दृष्टि से देखता था । ऐसे मौहले में पता नहीं किसने हमें भी एक पुस्ति‍का-सी पकड़ा दी जिसमें सिर्फ सीता राम सीता राम लिखा था । और हम भैंस चराते हुए कभी उसकी पीठ पर बैठे-बैठे या कभी पेड़ के नीचे सीता राम बुदबुदाते । मेरे जीवन में ईश्वर का नाम जो भी दर्ज है, वो उन्हीं दिनों का है । उसके बाद शायद मैं कभी इतना समझदार नहीं हो पाया कि इन शब्दों से प्यार कर पाऊं ।

बाबा जी की पोटली या बंडल में या कहीं और से एक दिन एक और –फटी हुई पुस्तक मिली जो इतिहास की थी । उस पर मेरे पिताजी का नाम लिखा हुआ था । कृष्ण कुमार ! मेरे जेहन में अभी भी उनकी हस्तलिपि अंकित है । पता नहीं क्यों वह ‎किताब मुझे बहुत प्रिय लगने लगी । क्या इसलिए कि उसे मेरे पिताजी ने पढ़ा था जिनका रक्त मेरे अंदर बहता है ? जो भी हो मेरे रक्त में यदि इतिहास घुला है तो उसी किताब की वजह से । नवीं में पढ़ता हूंगा तो हिंद पॉकेट बुक्स द्वारा छपी और मनमथ नाथ गुप्त की लिखी किताब पढ़ने को मिली ‘भारत के क्रांतिकारी’ । शायद मेरे बचपन को इतना किसी किताब ने नहीं बदला होगा, जितना इस किताब ने । तीन-तीन, चार-चार पृष्ठों में देश के हर क्रांतिकारी की दास्तान सरल, रोचक, भाव-भरी भाषा में । चन्द्रशेखर आजाद मूंछों पर ताव देते हुए । भगतसिंह की चमकीली आंखें हैट लगाए । एसेम्बली में बम्ब फोड़ता । 63 दिनों तक भूख हड़ताल के बाद दम तोड़ता जतिन दास । लंदन जाकर सांडर्स की हत्या का बदला लेते मदन लाल ढींगरा । पुलिस की लाठी से लहू-लुहान लाला लाजपत राय और आर्मी की पोशाक के चित्रों के साथ अपने प्रिय हीरो सुभाष चंद्र बोस ।

यदि उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई चल रही होती तो मैं भी इन्हीं के साथ किसी काकोरी कांड में शामिल होता । असफाक उल्ला खान, रामप्रसाद बिसमिल्लक खां, बटुकेश्वसर दत्त—- की सहादत पर लिखे गीत और नज्म न केवल याद हो गये थे मैंने खुद उनमें कई-कई दोहे जोड़ दिये थे । पीछे मुड़कर सोचूं तो इन तुकबंदियों को वर्ष में एक बार निकलने वाली कॉलिज की पत्रिका में जगह मिल सकती थी । लेकिन ऐसा ख्याल दूर-दूर तक भी नहीं आता था । ऐसी समझ भी नहीं थी । पत्रिका में अधिकांश अध्यापक या उनके बेटा-बेटियों की कविताएं, तुकबंदियां छपती थीं । अफसोस कि आगे चलकर इन सभी का लिखने-पढ़ने से एक सामान्य पाठक का भी संबंध नहीं रहा ।

बचपन में ऐसी पुस्तकें कैसे आपको पूरी तरह बदल देती हैं इसका ठीक-ठीक अनुमान कोई भी मेडीकल डॉक्टर या मनोवैज्ञानिक नहीं लगा सकता । मैं ‘भारत के क्रांतिकारी’ पढ़ने में तल्लीन हूं और मॉं और भाई काम के लिए आवाज लगा रहे हैं । मेरे बड़े भाई मुझसे मात्र एक-डेढ़ साल बड़े हैं । लेकिन उनके मुकाबले मेरा स्वास्थ्य बचपन से ही ज्यादा अच्छा और बलिष्ठ । इतना कि झगड़ा वो करके आता और मैं बदला ले के आता । मेरा अमूमन झगड़ा कम ही होता था । या कह सकते हैं मेरी बलिष्ठ ख्याति के चलते कोई हिम्मत ही न करता । चारा काटने की मशीन में वे चारा लगाते और मैं मशीन चलाता । मशीन चलाने में थोड़ी ज्यादा ताकत चाहिए होती है इसलिये । मुझे लगता कि चन्द्र शेखर आजाद और असफाक उल्ला की वीरता की कहानियों से मेरे अंदर ताकत भर रही हैं । यानि पुस्तकों से निकली उर्जा मेरे दिमाग को भी चैतन्य बनाए हुए हैं और मेरे शरीर को भी । दूर-दूर तक थकान का नाम नहीं होता था । क्रांतिकारियों के प्रति मेरी इसी भक्ति ने मुझे चित्र बनाने की प्रेरणा दी । चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, महाराणा प्रताप, सुभाष चन्द्र बोस, विवेकानन्द, शिवाजी के चित्र शुरू में तो मैंने देखकर बनाए उसके बाद तो मैं खड़े-खड़े बनाता और बच्चों को बांट देता । पिताजी ने एक बार दिल्ली से आकर ये चित्र देखे तो अगली बार वे जब भी आते रंगीन पैंसिल ले आते । 21 वर्ष की उम्र में जब तक 1976 के अंत में मैंने गॉंव छोड़ा तब तक ये चित्र मेरे घर, और घेर की दीवारों पर जगह-जगह टंगे थे । कुछ पड़ौसियों के यहां भी । कई चित्रों को मैं दिल्ली भी ले आया लेकिन किराये के छोटे से कमरे की सीमा ने पता नहीं कब उनको कूड़े के हवाले कर दिया किसी को याद नहीं ।

तो मामला नवीं दसवीं तक आते-आते किताबों की तरफ झुक गया था और इसका फायदा भी खूब । अभी तक की यात्रा में किताबों के पढ़ने की वजह से हर बार क्लास में फर्स्ट भी आता रहा । हकीकत यह थी कि हर विषय अच्छा लगता । कहानी भी, कविताएं भी और फिजिक्स, बॉयलॉजी भी । असली संकट दसवीं पास करते ही आया । गणित के अध्यापक ज्योति प्रसाद चाहते थे कि मैं ग्यारहवीं में गणित लूं जबकि पिताजी का आग्रह था कि बॉयलॉजी पढूं । वे डॉक्टर बनाना चाहते थे । उन दिनों एक ही विषय आप चुन सकते थे । नतीजा मैं डॉक्टर भले ही न बन पाया, लेकिन मैंने बॉयलॉजी जरुर पढ़ी । नहीं कह सकता कि मैं कैसा डाक्टर बनता लेकिन न बन पाने का मुझे अफसोस पांच प्रतिशत है, तो संतोष पिचानवे प्रतिशत ।
ग्यारहवीं तक प्रेमचंद, सुदर्शन, वृदावन लाल वर्मा हमारे हाथों तक पहुंच चुके थे । इसका कारण था शुरु में मुकर्रम इंटर कालिज के पुस्तकालय में हफ्ते में एक बार जाकर केवल एक किताब चुनने की आजादी । मन करता था कि कई किताबें ले लूं । लेकिन हफ्ते-दर-हफ्ते के हिसाब से भी न जाने कितनी किताबें पढ़ डालीं । ग्यारहवीं, बारहवीं के दिनों में ही एक आध जासूसी किस्म के से उपन्यास भी । मेरे मित्र (अब स्वर्गीय डॉक्टर विनोद) की संगति में जिनमें इब्नेसफी, राजेन्द्र सिंह बेदी, गुलशन नंदा आदि के नाम याद हैं । कुशवाहा कांत का ‘लाल रेखा’ ने तो पागल ही कर दिया था । लेकिन पुस्तुक का अंतिम पन्ना गायब था । एक से दूसरे स्टॉल पर भागता, पूछता । आखिर उसका अंत पढ़कर ही संतोष मिला । क्या पुस्ताकें पागल भी बना सकती हैं ?

बारहवीं तक पलड़ा इन किताबों और विज्ञान के बीच शायद बराबर का सा हो चुका था । डार्विन का ‎विकासवाद और जैनेटिक्स के पिता ग्रिगोर मेंडल के जैनिटिक्स के प्रयोग आकर्षित करते थे तो प्रेमचंद की मानसरोवर की कहानियां भी । खेतों पर जाकर लगता मटर के जो प्रयोग मेंडेल ने किये हैं मैं भी करूं । यहां विस्तार से विज्ञान के उन प्रयोगों- मेंढक और केंचुए काटने की गुंजाइश नहीं है लेकिन जिंदगी किताबों के उड़न खटोले पर बैठ चुकी थी । इतनी ज्यादा कि जीवन में या तो खेती का काम था या किताबें । आई.आई.टी. और दूसरी प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी में जब अपने आसपास के बच्चों को देखता हूं तो लगता है कि हमने इनका शतांश भी अपनी स्कूगल की किताबों, पाठ्यक्रमों को नहीं पढ़ा होगा । उत्तर प्रदेश बोर्ड में भौतिकी, रसायन विज्ञान का बहुत भारी कोर्स होता है । ढेर सारे ब्यौरे और न्यूमेरिकल के प्रश्न । बारहवीं की परीक्षा में ग्याहरवीं से लेकर बारहवीं तक का सारा पाठ्यक्रम आता था । कैसे भागते-भागते पढ़ते थे ? परीक्षा के दिनों में रात-रात भर लालटेन जलाए प्रश्नों को रटते हुए । इसलिए गॉंव के माहौल में या कहूं ‘अंधों में काना सरदार’ की हैसियत लिये नंबर जो भी आए हों, विज्ञान की वैसी समझ तो नहीं ही आई, जैसी कि मैं आज सोचता हूं, आनी चाहिए थी । बी.एस.सी. में ज्योलॉजी, बॉटनी, कैमिस्ट्री विषय थे और कॉलिज था 16-17 किलोमीटर दूर । एन.आर.ई.सी. कॉलिज खुर्जा । सुबह साईकिल से तो कभी बस से लटककर जाना होता था और शाम तक जल्दी लौटना भी । कुछ खेती की खातिर, कुछ बैल-भैंसों की खातिर । इसलिए उन दिनों भी जो प्रयोगशालाओं में प्रयोग किये, उसे सिर्फ काम चलाने लायक ही कहा जा सकता है । निश्चित रुप से गलती उन प्रध्यापकों की उतनी नहीं थी जितनी कि मेरे जैसे दूर-दूर से आने वाले गॉंव के बच्चों के परिवेश की जिनके दिमाग पर खेती, किसानी के काम ज्यादा हावी रहते हैं और पढ़ने के नाम पर तो सिर्फ परीक्षा के प्रश्न । इस भागती जिन्दगी के बीच मैं कभी अपने कॉलिज के उन खेलों में भी भाग नहीं ले पाता था जिनमें मैं कम-से-कम विश्वविद्यालय के स्तर पर तो कई मेडल जीत ही सकता था । जैसे सभी तरह की दौड़, लम्बी कूद, ऊंची कूद, गोला फैंक, निशाने बाजी । क्योंकि इन खेलों में गॉंव भी मेरा लोहा कुछ-कुछ मानता था । कभी-कभी कबड्डी के साथ-साथ पहलवानी की प्रतियोगिताओं में जरूर भाग लिया था ।

खैर एन.आई.ई.सी. कॉलिज खुर्जा यदि याद आता है तो फिर पुस्तकों के लिए । वर्ष 1973-75 । वे जय प्रकाश आंदोलन के दिन थे । दिनमान, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, नवनीत पहली बार एन.आर.ई.सी. कॉलिज में ही देखीं । पढ़ने की पूरी आजादी था । दिनमान, धर्मयुग के प्रति दिवानगी उन्हीं दिनों बननी शुरु हो गई थी । अब तक सीधे-सीधे किसी गुरु के माध्यम से साहित्य संस्कार नहीं मिले थे । इन्हीं दिनों प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद से लेकर चतुरसेन शास्त्री सबको पढ़ डाला । मुझे याद है रघुबीर शरण मित्र का उपन्यास जो शायद चाणक्य, चन्द्रगुप्त के जीवन पर आधारित है मैंने शाम को पढ़ना शुरु किया और सुबह तक पढ़ते-पढ़ते लालटेन का तेल जब तक खत्म नहीं हो गया, मैं नहीं सो पाया । अखबार भी इसी पुस्तकालय में पहली बार पढ़े । गॉंव में तो अखबार मंगाने या आने का प्रश्न ही नहीं उठता । ज्यूलॉजी, बॉटनी की देसी-विदेशी लेखकों की किताबें भी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध थीं । अपनी विज्ञान ‎पाठ्यक्रम की किताबें लाइब्रेरी से इश्यू कराते, पढ़ते और वापिस कर देते । शायद ही बी.एस.सी. के दिनों की कोई किताब मेरे घर में खरीदी हुई हो । यहीं कभी-कभी कुछ अपराध भी किये । जैसे आईस्टाइन या अपने प्रिय वैज्ञानिकों मैंडेल का फोटो अच्छा लगा तो किताब से फाड़ लिया और किताब चुपचाप वापिस कर दी । अब अहसास होता है कि ये कितना बड़ा दुराचरण था । उसके पीछे के पृष्ठों को तो आगे कोई विद्यार्थी नहीं पढ़ पाया होगा । काश ! उन दिनों फोटो कॉपी आदि उपलब्ध होती या हम इतने बेईमान, नीच नहीं होते ?

तो मित्रों ! बी.एस.सी. करते-करते पलड़ा जे.पी. आंदोलन में राजनैतिक सक्रियता या कह सकते हैं कि नेताई-आवारापन की तरफ झुकने लगा था । जय प्रकाश आंदोलन की सक्रियता ने तरह-तरह की पुस्तकों के प्रति पढ़ने की भूख और पैदा की और इसी भूख पर सवार मैं 1976 के अंत में दिल्ली पहुंच गया ।
दिल्लीं की लाइब्रेरी और किताबें तो मानो मेरा इंतजार ही कर रही थीं । पता नहीं कब कैसे मंडी हाउस पहुंचा हूंगा । न मैंने किसी को गुरू बनाया था न किसी ने मुझे चेला । साहित्य अकादमी के वाचनालय में उन दिनों बेरोक-टोक आवा-जाही थी । दुनिया भर के अखबार ।

हम उन दिनों जमुनापार कृष्णा नगर में रहते थे । एक साथ कई काम जारी थे । मैं दिल्ली प्रशासन की नौकरी में आ गया था । इसके साथ-साथ और भी कई काम चल रहे थे, जैसे सुबह-शाम ट्यूशन पढ़ाना, आई.ए.एस. आदि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के सिलसिले में इधर-उधर की किताबें पढ़ना आदि । इस यात्रा की विधिवत् शुरुआत हुई पुस्ताकालयों से । सबसे नज़दीक थी, शाहदरा मंडी की दिल्ली् पब्लिक लाइब्रेरी । अनाज मंडी के पीछे स्थित इस लाइब्रेरी की मैं जितनी प्रशंसा करूं, कम है । चारों तरफ निम्नर, मध्यकम वर्ग या बनियों, व्यापपारियों की बस्तियों से घिरे इस पुस्तसकालय में ऐसी-ऐसी बेजोड़ किताबें मौजूद थीं- जैसे इमरजेंसी के तत्कायल बाद कुलदीप नैयर की ‘द जजमेंट’, सी.एस. पंडित और अरुणा वासुदेव की इमरजैंसी पर लिखी मशहूर किताबें, चन्द्रशेखर की जेल डायरी, जो अभी-अभी आपातकाल के खत्मं होते ही छपकर आई थी, वे सभी इस लाइब्रेरी में उपलब्ध थीं । लाइब्रेरी घर के नजदीक थी, इसलिए जब मर्जी हो जाओ और किताबें ले आओ । एक कार्ड पर दो किताबें । दिल्ली, पब्लिक लाइब्रेरी ने यदि मैं कहूं कि मानसिक तौर से दिल्ली में जमने में मेरी जितनी मदद की, उतनी किसी और चीज़ ने नहीं । याद करूं तो उस पुस्ताकालय में क्या नहीं था । इतिहास, राजनीति शास्त्रर और साहित्यद की इतनी किताबें, जो सारी उम्र पढ़ने के बाद भी खत्म् न हों । सिर्फ किताबें ही नहीं, 30-40 वर्ष पुरानी पत्रिकाओं धर्मयुग, दिनमान, सारिका के पुराने अंक भी सजिल्द मौजूद थे । ‘क्या पढूं और छोडूं’ वाले अंदाज में जितना पढ़ता, पढ़ने की भूख उससे और तेज़ हो जाती । लाइब्रेरी के कार्ड बनने में भी कोई परेशानी नहीं हुई तो कुछ किताबें घर भी ले जाता । यहीं सरकते-सरकते मैंने दिल्ली के कुछ नौजवानों, बुजुर्ग साहित्यकारों के साथ दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी के एक कक्ष में साहित्य, राजनैतिक और सामाजिक बहसों में शरीक होने की शुरुआत भी की । यानि कि पुस्त्कालय सचमुच का सांस्कृतिक केंद्र था ।

काश ! दिल्ली के विकास में फ्लाई ओवरों की संख्यास, प्राइवेट स्कूीलों की संख्या और सबसे ज़्यादा कारों की संख्या के साथ-साथ दिल्लीं पब्लिक लाइब्रेरी जैसी संस्थाओं का विकास भी होता !
वाकई यह समय यदि संकट का है तो सबसे ज्यादा पठन-पाठन के लिए ही है । दिल्लीं विश्वविद्यालय के कला संकाय पुस्त‍कालय का पत्रिका-कक्ष भी अस्सी के दशक में दुनिया भर की पत्रिकाओं से भरा रहता था । गाज सबसे पहले इसी पर गिरी । कम ही जानते होंगे कि विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतनमान वही हो गए हैं, जो नौकरशाही की किसी भी प्रशासनिक सेवा के हैं । इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन विश्वविद्यालय के इन बुद्धिजीवियों को इस ओर भी देखने की जरूरत होनी चाहिए कि पुस्तनकालयों की क्या दशा-दिशा बनी हुई है । अच्छे पुस्तकालय तो उनके शिक्षण में मदद ही करेंगे । इस शीर्ष विश्वविद्यालय के पत्रिका-कक्ष/जगह तो अभी उतनी ही बड़ी है, लेकिन पत्रिकाएं वहां पुरानी ही रखी हुई हैं । नई के लिए बजट यहां भी घट चुका है । कुछ लोग पठनीयता के तर्क में अच्छी पत्रिका की बजाय सरिता, मुक्ता मंगाने का तर्क देते हैं । मेरा इन पत्रिकाओं से विरोध नहीं है, लेकिन ये तो बाजार में बिखरी पड़ी हैं । पुस्तकालय में इनकी तलाश के लिए कोई नहीं आता । पुस्तकालय विशिष्ट और विरासत में रखने लायक चीजों के लिए जाने जाते हैं । बहुत सारी अकादमियों की स्थापना पचास-साठ के दशक में हमारे तत्का्लीन दूरदर्शी नेताओं ने इसी विरासत के सांस्कृतिक पक्ष को मजबूत करने के लिए की थी । यूरोप, अमेरिका आज शोध और शिक्षा के लिए सर्वश्रेष्ठ जगह हैं तो इन्हीं पुस्तकालयों, संस्थानों की बदौलत ।

जिस दिल्ली को इन्हीं संस्थानों के बूते मैं कहता था कि यदि आपने पुस्तकालयों-विश्वशविद्यालयों समेत इन सांस्कृ्तिक संस्थांनों का फायदा नहीं उठाया तो क्या धूल-धुआं पीने के लिए दिल्ली में डटे हुए हो ? क्या मैं अब भी यह कह सकता हूँ ?

क्या आपको नहीं लगता कि पुस्तनकों के प्रति इस जुड़ाव के पीछे महत्वतपूर्ण कारण अपनी भाषा में पढ़ने का चाव भी रहा हो ? यदि चांट का वह आधा पृष्ठ् अंग्रेजी में लिखा होता तो क्या मैं उसे पढ़ पाता ? क्या सुख सागर किसी विदेशी भाषा में होती तो मैं पढ़ पता ? क्या मेरे स्कूलों में या कॉलिज के दिनों में धर्मयुग और दिनमान, संस्कृत या अंग्रेजी में होती तो मैं घर लाकर रातो-रात पढ़ता ? नहीं । भाषा का महत्व यही है कि वे खुद आपकी उंगली पकड़कर किताबों तक ले जाएं । इसलिए दुनिया भर के भाषाविद, शिक्षाविदों ने बचपन में अपने आसपास, अपनी भाषा में पुस्तजकें उपलब्ध होने की वकालत की है । पिछले दिनों से यदि बच्चे किताबों से दूर हुए हैं उसका एक बहुत बड़ा कारण अपनी भाषा से इतर भाषा में किताबों की मौजूदगी है । माता-पिता स्कूल, कन्वेंटी शिक्षा के दबाव में बच्चों के लिये खरीद तो अंग्रेजी की किताब लेते हैं, लेकिन किताब बच्चों के सपनों में नहीं आती । बल्कि उन्हें डराती है । इतना कि वो सदा के लिए पुस्तकों से दूर होते जाते हैं ।

राजेन्द्र यादव ने एक बार लिखा था कि मेरे जीवन का सबसे भयानक स्वप्न् है कि मैं एक ऐसे कमरे में छोड़ दिया गया हूँ जिसमें कोई किताब ही नहीं है । इस सपने से मुझे भी बहुत डर लगता है कि यदि किताब नहीं होंगी तो कैसे जीवन बीतेगा ? बस दो आंखों की दरकार और है । आंखे और पुस्तकें मिल जाएं तो मुझे जीवन में और कुछ नहीं चाहिए ।

इन्हीं पुस्तकों की रोशनी में मैंने धर्म के असली रूप को जाना । मैं फिर कहता हूँ कि सुना हुआ शब्द‍ तो किसी और की मंशा से निकलता है और उसमें भरे होते हैं उपदेश, बंधन, दबाव, नरक में जाने की धमकियां । जब खुद पढ़ते हैं तो भगवान बुद्ध के सूत्र की तरह अपनी रोशनी खुद बनो यानि कि तुम क्या हो ? क्यों हो ? क्यों हर मनुष्य बराबर है ? इसकी समझ आएगी कि हिंदू हैं या ब्राह्मण या शुद्र यह क्या़ मेरे वश की बात है ? पुस्त्कें बार-बार ये बताती हैं, आगाह करती हैं कि इन बंधनों से मुक्ति उस तर्क से ही मिल सकती है । यूरोप, अमेरिका आज विकास के जिस दौर में पहुंच गये हैं वे इन्हीं पुस्तकों और शिक्षा की बदौलत ।
इस देश की आधी जनता सही मायनों में अभी भी निरक्षर है आधी से ज्यादा शताब्दी आजादी के बीत जाने के बावजूद भी । वक्त आ गया है कि हम अपने संस्थानों की सीमाओं को देखते हुए पुस्तकों और पुस्तकालयों को घर-घर तक पहुंचाएं । यदि पांच वर्ष में भी हम ऐसा कर पाएं तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र सबसे अच्छा लोकतंत्र भी साबित होगा । दिल्ली में एक बार मेरे आसपास पुस्तकें आईं तो आगे चलकर यही पुस्तंकें ओमा शर्मा को भी अर्थशास्त्रम की दुनिया से खींचकर हिंदी साहित्‍य की दुनिया में ले आईं । नौकरी पूरी होने के बाद पिताजी ने भी पुस्तकों का खूब लुत्फ उठाया । पुस्तकों की चर्चा में पिताजी भूले नहीं भूलते । मेरी और ओमा शर्मा के घर में उपलब्ध लगभग सभी हिंदी की किताबें अपनी पिचासी वर्ष की उम्र तक पुस्तकें उनका सबसे बड़ा सहारा रहीं । हरिशंकर परसाई, प्रेमचंद, मैत्रेयी पुष्पा उनके प्रिय लेखक थे । उर्दू की ‘आजकल’ मैं उनके लिये ही लाता था । उर्दू, हिंदी, संस्कृत पर समान अधिकार । दिल्ली में रहकर काम चलाऊ अंग्रेजी भी उन्होंने सीख ली थी ।

मैं किताबों के कितने अहसान मानूं ? किताबों की दुनिया का ही करिश्मा है कि गॉंव में रहते हुए मेरे बड़े भाई साहब की शादी तब हो गयी थी जब वे बारहवीं में थे । उम्र अठारह वर्ष । और मुझसे एक डेढ़ साल जो बड़े थे उनकी 1974 में उम्र 21 वर्ष । मुझे यह बात तब भी विचित्र लगती थी कि यह कोई शादी की उम्र है । और क्या शादी ऐसे होती है कि कोई अभिभावक प्रस्ताव लेकर आये, कुछ इधर-उधर की बातें हों, लेन-देन के हिसाब । मानों किसी भेड़-बकरी से कर दी जाए । लाख दबावों के बावजूद भी केवल पुस्तंकों की दुनिया में ही मुझे ऐसे बेमेल ‘अभिभावकी-विवाह’ जैसे करमों से दूर रखा ।
पुस्तकें कितने रूपों में आपको बदलती हैं !

पुस्तकों के साथ की पूरी यात्रा में कभी-कभी एक अफसोस जुड़ जाता है कि महात्मा गांधी को मैंने इतनी देर से क्यों पढ़ा ? सही मायनों में जब 1996 के शुरू में जब बड़ोदरा तैनाती हुई । अमेरिका में जा बसे वेद मेहता की किताब लाईब्रेरी में मिल गई । आंखों से अपाहिज होने के बावजूद भी वेद मेहता की बहुत नायाब किताब । बलराम नंदा की ‘गांधी के आलोचक’ भी पढ़ी । एक दृष्टि मिली । दरअसल बचपन से जवानी तक की चेतना पर ‘स्वमतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी’ इस हद तक हावी रहे कि गांधी, नेहरू, पटेल तक बहुत बाद में पहुंचा । लेकिन एक बार गांधी की गिरफ्त में आने के बाद हर दिन गांधी को पढ़ने को मन करता है । ‘सत्यं के प्रयोग’, ‘गांधी की आत्म्कथा’ का गद्य विलक्षण ही कहा जाएगा । ऐसी सीधी सरल भाषा, छोटे-छोटे वाक्य और हर बात एक डेढ़ पेज में समाप्ति । मानो कोई ईश्व्र उन पृष्ठों पर आ बैठा हो । किसी भी लेखक के लिए ऐसा गद्य लिखना एक उपलब्धि ही माना जाएगा । दिल्ली‍ में एक पत्रिका मेरे पास आती है पिछले चार-पांच वर्षों से और उसमें ‘सत्य‍ के प्रयोग’ का एक हिस्सा छपता है । यह मुझे और भी अच्छा लगता है क्योंकि एक साथ पूरी किताब पढ़ने के बजाए महात्मा गांधी के जीवन की सादगी, ईमानदारी, रेल यात्रा या ईश्वर और धर्म के बारे में उनका नजरिया आपके मन पर और गहराई से बैठता जाता है । गांधी के ऊपर पिछले दिनों इतिहासकार सुधीर चन्द्र की किताबें भी बहुत यादगार हैं । विशेष रूप से गांधी के अंतिम दिनों की पड़ताल करती ‘गांधी : एक असंभव संभावना’ । फिलवक्त में मुझे गांधी पूरी दुनिया के लिए एक उम्मीद की तरह नजर आते हैं । मैंने गांधी तक पहुंचने की यात्रा के लिए अपने को समझाने के लिए एक सिद्धांत भी गढ़ लिया है । ‘बचपन में हम सब क्रांतिकारी होते हैं । फिर सुभाष, फिर पटेल, फिर नेहरू और अंत में महात्मा गांधी ।’ कोई शक ?

वक्त और उम्र के साथ पसंदीदा विषय बदलते रहे हैं लेकिन बायोग्राफी या जीवनियां सनातन हैं । गांधी, पटेल, नेपोलियन, प्रेमचंद, निराला, स्टी‍फन स्वा’इग, फ्रायड, हिटलर, चर्चिल से लेकर मेरे प्रिय वैज्ञानिक डार्विन, मेंडेल, आइंसटाइन, फैराडे, दौलत सिंह कोठारी, सी.वी.रमन या हाल ही में नोबल से पुरस्कृत वैंकटरमन और कुलदीप नैयर, विनोद मेहता ——-।

इन सभी पुस्त्कों के लिये मेरे छोटे से घर में बड़ी जगह है । दिल्ली में कांती नगर के घर में पुस्तकों की खूब बरक्कमत रहती थी और कला विहार में भी । पत्नी- के शब्दों में- ‘इतनी किताबें लोग किसी फालतू आदमी को ही भेजते होंगे ।’ किताबों का तालाब जब लबालब हो जाता है तो ये किताबें बीच-बीच में गॉव या स्कूल की लाइब्रेरी में भी पहुंच जाती हैं – पत्नी से डरकर ।

किताबों ने मुझे दफ्तर की जिन्दगी में भी बहुत सुकुन दिया है। मुझे लगता है कि जो सरकारी कर्मचारी, दफ्तरों में काम करने वाले, कुछ नहीं पढ़ते तो वे भारत सरकार के शनिवार, इतवार की छुट्टी में क्या करते होंगे ? और बाकी दिनों में भी आप कितने दिन तक रोज-रोज लंच के समय या खाली समय में अपनी और अपनी सहकर्मियों की सीनियरटी, पोस्टिंग बतियाते रहेंगे ? दफ्तर के जिस भी कक्ष में जाएं उनसे बातचीत की शुरूआत और अंत किसी सहकर्मी की पोस्टिंग या चुगली को लेकर ही होता है ।

इसी बीच बच्चों की पढ़ाई से गुजरते हुए ‘शिक्षा’ भी मेरी प्रिय पुस्तचकों में शामिल होती गईं हैं । जॉन हाल्ट की कई किताबें ‘बच्चे असफल क्यों होते हैं’, कृष्ण कुमार की ‘गुलामी की भाषा’, गीजू भाई, अनिल सदगोपाल की किताबें, ए.एस. नील की ‘समर हिल’, आदि दर्जनों किताबें मेरे घरेलू पुस्तीकालय का हिस्सा बन चुकी हैं । प्रेमचंद, निराला, दिनकर, अज्ञेय, राम विलास शर्मा, राजेन्द्र यादव से लेकर नयी पीढ़ी के कई लेखकों की किताबें तो हैं ही । मेरे घर पांच-सात किताबें तो ऐसी भी हैं जो शायद शादी के वक्त किसी ने भेंट कीं लेकिन अभी तक नहीं पढ़ पाया । विमल मित्र की ‘खरीदी कोडि़यों के मोल’, रवीन्द्र नाथ ठाकुर की कहानियों और उपन्यालस का सेट, टॉलस्टाय का ‘वार एंड पीस’ दोस्‍तोवस्की का ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ । दिल्ली और नौकरी के समय की आपा-धापी में मैं इन किताबों को ललचाई नजरों से देखता रहता हूं और उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब सरकारी नौकरी से रिटायर हो जाऊंगा । और भी लम्बी लिस्टन है जो मुझे पढ़नी है । कभी कोई ऐसा प्रश्न जब उछालता है कि रिटायरमेंट के बाद आप क्या करेंगे तो मेरा जवाब होता है कि कम-से-कम पचास वर्ष तक तो मुझे पुस्तकों से फुरसत नहीं मिलेगी । यह भी जोड़ते हुए कि मेरा जन्म खेतों में जरूर हुआ मुझे मोक्ष तो पुस्तकालय में ही मिलेगा । इसीलिये मेरे लिए पुस्तक ईश्व‍र से भी बड़ा सच है ।

 

दिनांक : 28/08/12

One thought on “पुस्तकें : मेरी दोस्त, मेरा ईश्वर”

  1. bahut he dil chast kahani he . mujhe yeh bahut pasand aiye. aise he likh teh rahiye kahaniya…………………

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