न्याय की भाषा

यदि वर्ष 1800 को भारत में अंग्रेजों के विधिवत पैर जमाने की समयरेखा माना जाए तो दो सौ बरस के बाद भारत के मौजूदा शिक्षा परिदृश्य में इस बार इतिहास कानून की शिक्षा पद्धति में दोहराया जा रहा है । 1773 में कार्नवालिस के भूमि सुधारों और दूसरी राजस्व व्यवस्थाओं के चलते ईस्ट इंडिया कम्पनी को यह समझने में देर नहीं लगी कि कानून के ऐसे बिचौलिये तैयार किए जाएं जो ब्रिटिश शासन की भाषा, इरादों को समझते हुए यहाँ के जमींदारों को कानूनी रास्ते से बाँह मरोड़ते हुए अपने हिसाब से चला सकें । पूरे इतिहास के विस्तार में जाने की जरूरत यहाँ नहीं, इन्हीं वकीलों और बैरिस्टरों की फौज के जरिए धीरे-धीरे ब्रिटिश साम्राज्य राजनीतिक रूप से ही नहीं बढ़ा, यहाँ के राजाओं, जमींदारों और नवाबों पर भी कानूनी नकेल डालना आसान बनता गया । अंग्रेजों को अपने हित साधने के लिए वकील चाहिए तो जमींदारों को भी अपनी हिफाजत के लिए धीरे-धीरे जरूरत पड़ने लगी । जाहिर है दोनों की भाषा- शासक की भाषा अंग्रेजी ही होनी थी । नतीजा वकीलों की फौज देश के हर प्रांत में लहलहाई । मुकदमे दर मुकदमे निचली अदालत से लेकर हाई कोर्ट और इंग्लैण्ड की महारानी तक । प्रेमचंद के उपन्यास गोदान, सेवासदन और अनेकों कहानियाँ इसकी गवाह हैं । स्वतंत्रता पूर्व लिखे हिन्दी समेत दूसरी भाषाओं के साहित्य में भी इन वकीलों और सरकार, साहूकार की तिकड़ी द्वारा शोषण के असंख्य किस्से बिखरे पड़े हैं । यह बात अलग है कि शोषण की इस समझ के बाद इसी फौज से निकले कुछ देशभक्तों ने अपनी आत्मा और अस्मिता की आवाज सुनते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नींव रखी । दादाभाई नौरोजी, व्योमेश चंद बनर्जी से लेकर गोखले, गांधी, जिन्ना, नेहरू, सी.आर. दास लगभग सभी कानून के पेशे से आये थे । लेकिन तब तक ब्रिटिश सत्ता भारतीय समाज को राजनीतिक, आर्थिक, मानसिक रूप से खोखला कर चुकी थी ।

क्या चारों तरफ तेजी से उगते लॉ कॉलेजों के रूप में हम फिर नवउपनिवेशवाद के नए पैंतरों से वही गलती दोहराने जा रहे हैं ? लगता तो यही है । कानून की शिक्षा समेत पूरी शिक्षा व्यवस्था पर उनका जैसा शिकंजा बढ़ रहा है उसमें तो उनके हित दशक से भी पहले पूरे हो जायेंगे । इस पूरे शिकंजे में उनका औजार फिर वही अंग्रेजी भाषा में कानून की शिक्षा है । तर्क दिया जा रहा है कि अच्छे कानूनविदों की कमी है और इस कमी को ज्यादा से ज्यादा कानून के कॉलेजों से ही पूरा किया जा सकता है ।
यदि यह मान भी लिया जाये कि कानूनविदों की कमी है तो क्या यह कमी सिर्फ अंग्रेजी में कानून पढ़ने-पढ़ाने से पूरी हो सकती है ? कानून यदि जनता की रक्षा और सहूलियत के लिए है तो पिचानवे प्रतिशत जनता तो अंग्रेजी ठीक से जानती ही नहीं है । किसान, कास्तकार, कारीगर, व्यापारी कैसे समझेंगे इन अंग्रेज वकीलों के दांवपेंच और कैसे समझेंगे ये वकील देश की समस्यायें जब उन्हें भारतीय भाषाओं, बोलियों का ही ज्ञान नहीं है । जैसे-तैसे तो भारत के कई राज्य अपनी न्याय व्यवस्था, न्यायालयों में कम से कम जिला कमिश्नरी स्तर पर अपनी-अपनी प्रांतीय भाषाओं में शुरूआत कर पाए थे कि अचानक फिर उलटी गिनती शुरू हो रही है । कम से कम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, बिहार के जिला न्यायालयों में काम हिन्दी में धड़ल्ले से होता है । इलाहाबाद, पटना हाईकोर्ट तक में बड़े-बडे वकील अपनी बात जरूरत पड़ने पर हिन्दी में करते हैं। इन तथाकथित राष्ट्रीय कॉलेजों से निकले नौजवानों से अपनी भाषा में, अपनी जनता के हित में मुकदमा लड़ने की उम्मीद ही करना बेकार होगा ।

इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंजीनियरिंग, मेडिकल की तर्ज पर कानून के इन कॉलेजों की प्रवेश परीक्षा भी राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होती है । लेकिन जहाँ आई.आई.टी. परीक्षा में हिन्दी माध्यम में प्रश्‍न पत्र मौजूद रहता है, कैट और लॉ की प्रवेश परीक्षा में बिल्कुल नहीं । कैट और लॉ के प्रश्‍न पत्र में अंग्रेजी के स्टैंडर्ड को देखकर शायद अंग्रेज भी चक्कर खा जायें । अंग्रेजी की समझ, अभिव्यक्ति, शब्द भंडार की ऐसी कठिन परीक्षा है कि कई बरस तक अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा हुआ छात्र ही उसे पार कर सकता है । एक ही झटके में कर दिया न बाहर गरीब, दलित, पिछड़ों को । ऐसे अंग्रेजी जानने वालों को देखकर ही बीबीसी के मशहूर पत्रकार मार्क तुली ने कहा था कि भारतीयों को शेक्सपियर, मिल्टन और दूसरे अंग्रेजी लेखकों का इतना गहरा ज्ञान है जितना अधिकांश अंग्रेजों को भी नहीं होगा । जितनी अच्छी अंग्रेजी उतनी पकड़ कानून के दांवपेंचों पर विदेशी कम्पनियों के हित में तो उतना पैसा, तनख्वाह जिसे आजकल ये पैकेज कहते हैं । जे.पी. आन्दोलन के दौर में और संघ लोक सेवा आयोग के संदर्भ में कोठारी रिपोर्ट द्वारा भारतीय भाषाओं के माध्यम की छूट के समय में ऐसा विश्‍वास बनने लगा था कि जल्द ही इंजीनियरिंग, मेडिकल जैसी तकनीकी पढ़ाई भी अपनी भाषाओं में दी जाने लगेगी लेकिन सन अस्सी के बाद तो मामला धीरे-धीरे उलटना ही शुरू हो गया । और उदारीकरण के बाद तो कानून समेत सामाजिक विषयों को भी बड़े केन्द्रीय विश्‍वविद्यालयों में अपनी भाषाओं में पढ़ना-पढ़ाना लगभग बंद कर दिया है । यदि ऐसी शिक्षा के जरिये न्याय और दूर होता गया तो लोकतंत्र का ‘लोक’ के लिए कोई अर्थ बचेगा ।

मल्टीनेशनल कम्पनियों और उनके रखवाले देशों ने ग्लोबलाइजेशन के नाम पर बड़ी दूर की कौड़ी खोजी है । कब्जा यहाँ के बाजार से लेकर किसानों की जमीन, जायदाद, नगरपालिका, उद्योग सभी पर करना है । अब युद्ध, लड़ाई के दिन तो लद गए तो क्यों न कानूनी रास्ते से दुनिया के सामने इन्हीं के कानूनी नागरिकों से यह काम कराया जाए । कौन सा किसान, व्यापारी इन अंग्रेजी पढ़े वकीलों के आगे टिक सकता है ? यहाँ तक कि सरकारें भी नहीं क्योंकि इन ज्यादातर सरकारी विभागों के पास भी पुरातन किस्म के विधि विभाग बने हुए हैं जो शायद ही नये मर्केन्टाइल लॉ और अंग्रेजीदाँ एडवोकेटों को टक्कर दे सकें । प्राइवेट बैंक, टेलीफोन, सेज, उद्योगों के अनेकों फार्मों, प्रपत्रों, एग्रीमेंट, आदेशों की ऐसी जटिल धारा, उपधाराएं हैं जो लगातार ग्राहकों को अपनी शर्तों पर गले से दबोच रही हैं । अंग्रेजी कानून का यह शिकंजा जब मध्य वर्ग का गला दबा सकता है तो गरीब किसानों की तो बिसात ही क्या है । अपने सीमित संसाधनों में उसकी तो पहले ही घिग्गी बंधी हुई है ।

यह कितना बड़ा झूठ है कि कानून पढ़े-लिखे लोगों की कमी है । सच तो यह है कि अच्छी अंग्रेजी में कानून बोलने-लिखने वालों की कमी है और लॉ कॉलेजों का यह पूरा तमाशा, न्यायपालिका में इसी अंग्रेजी के सिक्के के लिए किया जा रहा है । बड़ी-बड़ी तनख्वाह, सब्जबागों की झूठी मुनादी, विज्ञापन भी इसी अंग्रेजी के लिए है । इन कॉलेजों के कर्ताधर्ताओं, बहुराष्ट्रीय सलाहकारों को भी पता है कि अंग्रेजी के नाम पर मध्यवर्ग को किसी भी तरह नचाया जा सकता है । आश्‍चर्य कि अपनी भाषा भी नहीं और पढ़ाई भी इतनी महंगी । और यह सब गांधी-नेहरू की विरासत वाली आम आदमी की सरकारें कर रही हैं । इतिहास से सीखते हुए यदि मल्टीनेशनल भाषा और कानून को देश पर कब्जा करने के हथियार के रूप में देख रहे हैं तो हमें भी इसी इतिहास से सबक लेते हुए इन कुटिल नीतियों को परास्त करने की जरूरत है ।

वक्त रहते यदि भारतीय लोकतंत्र के पहरूये-नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार यदि इसे समझने में असमर्थ रहे तो जो न्याय व्यवस्था लोकतंत्र की रक्षक मानी जाती है, भाषा के रास्ते उसकी नकेल किसी और के हाथों में होगी । अफसोस यह भी है कि सामाजिक न्याय के वे पुरोधा जो हर कॉलेज, विश्‍वविद्यालयों में दो दशमलव तक जातिवादी प्रतिशतता खोजते रहते हैं, भाषा के सवाल पर चुप क्यों हैं ? क्या मुक्तिबोध के शब्दों में वे सब भी शोषण के इस बैंड में शामिल हैं या होना चाहते हैं । यदि नहीं तो न्याय की सच्ची आवाज यही है कि इन सभी कॉलेजों में अपनी -अपनी प्रांतीय भाषाओं में भी शिक्षा की छूट दी जानी चाहिए।

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