पत्रिका, प्रजातंत्र और पाठक

मुझे यकीन है इस संकट से कुछ लोग रोज गुजरते होंगे, बल्कि मुझसे भी ज्‍यादा ।  डाकिए को देखते ही मेरी ऑंखें चमकने लगती है । ईमेल,फैक्‍स की सूचना-क्रांति के बावजूद डाकिया मुझे देवदूत-सा लगता है,क्‍योंकि जो चीज वह लाता है उसका विकल्‍प नहीं हो सकता,यानि पत्र,पत्रिकाएं,अखबार,किताबें ।  देश के हर हिस्‍से से ।  लेकिन आजकल कभी-कभी यही पत्रिकाएं मेरे अंदर एक अपराध-बोध भरने लगी हैं ।  इन्‍हें पूरी तरह से न पढ़ पाने का अपराध-बोध ।

औसतन एक-दो पत्रिकाऍं रोज आती होंगी ।  मध्‍यप्रदेश,बिहार,दिल्‍ली से ज्‍यादा ।  जलती-बुझती करीब 100  पत्रिकाओं की सूची पते-सहित एक पत्रिका में दी हुई है । सभी सुरुचिपूर्ण हैं ।  अच्‍छे साहित्‍य,अच्‍छे विचार को बढ़ाने वाली हैं ।  सामाजिक परिवर्तन को प्रतिबद्ध ।  सभी के घोषित उद्देश्‍य भी लगभग एक ही हैं,उसे कहा चाहे किन्‍हीं भी शब्‍दों में गया हो ।  यहां तक कि सभी की परेशानियां भी एक-सी हैं । आर्थिक अभाव,अच्‍छी रचनाओं का न मिलना,पाठकों की चुप्‍पी,खेमेबाजी का रोना,प्रचार-प्रसार की समस्‍या——- ।

मुश्किल कई स्‍तरों पर है । जब तक एक पत्रिका पूरी पलटी भी नहीं कि दूसरी,तिमाही भी आ गई ।  बीच-बीच में विशेषांक, महाविशेषांक भी । इन पत्रिकाओं को आप मेरी सहेली,माया,फेमिना के अंदाज में पलटकर आगे नहीं बढ़ सकते और पूरा पढ़ने को बहुत वक्‍त चाहिए ।  नतीजा – पहले मेज पर चट्टा लगता जाता है ।  फुरसत के क्षणों के इंतजार के लिए कि गहरे तभी डूबूँगा । लेकिन ज्‍यादातर कामकाजी लेखकों को इतने गहरे डूबने का वक्‍त कहां ।  कुछ दिनों बाद ये सुरक्षित अटारी में पहुंच जाती हैं कि इतनी अमूल्‍य सामग्री कहां मिलेगी ।  किसी को दे भी नहीं पाते । न जाने कब जरूरत पड़ जाए ।  हम सभी के घरों में इन पत्रिकाओं ने जगह का संकट पैदा कर दिया है ।  न पूरा पढ़ पाते हैं,न उनसे मुक्‍त हो पाते ।

इस दबाव में ज्‍यादातर होता यह है कि हम सिर्फ नाम और उनके आगे लिखे शीर्षक से आगे नहीं जा पाते । मानो नाम देखना-दिखाना मात्र ही अध्‍ययन,अभिव्‍यक्ति का पर्याय हो ।  और फिर वही होता है जो इन स्थितियों में हो सकता है ।  मित्र उत्‍साह से उम्‍मीद करेंगे आपकी प्रतिक्रिया की अपने लेख पर,जिस पर उन्‍होंने वाकई इतनी मेहनत की है और आपकी चुप्‍पी देखकर निश्चित रूप से उनकी रचनात्‍मकता को धक्‍का लगेगा ।  पत्रिका,लेखन के प्रति पूरी सहानुभूति,सदाशयता के बावजूद एक दंश बना रहता है ।

अन्‍य भाषाओं के बारे में मेरी जानकारी इतनी नहीं है,लेकिन अंग्रेजी के मुकाबले इन हिन्‍दी  पत्रिकाओं की संख्‍या चकित करने वाली है ।  लगभग हर छोटे-बड़े शहर से निकल रही हैं ।  कई शहरों की तो गलियों तक से । अलग गली,अलग पत्रिका ।  संपादन-मंडल के सदस्‍यों में जरा-सी वैचारिक भिन्‍नता हुई नहीं,समझ का अंतर आया नहीं कि एक और पत्रिका की घोषणा ।  यहीं कुछ ठहरकर सोचने की वाकई जरूरत है । क्‍या जनतंत्र महज दीवार पर टँगा रहने वाला शब्‍द है या उसे हमारी जिंदगी में भी कोई जगह देने की जरूरत है  जब एक मॉं के जाये दो भाई एक नहीं हो सकते तो विचारधारा शत-प्रतिशत कैसे हो सकती है  और ऐसी उम्‍मीद करनी भी क्‍यों चाहिए ? यह देश तो वैसे भी बहुलतावादी है । लेकिननहीं, हम इस वैचारिक बहुलता को फूटी आंख भी नहीं देख सकते और खुन्‍नस में फिर एक और पत्रिका । बिना इस बात की चिंता किए कि वह कितनीपढ़ी जाती है ।  पत्रिका निकालना इतना आसानकाम नहीं है,लेकिन हठ की हद तक पहुँचने के बाद रास्‍ता ही क्‍या बचता है ?

यों किसी भी नई पत्रिका का निकलना एक आनंद की अनुभूतिदेता है । ज्‍यादा पत्रिकाएं होंगी,ज्‍यादा लेखकों को मौका मिलेगा,ज्‍यादा विविध सामग्री दिखेगी । लेकिन जब तक इसमेंज्‍यादा पाठकों का पक्ष ध्‍यान में नहीं रखा जाता,तब तक लेखक,पत्रिका या विचार,उस सँकरीगली से बाहर नहीं पा पाता और इसीलिए हिन्‍दी -लेखक एक गुमनाम प्राणी होता जा रहा है । लेखक ही लेखक को जानता है ।  धर्मयुग,साप्‍ताहिक हिंदुस्‍तान,दिनमान के बाद तो और भी भयानक रूप से । कभी सॉंचा,दूसरा शनिवार,सामयिक वार्ता या समयांतर समेतदर्जनोंपत्रिकाएं सभी ऐसे ही प्रयासों की कड़ी हैं । नतीजतनलेखक ही लेखककोपढ़ रहे हैं ।  नया पाठक बहुत कम जुड़ रहा है ।  मैंने लेखक-बिरादरी में नए-नए शामिल एक  मित्र से कहा इस पत्रिका के सदस्‍य बन जाओ ।बोले ‘ सभी तो एक-जैसी हैं ।  मेरे पास यह आती है,वह आती है,इन्‍हें ही नहीं पढ़ पाते हैं ।  लगभग वैसा ही संकट जो मेरे सामने है । लेकिनसब एक-जैसी हैंमेरेदिमाग पर चिपक गया ।  हमेंगंभीरता से इस राय को तवज्‍जो देनी ही होगी ।  इस पाठक को उस उदासीनता से दूर रखने के लिए जो भारतीय वोटर में है । क्‍या देनावोट,सब पार्टियॉं एक-जैसी ही तो हैं ।

केवल राजनीतिकबहसों में ही नहीं,सांस्‍कृतिक,साहित्यिक मशक्‍कतोंमें भी तीसरी धारा या वाम राजनीति के टुकड़ों-टुकड़ों में बँटने का रोना रोया जाता है – जब विचाराधाराएकहै तो इतनी पार्टियॉं बनाने की क्‍या जरूरत है ? क्‍यों नहीं एक हो जाते,राष्‍ट्रीय स्‍तर पर न सही,  राज्‍य-स्‍तर पर ही सही ।  दशकों से यह अपील हम लेखक,बुद्धिजीवी कर रहे हैं,लेकिन क्‍या हमें इसी अपील की जरूरत पत्रिकाओं के संबंध में अपने लिए जरूरी नहीं लगती,एक सामूहिक प्रयास,एकजुटता की । बात भी दूर तक पहुँचेगी,श्रमभी बचेगा,बशर्ते कि हम विचार को दूर तक पहुँचाना चाहते हों,अपनेनामको नहीं ।

एक पक्ष और भी है । सैकड़ों विचार हैं इन पत्रिकाओंमें ।  दलित,स्‍त्री,असमानता,गरीबी,सांप्रदायिकता,हिंसा,नई सदी से लेकर अंतर्राष्‍ट्रीय समस्‍याओं तक । लेकिनव्‍यवहार में उनकाप्रयोग कम से कमतर होता जा रहा है ।  यह प्रश्‍न इन विचारोंकेप्रति और भी उदासीन बनाने की कोशिश करता है कि जो हम पहले से ही जानतेहैं । जब उन्‍हें ही कार्यान्वित नहींकर पा रहे हैं तो और जानकर क्‍या करेंगे ?  इसे निराशावाद मान सकते हैं लेकिन इसी में उम्‍मीद की किरण यह है कि अब कुछ करने की तरफ भी बढ़ा जाए । …सामाजिक सक्रियता की तरफ ।  वैचारिक बहसें,जुगाली तो बहुत हो गई ।  इससे आगे तो सिर्फ लकुआमारेजानेका डर है ।  शायद इसी पक्ष की ओर हरित क्रांति के प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्‍वामीनाथन ने इशारा किया है….. ‘ पैरालैसिस बाई अनालैसिस । विश्‍लेषण दर विश्‍लेषण करते –करते पगला जाना ।

क्‍या आपको नहीं लगता कि इस गुंजलके से बाहर आने के लिए हम सबको मिल-बैठकर सोचने की जरूरत है ? जब तक पाठकों का विस्‍तार नहीं होता,पत्रिकाओं की संख्‍या का कोई अर्थ नहीं है ।  देशहित में कागज तो बचेगा ही,विचारधारा के जनतंत्र में जीने की आदत भी पड़ेगी । आखिर हम हैं भी तो दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र के नागरिक ।

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