पढ़ने-पढ़ाने का माध्यम

एनसीईआरटी ने समझ का माध्यम पर राष्ट्रीय बहस, विचार विमर्श की शुरूआत कर शिक्षा के संदर्भ में बहुत सार्थक पहल की है। वास्तव में सही शिक्षा वही मानी जा सकती है जो समझ का विकास करे और समझ के लिए भाषा सबसे महत्वपूर्ण औजार है। यानि कि अगर अपनी भाषा में पढ़ाई-लिखाई हो तो पढ़ने का आनंद तो आता ही है अपने परिवेश, ज्ञान, विज्ञान की सच्ची समझ भी इसी रास्ते आती है। दुनिया के हर बड़े चिंतक, मनीषियों और शिक्षाविदों ने बार-बार यही बात कही है। महात्मा गाँधी, रविंद्र नाथ टैगोर, गीजू भाई पटेल, जॉन होल्ट तो अपनी भाषा के हिमायती रहे ही हैं, आधुनिक चिंतकों में प्रोफेसर यशपाल, कृष्णकुमार, रोहित धनकर बराबर इन मुद्दों पर लिखते रहे हैं । हाँ यह अवश्य है कि एनसीईआरटी के बैनर के नीचे राष्ट्रव्यापी शुरुआत आजादी के बाद पहली बार हो रही है।

मैं अपनी बात कुछ अनुभवों को सामने रखकर स्पष्ट करना चाहूँगा। मैं अपने पड़ोस में एक ऐसे बच्चे को जानता हूँ जिसे बहुत सिफारिशों के बाद एक निजी स्कूल (मुझे निजी स्कूलों को पब्लिक स्कूल कहना बेमानी लगता है) में दाखिला मिल पाया। लेकिन अफसोसजनक स्थिति यह रही कि कई साल के धैर्य के बावजूद बच्चे की पढ़ाई-लिखाई, या स्कूल में रुचि की प्रगति संतोषजनक नहीं थी। नवीं तक आते-आते बच्चा फेल होने के कगार पर आ गया। मैं भी इस दौरान दो-चार बार स्कूल गया अध्यापकों से बात की, लेकिन बात नहीं बनी । कारण जो समझ में आया वह यह था कि दिल्ली के निन्यानवें प्रतिशत निजी स्कूलों की तर्ज पर स्कूल का माध्यम अंग्रेजी है और बच्चा अंग्रेजी ठीक ढंग से न तो समझ पाता है, न अपनी बात कह पाता है। मैं बच्चे से बार-बार एक ही बात पूछता था कि क्या तुम क्लास में कोई प्रश्न पूछते हो ? मेरे बार-बार उकसाने के बावजूद भी और शिक्षकों को विशेष रूप से प्रश्न पूछने की ओर ध्यान दिलाने के बावजूद भी बच्चे में वह हिम्मत, आत्मविश्वास नहीं बन पा रहा था कि यदि कोई बात समझ में न आए तो उसे वह अध्यापक से पूछे । निजी स्कूल हों या देश के ज्यादातर सरकारी स्कूल, उनकी शिक्षा-पद्धति में प्रश्न पूछने को कभी प्रोत्साहित नहीं किया जाता । शायद हमारे धर्म या संस्कारों में भी ऐसा कुछ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष गोद दिया जाता है कि बड़ों के सामने प्रश्न नहीं करते । शायद बड़ों का नाम न लेना जैसे स्त्रियाँ कम-से-कम हिन्दी पट्टी में अपने पति का नाम नहीं लेतीं, इसी बीमारी के लक्षण हैं । यानि बड़ों, सम्माननीयों ने, स्कूल के अर्थ में शिक्षक, गुरूजी, सर ने जो कह दिया, बस वही ठीक है। कहीं आगे चलकर नौकरशाही की ‘यश सर’ इसी का विस्तार तो नहीं है। बच्चे साल दर साल बहुत गंभीरता से मूर्ति बने प्रवचन सुनते रहेंगे लेकिन क्लास के तुरंत बाद उनकी खुसर-फुसर, बातचीत और ठहाके ये बताते हैं कि कितनी बंदिशों में उन्होंने स्कूल में समय बिताया है। रविंद्र नाथ टैगोर ने शायद इसी पक्ष को रेखांकित करते हुए कहा था, ‘बच्चे सरस्वती के मन्दिर में मजदूरी करते हुए अपना बचपन बिता देते हैं। ‘

खैर, मैं लौटकर अपनी बात पर आता हूँ। ऐसा बच्चा जो न प्रश्न पूछ सकता है और न क्लास में बोल सकता है वह धीरे-धीरे पिछड़ता तो जाएगा ही, ऐसे गड्ढे में धकेल दिया जाएगा कि स्कूल या शिक्षा से बाहर ही हो जाये । निजी स्कूली संस्थाओं में शायद ही किसी के पास इतना धैर्य हो कि वह ऐसे पिछड़ते बच्चे की तरफ ध्यान दें ! वैसे यह स्थिति समाज के सभी हिस्सों में एक सी है । शायद ही कोई मदद के लिए गुहार लगाते विकलांग हाथों की तरफ देखने की कोशिश करता हो । फिर स्कूल, शिक्षकों का भी यह कोई अनोखा अपराध नहीं है । इन स्थितियों में गणित और विज्ञान में बच्चे की स्थिति ज्यादा कमजोर बनी हुई थी । अच्छी तो सामाजिक विज्ञान और अंग्रेजी में भी नहीं थी लेकिन, हिन्दी में ठीक अंक मिल रहे थे क्योंकि यह उसके घर पर अपेक्षाकृत कम पढ़े-लिखे माँ-बाप, समाज की भाषा थी ।
मुझे एक तरकीब सूझी । मुझे लगा कि यदि इस बच्चे को इस निजी तथाकथित प्रसिध्द स्कूल से निकालकर दिल्ली के सरकारी स्कूल में दाखिल करा दिया जाए जहाँ पढ़ाई का माध्यम अपनी भाषा यानि हिन्दी होती है तो शायद बात बन जाए । सात-आठ किमी दूर आने-जाने का समय और फीस तो बचेगी ही ।

मेरी अपनी जिंदगी के अनुभव भी बहुत अलग नहीं रहे । अंग्रेजी में प्रश्न पूछना ग्रामीण परिवेश से आए लगभग सभी बच्चों के लिए समुद्र पार करने जैसा होता है । मुझे यह भी लगा कि मौजूदा वक्त की दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे लगभग ऐसी गरीब पृष्ठभूमि से आते हैं जहाँ पहुँचकर यह बच्चा भाषा, परिवेश के साथ कुछ अपनापन महसूस करेगा । मैंने उसे उस स्कूल से निकालने का सुझाव दिया तो पहले तो माँ-बाप बिल्कुल तैयार ही नहीं हुए । कुछ दिनों के बाद वे तैयार भी हुए तो उनके अड़ोस-पड़ोस के ऐसे ही माँ-बाप ने उन्हें डरा दिया कि सरकारी स्कूल भी कोई स्कूल होते हैं । वहाँ तो कामवालियों के बच्चे पढ़ते हैं, गाली सीखते हैं, न पढ़ने की जगह होती है, न ही अध्यापक आते हैं, न कोई ड्रेस, टाई न तहजीव वहाँ जाकर तो बच्चा और बिगड़ जाएगा । इन सामाजिक दवाबों के चलते नवीं तक बच्चा वहीं बना रहा और बमुश्किल चालीस प्रतिशत अंक लेकर पास हो पाया । 10वीं कक्षा अप्रैल से शुरू हो गई थी, गर्मियों में बच्चे का टयूशन भी हुआ लेकिन जुलाई के पहले हफ्ते में जब टेस्ट के रिजल्ट आए तो इस बार भी उतने ही निराशाजनक थे जितने कि पिछले दो-तीन सालों में । इस बार सलाह के नाम पर मेरा फैसला बहुत स्पष्ट था । जितनी जल्दी हो इस बच्चे का दाखिला तथाकथित अंग्रेजी निजी स्कूल से निकाल कर सरकारी स्कूल में करा दिया जाए वरना बच्चे का पास होना मुश्किल हो जाएगा ।

स्कूल की तलाश शुरू हुई। घर के पास दो सरकारी स्कूल थे । दोनों लगभग आधे किलोमीटर से भी कम के फासले पर । यहाँ सरकारी स्कूल-व्यवस्था का एक और रूप सामने आया । मैं नजदीकी एक फर्लाग पर स्थित कृष्णा नगर के स्कूल में खुद गया । प्राचार्य से कई बार टेलीफोन पर बात करने के बाद । लेकिन, जिस सरकारी स्कूल में एक कक्षा में सिर्फ 20 से 22 बच्चे थे जबकि होने चाहिए थे 40 से 50, उन प्राचार्य महोदय के भी नखरे देखने लायक थे । बजाए इसके कि वे और बच्चों का स्वागत करें उनकी बातचीत से ऐसा लग रहा था कि मैं उनका समय बरबाद कर रहा हूँ । ‘आप तो पढ़े-लिखे हैं, इतने अच्छे स्कूल को छोड़कर बच्चे को यहाँ क्यों लाना चाहते हैं ?’ उन्होंने आशंका प्रकट की कि कहीं बच्चा फेल तो नहीं हो गया और सिर्फ ले-दे के पास कर दिया हो । ‘इस बार तो बोर्ड के एग्जाम हैं, आप लेट हो गए हैं।’ मेरी इस बात का भी उन पर कोई असर नहीं पड़ा कि सरकारी स्‍कूल आस-पास के क्षेत्रों के बच्चों के लिए होते हैं और आपकी क्लास में बच्चे भी बहुत कम हैं । लेकिन वे नहीं माने खैर मैं दूसरे सरकारी स्कूल में दाखिला कराने में सफल हो गया ।

यह कोई कहानी नहीं । आप यकीन मानिए कि दिसंबर तक आते-आते 6 महीने के अंदर ही बच्चे का आत्मविश्वास लौट आया और दसवीं की परीक्षा में 70% अंकों से पास हुआ और क्लास में अव्वल भी रहा. नि:संदेह हर बच्चे में प्रतिभा होती है, बशर्ते उसको फलने-फूलने, अपने परिवेश, अपनी भाषा में सीखने, आगे बढने का मौका मिले । यहां स्कूल में अपनी भाषा यानि की हिन्‍दी में पढने-पढ़ाने के बूते, आत्मविश्वास के करिश्‍मा का उदाहरण है यह शैक्षिक अनुभव ।
इससे मिलता-जुलता एक और अनुभव – एक और बच्चे की फुटबाल खेलते-खेलते पैर की हड्डी टूट गई और डॉक्टर ने प्लास्टर चढ़ा दिया । और प्लास्टर भी 4 महीने के लिए पंजे से लेकर जांघ तक. उन्हीं दिनों दसवीं के फॉर्म भरे जा रहे थे. यह छात्र चलने-फिरने में असमर्थ एक बिस्तर पर लेटे हुए था । सभी के चेहरों पर दसवीं के बोर्ड का आतंक था । बातचीत से पता लगा कि यह बच्चा सामाजिक विज्ञान जैसे विषय की समझ तो अच्छी रखता है, लेकिन उसे अंग्रेजी में लिखने में दिक्कत होती थी । यह लड़का केंद्रीय विद्यालय में पढ़ता था । मैंने सुझाव दिया कि सामाजिक विज्ञान की परीक्षा हिन्‍दी में ही दे तो अच्छा रहेगा । यह मेरे अकेले का अनुभव नहीं यह तो हम सबका अनुभव है कि विज्ञान या गणित के प्रश्नों के उत्तर तो भी एक बार को अंग्रेजी माध्यम में दिए जा सकते हैं, सामाजिक विज्ञान के उत्तर देने में अपनी भाषा का आनन्द है, लेकिन यहां भी स्कूली व्यवस्था का एक और चेहरा सामने था । उनका कहना था कि यदि नवीं कक्षा में अंग्रेजी माध्यम है तो दसवीं कक्षा में भी सामाजिक विषय का माध्यम अंग्रेजी ही रखना पड़ेगा । जब कि हकीकत में ऐसा कोई नियम नहीं है । बच्चे ने सामाजिक विज्ञान की परीक्षा हिन्‍दी माध्यम में दी और बहुत अच्छे यानि‍ की 86% नंबर मिले । इन दोनों अनुभवों से मैंने यह कहने की कोशिश की है कि सामान्य से सामान्य विद्यार्थी यदि विषयों को अपनी भाषा में समझ ले तो कई गुना बेहतर प्रदर्शन करता है ।

हममें से ज्यादातर के अनुभव ऐसे ही हैं । मेरी विज्ञान की पढ़ाई बारहवीं कक्षा तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिन्‍दी माध्यम के सरकारी स्कूल में हुई । और एक स्कूल में नहीं बल्कि एक जैसे ही दो-तीन स्कूलों में । उसके बाद बी.एस.सी. में अंग्रेजी माध्यम आ गया । आप सच मानिए मेरे दिमाग में आज तक विज्ञान का जो कुछ बचा हुआ है, उसकी जो भी चेतना बनी हुई है, वह सब उन्हीं दिनों की है, जब मैं अपनी भाषा में विज्ञान पढ़ रहा था । जनरल बायोलॉजी, अनुवांशिकी, डार्विन का विकासवाद, मिलर के प्रयोग आज तक मेरे जेहन में जिंदा हैं । जीव विज्ञान की किताब में छपे मनुष्य के विकास के अनेकों सोपान, चित्र, जावा मानव, नियरडरथल मानव या अफ्रीका तथा चीन में मिले जीवाश्म की खोपड़ी । मेरे अध्यापक द्वारा समझाया गया और अपनी सहज भाषा में समझे गए प्रसंग, अनुगुजें आज तक जिंदा हैं । गिरते शोध के विश्लेषण करते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि शोध एक रचनात्मकता की उड़ान है और यह उड़ान तभी संभव है जब बच्चा इन विषयों को समझेगा कल्पना में उन सिद्वान्तों, प्रयोगों के साथ जुड़ेगा, जूझेगा । अपनी भाषाओं में न पढ़ने-पढ़ाने की वजह से बच्चों के नंबर तो चाहे कितने भी आ रहे हों, मुझे उनकी समझ पर भरोसा नहीं । यह मेरा व्यक्तिगत आरोप नहीं, हमारे देश के विश्वविद्यालय और उनमें जारी शोध का स्तर इसके गवाह हैं । 1992 में शिकागो विश्व विद्यालय ने जब अपनी स्थापना के 100 वर्ष मनाए तो उन्होंने अपनी पहचान इस रूप में रेखांकित की ‘एक सौ वर्ष – एक सौ नोबल पुरस्कार’ । क्या आजादी के 60 वर्षों के बाद हम ऐसे किसी दावे के आस-पास भी खड़े होने की हिम्मत कर सकते हैं ? यदि विषय का अवांतर न माना जाए तो शोध की स्थिति आजादी से पहले कई गुना बेहतर थी, जब कि कहने को तो हम उस समय गुलाम थे । क्या आजादी के बाद शिक्षा, पठन-पाठन के स्तर में हमें ज्यादा गुलामी नज़र नहीं आती ? क्या समझ की माध्यम भाषा का बच्चों से दूर होना भी शोध की गिरावट का एक कारण नहीं है ?

जिन दिनों मैं आनुवांशिकी के मशहूर वैज्ञानिक पादरी ग्रिगार मैंडल के मटर के साथ के प्रयोग पढ़ रहा था, उस समय मैं मटर के खेत में बैठा होता था । लगता था कि मैं मैंडल की प्रयोगशाला में बैठा हूं । एक-एक निरीक्षण जो उसके प्रयोगों में होते थे, मैं वह सब कुछ अपने आस-पास देख सकता था, छू सकता था और उसे जी सकता था । बैंगनी और सफेद फूल, गोल और सिकुड़न भरे दाने । गोल और लम्बी लौकी पर भी मैंने ऐसे प्रयोग करने की कोशिश की । यदि अतिशियोक्ति न मानी जाये तो हो सकता है कि भाषा, परिवेश और प्रेरणा के वही माध्यम मुझे मेरी अगली क्लासों में मिलते तो शायद मैं भी और कुछ कर पाता । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । बी.एस.सी. के दिनों की अंग्रेजी माध्यम के पूरे शिक्षण में एक इतनी दूरी थी कि उन दिनों का कुछ भी मेरे दिमाग पर शेष नहीं है । एक और प्रश्न मैं यहां छेड़ रहा हूं कि यूरोप की शिक्षा, उसमें अन्तनिर्हित आजादी एक पादरी को भी इतना बड़ा वैज्ञानिक बनने का मौका देती है, जबकि हमारे यहां बड़े-बड़े डिग्रीधारी डॉक्टर, वैज्ञानिक शिक्षा पूरी होते-होते पादरी, पंडित या धर्मगुरू बन जाते हैं ।

बचपन में पहाड़े याद करने के चित्र आप सबको याद होंगे । देश के अधिकांश हिस्सों में पहाड़े याद करने का वही तरीका रहा है । सामूहिक रूप से ऊँची आवाज में गाकर, सुनाकर याद करना । यह अकारण नहीं है कि इन दिनों की पढ़ी हुई पीढ़ी के गणित, पहाड़ों के ज्ञान पर अमरीका, यूरोप वाले अकसर अंचभित रहे हैं और कहते हैं कि भारतीयों का गणित का ज्ञान बहुत अच्छा होता है । यह गणित का ज्ञान अपनी भाषाओं में पढ़ने की वजह से अच्छा रहा, न कि कोई और विलक्षण प्रतिभा की वजह से । महानगरों में दिल्ली में विशेषकर निजी स्कूलों में अंग्रेजी में गणित पढ़ने की कवायद ऐसी हो चुकी है कि बच्चे छोटे-मोटे हिसाब, जोड़, घटाना भी या तो कैलकूलेटर से करते हैं या मोबाइल फोन पर । हिन्‍दी के बयालीस, बानवें, नवासी या उनासी को समझने का तो प्रश्न ही नहीं है ।

हम जिन बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं, वे आखिर इस देश में रहेंगे या सारे के सारे सीधे अमरीका, इंग्लैंड चले जाएंगे । ग्लोबल गाँव के युग में भी कोई मूर्ख ही यह सोच सकता है कि इस देश की करोड़ों की आबादी विदेश चली जाएगी । और क्या वाकई मेरा देश इतना खराब है कि जिसे जल्दी से जल्दी छोड़ने की तैयारी चारों तरफ की जा रही है ? यदि ऐसा नहीं है तो हम उनको वही हर चीज, क्यों रटा और सिखा रहे हैं, उसी विदेशी भाषा में बार-बार पढ़ने का क्यों आग्रह कर रहे हैं, जिसके बूते पर वह अमरीका और इंग्लैंड में सफल हो सकें । देश के मछुआरों, किसानों या बुनकरों की समस्याओं से मानो न आज उनका वास्ता है, न कल रहेगा । ज्ञान, सूचना के इस युग में उनकी समझ क्यों कम और असंवेदनशील होती जा रही है ?

मैंने कुछ प्रश्न इसलिए खड़े किए हैं कि हम समझ के माध्यम जैसे विषय पर कुछ और गहराई में सोच सकें । अपने सीमित अनुभवों समेत मैंने जिन अनुभवों की चर्चा की ऐसा नहीं कि इन बच्चों में आत्मविश्वास सदा के लिए लौट आया हो । आइए, इनकी अगली यात्रा पर विचार करते हैं । बच्चे जब इंजीनियरी, डॉक्टरी की प्रवेश परीक्षा देते हैं तो अंग्रेजी का भूत फिर सामने आ खड़ा होता है । 16 नवंबर 2008 यानि‍ की पिछले हफ्ते भारतीय प्रबंधन संस्थानों में पढ़ाई के लिए आयोजित की जाने वाली कैट परीक्षा थी । कैट के नाम से ही स्पष्ट है कि हिन्‍दी या किसी भारतीय भाषा से इसका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है । अखबारों में आपने देखा होगा कि तीन लाख परीक्षार्थी इस परीक्षा में बैठें । आई.आई.टी., मेडिकल, कानून तथा सभी परीक्षाओं में कुल मिलाकर कम से कम 15-20 लाख बच्चे तो हर साल बैठते ही हैं और गौर कीजिए कि इन सभी में प्रवेश परीक्षा में जोर अंग्रेजी पर ही होता है । थोड़ा और गहराई में जाना पड़ेगा । कैट परीक्षा के प्रश्नों को देखकर विशेषकर अंग्रेजी भाग को देखकर आपको चक्कर आ जाएंगे । अंग्रेजी का इतना अच्छा स्तर तो शायद इंग्लैंड में भी न होता हो । भाषा की इतनी महिन परतें, अंग्रेजी के शब्दों के ऐसे पर्याय या अंतर को आप जब तक दस-बीस साल अंग्रेजी की किताबों में ही न खपा दें, तब तक न समझ सकते, न आप परीक्षा पास कर सकते । आपका आत्मविश्वास एक बार फिर हिलने लगेगा, भले ही अभी तक आप गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान में कितने भी अच्छे, होशियार रहे हों । हम सबको पता है कि कैट की परीक्षा के बिना आप उस प्रबंधन गुरूओं में शामिल नहीं हो सकते, जिनको देश-विदेश में सबसे मोटी तनख्वाहें परोसी जा रही हैं । इसीलिए आज हर बच्चे, हर नौजवान बच्चे के हाथ में चेतन भगत की किताबें, एल.कैमिस्ट, दि मौंक हू स्टोल माई फरारी या और भी दोयम दर्जे की अंग्रेजी किताबे हैं और स्कूली बच्चों के हाथ में हैरी पोटर और दूसरी । किताबों की दुकान पर हिन्‍दी जानने वाली माँ अपने बच्चे के हाथ से हिन्‍दी की ‘चंपक’ छीनकर कहती हैं कि अंग्रेजी की ‘चंपक’ लो । ज्यादातर महानगरों में यह स्थिति आ गयी है।

अब यात्रा शुरू होती है अंग्रेजी सुधारने की । ज्ञान विज्ञान, समाज, सामाजिक विज्ञान, इतिहास सब कूढ़ेदान में । सबसे महत्वपूर्ण है अंग्रेजी । ठीक मैकाले के अनुमान पर बल्कि उससे भी चार कदम ज्यादा । कुछ को लगता है कि छठी क्लास से कर दी जाए आत्मविश्वास के कुछ और कमजोरों को लगता है कि और पहली या प्राइमरी स्कूल से शुरूआत की जाए जिससे कि यह भविष्य में ‘कैट’ और दूसरी परीक्षाओं में पीछे न रहें । छठी तक तो लेट हो जाते हैं । फर्राटेदार अंग्रेजी नहीं आ पाती । आज पूरा देश विशेषकर हिन्दी पट्टी इस मशक्कत के दौर से गुजर रही है । इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है । यह सच्चाई है, नौकरियाँ कहाँ हैं, वहीं जहाँ आईटी, कम्प्यूटर हैं और वहाँ तक क्या हिन्दी के रास्ते हम पहुँच सकते हैं ? हमें अपने बच्चों का भविष्य देखना होगा । यह शुष्क आदर्शों का समय नहीं है और न ऐसा होना चाहिए । यह जिंदगी की हकीकत है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता । जब हमारी कामवाली या सफाईवाली या ड्राइवर यह देखता है कि साहब के बच्चों को अच्छी नौकरी इसलिए मिली क्योंकि वह अच्छी अंग्रेजी जानते हैं तो क्या वह अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में नहीं भेजेगा ? भाषा, मातृभाषा, समझ, सही शिक्षा के आदर्श की बातें किसके कानों में जाकर असर करेंगी ? जब बच्चे अपनी कामवालियों को अंग्रेजी में बताते हैं कि सिक्सटी या फोर्टी टू, तो कई बार हर उस मजदूर को लगता है कि जिंदगी चलाने के लिए मैं भी अंग्रेजी जानूं और मेरे बच्चे भी जानें । आपका अनपढ़ ड्राइवर तक मोबाईल का नम्बर अंग्रेजी में बोलता है । नतीजा हर तरह के अंग्रेजी स्कूल सामने आ रहे हैं । जो पैसा जितना खर्च कर सकते हैं उनके लिए उतने ही नामी-गिरामी, बड़ी फीस वाले । यह सिलसिला दिल्ली से होता हुआ इलाहाबाद, पटना, भागलपुर के रास्ते अब कस्बों और गाँवो तक पहुँच रहा है।

क्या एनसीईआरटी समेत पूरी शिक्षा व्यवस्था और हम सब इन चुनौतियों के लिए तैयार हैं ?
इस प्रश्न पर सोचते हुए कई बार एक अंधेरे में घिरता हुआ महसूस होता है । जो अंग्रेजी स्कूल खुल रहे हैं उनमें अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तकें कौन सी हैं और क्या अंग्रेजी के इतने शिक्षक उपलब्ध हैं ? शिक्षाविद कृष्ण कुमार जी की दो-तीन दशक पहले लिखी बात का सहारा लें तो उन्होंने कहा था कि ‘जो शिक्षक हमें अंग्रेजी पढ़ाते हैं यदि उनकी अंग्रेजी ठीक होती तो वे पहले ही कहीं और नौकरी कर रहे होते । अब इन अक्षम अंग्रेजी शिक्षकों से जो अंग्रेजी पढ़ने को मिलेगी उसका स्तर भी वही होगा जो आज है । यदि मामला सिर्फ अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाने का हो तब भी बात समझ में आती है । लेकिन बात तो यहाँ तक बढ़ रही है कि प्राइमरी की शिक्षा भी अंग्रेजी माध्यम में देने की वकालत की जा रही है और इसमें कई राज्य एक-दूसरे से होड़ लगाए हुए हैं । हाल ही में उत्तर प्रदेश शासन भी इसी दिशा में बढ़ने की तैयारी कर रहा है । पश्चिम बंगाल जो अब तक भाषा नीति में बंगाली को प्राथमिकता देता आया है उनके भी पैर लड़खड़ा रहे हैं । कुछ साल पहले उन्होंने फैसला किया था कि छठी के बाद ही अंग्रेजी पढ़ाई जाएगी । फिर वे तीसरी कक्षा तक आ गए और अब पहली कक्षा से सरकारी स्कूलों में पढ़ाने की बात है । गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु भी अलग-अलग ढंग से इस प्रश्न से जूझ रहे हैं । कहीं-कहीं न्यायालयों को भी दखल देना पड़ रहा है ।

यहाँ एक बात और स्पष्ट करना जरूरी है कि वे दिन लद गए जब एक राष्ट्र, एक भाषा, एक संस्कृति की बात एक राजनैतिक दवाब और उद्देश्यों के लिये की जाती थी । वे मुट्ठी भर लोग भी अब इस बात को समझने लगे हैं कि इन भाषाई उन्मादी बातों के बूते देश को एक नहीं रखा जा सकता है । पहले रूस की बात, स्टालिन के हवाले से की जाती थी- एक देश एक भाषा । उसका हश्र हम सबने देख लिया । एक संस्कृति एक भाषा के लादने के कारण सोवियत रूस ही 12 टुकड़ों में बंट गया । पाकिस्तान और बांग्लादेश, हम सब जानते हैं उर्दू के बोलने के कारण अलग हुए । श्रीलंका में जो जातीय युध्द जारी है उसकी जड़ में सिंहली और तमिल संस्कृति और भाषाओं के वर्चस्व की लड़ाई है । इसलिए बहुभाषिकता तो भविष्य का दर्शन है ही । हमारी शिक्षा नीति को देखना यह है कि शिक्षा अपने बुनियादी उद्देश्यों में यानि कि समझ, सृजनात्मकता और पढ़ने के आनंद की भी पूर्ति करे और हमारे भविष्य को देशी-विदेशी नौकरियों के लिए भी उतना ही सक्षम बनाए । वे दुनिया के साथ संवाद भी कायम कर सकें । दुनिया से ऐसा संवाद कायम करने के लिए भाषा अंग्रेजी की खिड़की की प्राथमिकता इसलिये है कि अंग्रेजों के अधीन हम 200-300 साल रहे लेकिन केवल एक भाषा के रूप में/माध्यम के रूप में हरगिज नहीं ।

ऐसी अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाई जाने में किसी को आपत्ति नहीं है और न ही होनी चाहिए । मोटा-मोटी पूरे देश में छठीं क्लास से आगे अंग्रेजी एक विषय के रूप में पढ़ाई जा रही है । चिंता की बात यह है कि इसे खींचकर पहली क्लास से शुरू करने की कुछ लोग कोशिश कर रहे हैं। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने भी कुछ ऐसी सिफारिशें की हैं जो शिक्षा के बुनियादी उद्देश्यों से बहुत दूर है ।

जिस चौराहे पर हम खड़े हैं वहाँ दो विचारधारात्मक स्कूल आमने-सामने हैं। पहला- एन सीईआरटी द्वारा बहुत मेहनत, सूझबूझ और दूरदर्शिता से बनाया गया राष्ट्रीय पाठ्यक्रम जैसे-नेशनल क्यूरीकुलम फ्रेमवर्क 2005 के रूप में एक दस्तावेज के रूप में सामने आया है। बहुत विस्तार से इक्कीस समितियों ने शिक्षा के हर मुद्दे पर गंभीरता से बात की है। भाषा, समझ और परिवेश जैसी चिंताओं की बात की जाए तो एक सिध्दांत के रूप में किसी दस्तावेज ने पहली बार इस बात को स्वीकार किया है । यानि कि शिक्षा की सार्थकता तभी है जब बच्चे अपने परिवेश से जुड़ें । कारण कि स्कूल की दीवारों और बाहर की दुनिया के बीच कोई फासला न रहे और शिक्षा बाल-विकास केन्द्रित हो न कि परीक्षा केन्द्रित । अपनी भाषा के माध्यम से पढ़ने पढ़ाने, समझने के पहले कदम से ही एनसीएफ 2005 अंतरनिहित उद्देश्य में सफल हो सकते हैं ।

लेकिन उसी दौर में उसी सरकार का दस्तावेज है, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिश, जिसमें दुनिया से जुड़ने के नाम पर कई सारी बातों के अलावा अंग्रेजी को बहुत ऊँचे दर्जे की प्राथमिकता देने की बात बार-बार की गई है । इस बात पर ध्यान दिये कि यह बहुत अव्यावहारिक होगा और बिना यह संभव कैसे होगा ? लगता है कुछ यह विदेशी संस्थाओं का एजेंडा हो । मध्यम वर्ग की एक जमात ज्ञान आयोग की इस सिफारिश के पक्ष में है । इन दोनों से कैसे निपटा जाए यह- प्रश्न हम सब के सामने खड़ा है ।

मोटा-मोटी कुछ बातें, कुछ सुझाव मेरे दिमाग में आ रहे हैं । पहला- एनसीईआरटी ‘समझ का माध्यम’ की गोष्ठियाँ या सेमीनारों की श्रृंखला केवल हिन्दी राज्यों तक ही सीमित न रखे । एनसीईआरटी एक राष्ट्रीय संस्था है और इसलिए ‘समझ के माध्यम’ जैसी बहस की भागीदारी में सभी प्रांतों की अपनी-अपनी मात्रभाषाओं का भी उतना ही योगदान और महत्व रहेगा । तमिल, तेलगू, कन्नड़, मराठी जैसी सभी भारतीय भाषाओं में शिक्षा पहले से ही दी जा रही है । लेकिन एनसीईआरटी इन गोष्ठियों के जरिए अंग्रेजी और राष्ट्रीय भाषाओं के बीच संवाद को एक सार्थक दिशा देकर भारतीय भाषाओं की तरफ मोड़ सकती है । यह इसलिए भी जरूरी है जिससे कि पूरे देश में एक आवाज के साथ कम-से-कम प्राइमरी स्तर पर अपनी भाषाओं में समान रूप से बच्चों को शिक्षा दी जा सके आगे जाकर एक बुनियादी समझ के साथ ये बच्चे बहुभाषिकता की तरफ बढ़कर बेहतर नागरिक भी बनेंगे इस कारण से भी कि अंग्रेजी को देवी की तरह पूजने वाले मैकाले समर्थकों को यह आरोप लगाने का मौका भी नहीं मिलेगा कि सिर्फ हिन्दी प्रांतों में प्राइमरी स्तर पर अंग्रेजी न पढ़ाई जाने से वे पीछे हो जाएंगे या पीछे बने हुए हैं । सच्चाई तो यह है कि हिन्दी प्रांतों के पीछे रहने का एक कारण शायद यह भी है कि अपनी भाषा के बूते समझ और शिक्षा देने में उनके पैर बाकी प्रांतों से ज्यादा लड़खड़ाते हैं । मलयालम, बंगाली, मराठी जानने वाले अपनी भाषाएं भी उतनी ही अच्छी तरह से जानते हैं जितनी कि अंग्रेजी । भाषा की शिक्षा की बात करते हैं तो यहाँ फिर से यह रेखांकित करने की जरूरत है कि अपनी भाषा में एक बार विषयों की समझ आने के बाद आप पूरी दुनिया के साथ अपने को बेहतर ढंग से जोड़ सकते हैं । इस जुड़ने से ही बाकी शिक्षा और सीखने की प्रक्रिया कई गुना बढ़ती है । उसके बाद सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं कई और भाषाएं भी बहुत तेजी से और बेहतर तरीके से सीखीं जा सकती हैं । दुनिया के कुछ स्कूली बच्चों की समझ का यह अनुभव रोहित धनकड़ जी ने कुछ ऑंकड़ों और तथ्यों के साथ बताया था कि दुनिया के कुछ स्कूली बच्चों के बीच जो अध्ययन किए गए उनमें पाया गया कि फिनलैंड के बच्चों की भाषाएं सीखने की क्षमता सबसे अच्छी थी । उसके दो कारण स्पष्ट थे । पहला कि उन्हें बचपन में लगभग 10-11 वर्ष की उम्र तक शिक्षा अपनी भाषा में दी गई और दूसरा उनको स्कूल में भर्ती करने की उम्र भी सबसे ज्यादा यानि 7 वर्ष थी । हमारे यहाँ ठीक उलटा हो रहा है । यानि कि बच्चों को तीन से चार वर्ष की उम्र में ही स्कूलों में भेजने की कवायद, और उसके ऊपर अंग्रेजी भी लाद दी गई है । रविंद्रनाथ टैगोर के शब्दों में ऐसा करके वाकई हम उनके बचपन को कुचल रहे हैं ।

दूसरा कदम इसे देश के कॉलेजों, उच्च शिक्षा संस्थानों, विश्वविद्यालयों तक भी ले जाने की जरूरत है । इसलिए भी कि शिक्षा में समझ का महत्व जितना बच्चों के लिए है उतना ही बड़ों के लिए भी । क्या हम उच्च शिक्षा को अंग्रेजी के हवाले छोड़ सकते हैं ?

मैं किसी भाषाई कट्टरता की वजह से यह सब नहीं कह रहा । मैं यहाँ भी कुछ अनुभव बॉटना चाहूँगा । दिल्ली विश्वविद्यालय के अधीन लगभग 80 कालेज आते हैं। 20 कालेजों को छोड़कर कम-से-कम 60 कालेज ऐसे कहे जा सकते हैं जो कि परिधि के हैं यानि कि जिनमें ज्यादातर बच्चे उत्तरप्रदेश, बिहार या राजस्थान जैसे उन प्रांतों से आए होते हैं जहाँ हिन्दी माध्यम से पढ़ाई होती है । इतिहास, राजनीति शास्त्र, सामाजिक विज्ञान, मनोविज्ञान जैसे विषय हैं जिनमें 50 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे हिन्‍दी माध्यम में ग्रेजुएशन की परीक्षा देते हैं । भले ही उन्हें शिक्षक हिन्दी माध्यम में पूरी तरह न पढ़ाते हों लेकिन परीक्षा में उनकी अभिव्यक्ति इन विषयों में हिन्दी में ज्यादा बेहतर ढंग से सामने आती हैं । लेकिन दिल्ली के विश्वविद्यालयों के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में हिन्दी माध्यम के लिए जगह बहुत कम बची है । सन 1980 तक तो लगातार ऐसी उम्मीद, प्रयास जारी थे जब यह कहा जाता था कि न केवल सामाजिक विज्ञान, बल्कि देश कुछ सालों के बाद विज्ञान और गणित में भी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने में सक्षम हो जाएगा । यह वह दौर भी था जब कोठारी आयोग की रपट लागू हुई थी, वर्ष 1979 में । यानि कि विभिन्न मातृभाषाओं में भारतीय प्रशासनिक सेवा आदि की परीक्षा देने का मौका अकेले इसी आयोग की वजह से लागू हुआ । इसी की वजह से हिन्दी पट्टी के हजारों बच्चे सिविल सर्विसेज में प्रवेश कर पाए । वरना इससे पहले तो चंद अंग्रेजी जानने वाले ही आ पाते थे । 30 वर्ष के बाद स्थिति फिर से अंग्रेजी की तरफ मुड़ने की हो रही है । यूपीएससी की परीक्षाओं में केवल सिविल सेवा परीक्षा है जहाँ समस्त भाषाओं में उत्तर देने की अनुमति दी गई है । इंजीनियरिंग की परीक्षाओं में अभी भी मातृभाषा में लिखने की अनुमति नहीं मिली है । कोठारी आयोग के प्रकाश में जो अच्छी बात उन दिनों हुई वह यह थी कि राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार की ग्रन्थ अकादमियों और दूसरे संस्थान, प्रकाशक भी आगे बढ़-चढ़कर हिन्दी में कुछ अच्छी किताबों को लेकर आए । अच्छी किताबों के अनुवाद भी मैकमिलन आदि बड़े प्रकाशकों ने किए । दिल्ली में ग्रन्थ शिल्पी जैसे प्रकाशक अभी भी ऐसी किताबों को सामने ला रहे हैं । लेकिन जरूरत से बहुत कम हैं हिन्दी में सामाजिक विज्ञान में अच्छी किताबें ।

यानि कि दिल्ली के स्कूल और दिल्ली विश्वविद्यालय में इस मुहिम को और तेजी से चलाने की जरूरत है । कई कारणों में से एक तो यह कि सबसे अधिक कॉलेज यहाँ हैं । यह हिन्दी भाषी क्षेत्र में है । दूसरा एनसीईआरटी और देश की राष्ट्रीय संस्थाएं यहाँ हैं । यहाँ तक कि पुस्तकें छापने-अनुवाद की सुविधाएं भी सबसे ज्यादा हैं । किसी वक्त दिल्ली विश्वविद्यालय में एक पूरा विभाग, खंड ही अनुवाद के जरिए पुस्तकें लाने के लिए बनाया गया था । समझ के माध्यम को एक मिशन की तरह अगर हमें पूरे देश में ले जाना है तो इसकी शुरुआत दिल्ली से करनी ही होगी ।
दिल्ली की शुरुआत का महत्व इसलिए भी है कि यहाँ से असरदार शुरूआत करने से यह संदेश पटना, इलाहाबाद, बनारस जैसे छोटे शहरों तक भी पहुँचेगा । ऐसा नहीं कि हिन्दी माध्यम के केन्द्र पटना, इलाहाबाद, बनारस इसी शुरूआत के लिए दिल्ली की तरफ देख रहे हैं । लेकिन दिल्ली की अंग्रेजी उनके विश्वास को तो हिलाती ही रहती है । यहाँ इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते जैसे- समाज के उच्च वर्गों के जीवन रुझान, हावभाव, भाषा, संस्कृति समाज के निचले पायदान पर बैठे लोगों पर असर डालते हैं, वैसे ही हिन्दी पट्टी में दिल्ली का असर भाषा और शिक्षा के नाम पर हो रहा है । जैसा कि मैंने पहले कहा हमारी कामवाली या ड्राइवर अंग्रेजी की तरफ इसलिए भागते हैं क्योंकि उनके मालिक भी वैसे ही कर रहे हैं । यदि दिल्ली और उसके बाहर इस बढ़ती अंग्रेजी को इलाहाबाद, लखनऊ, खुर्जा या बुलंदशहर में प्रवेश करने से रोक दिया गया तो यह आगे नहीं बढ़ पाएगी । कम-से-कम उस रूप में तो नहीं जैसी यह आज पहुँच रही है । भाषा के नाम पर एक रटंत और ऐसी नौकरियों के निर्माण के जुनून में समझ और शिक्षा से कोई वास्ता ही नहीं है ।

तीसरा, ऐसे किसी भी प्रयास में सभी भाषाओं के शिक्षकों, प्राध्यापकों, विद्यालयों को शामिल किया जाए । यह मामला सिर्फ हिन्दी विभाग का नहीं है यह पूरे शिक्षा जगत में एक ऐसी समझ पैदा करने का है जिसके रास्ते हम शोध की रचनात्मकता को हासिल कर पाएंगे । चौथा- इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षक को निभानी है । यहाँ भी शुरुआत दिल्ली से करने में कोई बुराई नहीं है । दिल्ली में सबसे ज्यादा निजी स्कूल होंगे । एक हजार नामी स्कूलों के लगभग बीस-तीस हजार से ज्यादा शिक्षकों को लगता है कि उनका काम या उनकी भाषा सिर्फ अंग्रेजी पढ़ाने के लिए है । इन शिक्षकों को माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के जरिए अथवा दिल्ली प्रशासन के जरिए माध्यम की समझ जैसे विषय पर खींचकर लाने की जरूरत है, अनिवार्यता के रूप में यह भी देखा गया है कि जैसा कि स्वाभाविक है सभी अपनी समझ को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं । बच्चों पर अत्याचार करते हुए भी वे यही मानते हैं कि वे जो कर रहे है वही सर्वश्रेष्ठ शिक्षा हैं भले ही उसमें एक आतंकी शिक्षक का चेहरा उभर रहा हो ।

चुनौती बड़ी जरूर है ,लेकिन असंभव नहीं, वरना शिक्षा समझ के माध्यम की समझ के बिना निरर्थक ही रहेगी ।

One thought on “पढ़ने-पढ़ाने का माध्यम”

Leave a Reply

Your email address will not be published.