परीक्षाओं के घोटाले (दैनिक जागरण)

शायद ही कोई दिन खाली जाता हो, जब देश में चल रही परीक्षाओं में कोई न कोई घोटाला सामने न आता हो। पिछले दिनों दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के स्‍कूल आफ ओपन लर्निंग के कई पेपर एक के बाद एक लीक होते रहे। ठीक इसी वक्‍त मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में हुई धांधली का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने है, जिस पर अगली सुनवाई जल्‍दी ही होनी है। मध्‍य प्रदेश के व्‍यापम घोटाले के बारे में पूरा देश जानता है कि कैसे वर्षों से मेडिकल कॉलेजों की सीटें भरी जाती थी। बेईमानी की एक से एक नयी युक्तियाँ सामने आ रही हैं। कभी पर्चा लीक होता है तो कभी उत्‍तर पुस्तिका खाली छोड़ दी जाती है, जिसे मनमर्जी भरकर धांधली करायी जा सके। दो वर्ष पहले एम्‍स और चंडीगढ़ की डाक्‍टरी की स्‍नाकोत्‍तर परीक्षा में ब्‍लूटूथ और आई.टी. के नये औजारों के प्रयोग के मामले सामने आये थे। आखिर यह सब कब तक होता रहेगा? नयी पीढ़ी की आस्‍था शिक्षण,शोध, मेहनत,  नैतिकता जैसे शब्‍दों पर कैसे टिकेगी? क्‍या दुनिया भर में सबसे नौजवान भारतीय परीक्षाओं में ऐसे घोटालों के आरोपों के चलते अपनी प्रतिभा और मेहनत के बूते अपेक्षित सम्‍मान हासिल कर पायेंगे? क्‍या इतने बड़े देश के इतने संसाधन इतनीसी समस्‍या के आगे असहाय हो चुके हैं?

वक्‍त आ गया है, जब केंद्र सरकार सख्‍त से सख्‍त कानून बनाकर हस्‍तक्षेप करे। शिक्षा भले ही राज्‍यों की समवर्ती सूची का विषय हो, यदि उससे पूरे देश की शिक्षा व्‍यवस्‍था चौपट हो रही है तो केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकता। पिछले दिनों दसवीं, बारहवीं की बोर्ड की परीक्षाओं में बिहार, उत्‍तर प्रदेश की तस्‍वीरें आपने देखी होंगी कि कैसे पूरा तंत्र इस नकल और धांधली में लिप्‍त था। अफसोस की बात यह है कि देश के कुछ राजनेता तक वोट की खातिर शिक्षा की इन बुराइयों को दशकों से बढ़ावा दे रहे हैं। हर बार, मीडिया अपनी भूमिका निभाता है, पूरे षडयंत्र पर उंगली उठाता है लेकिन शासन के कान पर जूं नहीं रेंगती। दंभ में डूबे राजनेता और छाती ठोककर खुलेआम नकल का वादा करते हैं। शायद, इसी के चलते पिछले दस वर्षों में भारतीय शिक्षा संस्‍थान दुनियाभर के विश्‍वविद्यालयों के बीच न पहले दो सौ में रहे न पांच सौ में। क्‍या परीक्षा आयोजित कराने के लिये भी विदेशी कंपनियों को लगाने की जरूरत है?

क्‍या इंजीनियरिंग, डाक्‍टरी या दूसरी परीक्षाओं में रोजरोज बढ़ती ऐसी घटनाएं नकल और बेईमानी की इन्‍हीं प्रवृत्तियों का विस्‍तार नहीं है? जिस नकल के बूते दसवीं, बारहवीं की परीक्षाएं इन्‍होंने पास की हैं, लगभग उन्‍हीं को वे अगली प्रतियोगी परीक्षाओं में आजमाते हैं। व्‍यवस्‍था की कमजोरी यही है कि इनमें लिप्‍त अपराधियों को कड़ा और अनुकरणीय दंड नहीं मिलता, वरना पिछले दशकों में ऐसी घटनाओं की ऐसी बाढ़ नहीं आयी होती कि दिल्‍ली में सर्वोच्‍च न्‍यायालय से लेकर देश के कई न्‍यायालयों में ऐसे घोटालों के सैंकड़ों मामले लंबित पड़े हैं।

बहुत दिन नहीं बीते, जब प्रबंधन के आईआईएम में दाखिले की कैट परीक्षा में धांधली का मामला सामने आया था। अपराधी था, नालंदा का रंजीत सिंह डॉन। वह था तो ऐसे ही घोटाले से परीक्षा पास कर बना डॉक्‍टर, लेकिन बैंक, इं‍जीनियरिंग, डॉक्‍टरी समेत सभी परीक्षाओं में धांधली बिल्‍कुल समाजवादी अंदाज में करता था। पकड़ा तो गया लेकिन काश व्‍यवस्‍था ऐसा दंड देती कि पूरे देश में संदेश जाता तो फिर किसी की हिम्‍मत नहीं होती। ऐसा नहीं है कि सब अपराधी बच जाते हों, देर सबेर कुछ पकड़ में आते ही हैं। हरियाणा के पूर्व मुख्‍यमंत्री चौटाला, शिक्षकों की भर्ती के घोटाले में एक वरिष्‍ठ प्रशासनिक अधिकारी के साथ सजा भुगत रहे हैं। लेकिन, इन अपराधियों में न्‍यायव्‍यवस्‍था ऐसा भय नहीं पैदा कर पायी कि ये फिर से ऐसी जुर्रत न करें।

कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने ऐसा समाज बनाया है, जहां नकल, चोरी, धांधली जैसी वारदातों को अपराध ही नहीं माना जाता हो। याद कीजिये, पिछले वर्ष कुछ शब्‍दों की चोरी के आरोप में प्रसिद्ध भारतीय पत्रकार जकारिया को अमेरिकी टाइम पत्रिका ने तुरंत तलब किया था और संतुष्‍ट न होने तक उनके सभी प्रकाशनों, प्रसारणों पर प्रतिबंध लगा दिया था। दुनिया भर के प्रसिद्ध शिक्षण संस्‍थानों में ऐसे साफ्टवेयर हैं, जहां शोध आदि में एक शब्‍द भी चोरी नहीं कर सकते हैं। और एक हमारे विश्‍वविद्यालय हैं, जहां पूरे के पूरे शोध प्रबंध ही उड़ा लिये जाते हैं। पिछले दिनों में उत्‍तरपूर्व के एक फर्जी विश्‍वविद्यालय द्वारा एक वर्ष में तीन सौ से ज्‍यादा पीएचडी की डिग्री देने की खबर तो शायद दुनिया भर के शोध के इतिहास में अनोखी हो। और तो और दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के पिछले उप कुलपति भी वन‍स्‍पति शास्‍त्र के एक शोधपत्र के आरोप में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के सामने सफाई दे रहे हैं। जब इसी के बूते इन्‍हें नौकरियां मिलती हो, ये प्रोफेसर और वाइस चांसलर बनते हों, तब इनसे शिक्षा में सुधार की उम्‍मीद कौनसा समाज कर सकता है? पिछले हफ्ते की इतनी ही भयानक खबर थी कि दक्षिण भारत में एक न्‍यायाधीश नकल करते पकड़े गये थे। उस खबर को भी जनता नहीं भूली होगी, जब दिल्‍ली में बैठे एक पुलिस अधिकारी की पत्‍नी ने बिना बिहार जाये ही एम ए की परीक्षा पास कर ली थी। कुछ दिन या कहिये कुछ घंटे शोर मचता है और फिर बेताल ताल पर। क्‍या येन केन डिग्री हासिल करना ही शिक्षा का मकसद रह गया है? और जब शीर्ष पर बैठे कर्णधार भी उसमें लिप्‍त हों तो अव्‍यवस्‍था के अंधेरे की कल्‍पना की जा सकती है? दिल्‍ली के एक मंत्री की डिग्रियों का मामला भी इसी कड़ी का उदाहरण है।

संघ लोक सेवा आयोग, आई आई टी जैसी एकाध परीक्षा जरूर उम्‍मीद जगाती है। ऐसा नहीं कि इनमें सेंध लगाने की कोशिश नहीं हुई लेकिन समय रहते उन पर काबू पा लिया गया है। सूचना प्रौद्योगिकी का जिस तेजी से विस्‍तार हो रहा है और ठग जितने चुस्‍तदुरूस्‍त हैं, व्‍यवस्‍था को भी उतनी चुस्‍ती से उसका मुकाबला करना होगा। इसमें सबसे महत्‍वपूर्ण है, कड़े से कड़े दंड की व्‍यवस्‍था।

एक और महत्‍वपूर्ण पक्ष पर विचार करने की जरूरत है और वह है आखिर बारबार इतनी परीक्षाएं क्‍यों? क्‍यों दिल्‍ली या दूसरे विश्‍वविद्यालय ऐसी व्‍यवस्‍था नहीं बनाते कि स्‍नातकोत्‍तर या दूसरे पाठ्यक्रमों में प्रवेश स्‍नातक परीक्षा के आधार पर हो और स्‍नातक में बारहवीं के बोर्ड से । तमिलनाडु सरकार इंजीनियरिंग में दाखिले तमिलनाडु बोर्ड की परीक्षा के आधार पर कर रही है और कई वर्ष से परिणाम बहुत अच्‍छे रहे हैं। बारहवीं की परीक्षा का परिणाम अभी आया है कि इंजीनियरिंग, डाक्‍टरी में प्रवेश परीक्षा का तनाव फिर शुरू। क्‍या शिक्षा का अर्थ केवल परीक्षा या कॉपी जांचना ही रह गया है? इन प्रश्‍नों को बहुत लम्‍बे समय तक नहीं टाला जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के हस्‍तक्षेप के बाद तो पूरी व्‍यवस्‍था को जागना चाहिए।

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