नौकरशाही की गुत्थियां

वर्ष 2006 से भारत सरकार प्रतिवर्ष 21 अप्रैल को सिविल सेवा दिवस के रूप में मनाती है। इसकी शुरूआत यूपीए-1 के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी। प्रयोजन था देश के उत्कृष्ट, ईमानदार नौकरशाहों के कामों को पुरस्कृत कर पूरे देश की नौकरशाही को और अच्छा होने के लिए प्रेरित करना। इसकी प्रक्रिया भी काफी पारदर्शी थी। देश भर में फैले सभी विभागों- प्रशासनिक सेवाओं, पुलिस सेवा से लेकर रेलवे, डाक, शिक्षा, राजस्व, जंगल में काम कर रहे अधिकारियों के कामों की समीक्षा एवं आकलन इस दृष्टि से करना कि आम जनता को कैसे उसका अधिकतम फायदा हुआ। कौन सी बाधाएं पार करके अधिकारियों ने इसे बेहतर बनाया। हर वर्ष करीब 10-15 ऐसे कामों को विज्ञान भवन में सार्वजनिक रूप से पुरस्कृत किया जाता है। उसी दिन नौकरशाही के ढांचे में सुधार करने की दिशा में तीन-चार समूहों में संबंधित केन्द्रीय मंत्री, सचिव या दूसरे क्षेत्र के अनुभवी व्यक्तियों की उपस्थिति में वरिष्ठ और युवा नौकरशाह चर्चा में भाग लेते हैं। कैबिनेट सचिव, कार्मिक मंत्री और प्रधानमंत्री के भाषणों के साथ शुरूआत, दोपहर का लजीज खाना और फिर कुछ आदर्श बातें-संवाद। इस बहाने सरदार पटेल और उनकी भूमिका को नि:संदेह मौजूदा नौकरशाही के संदर्भ में जरूर याद किया जाता है।

लेकिन जिस ‘बदलाव के वाहक’ बनने की गुजारिश प्रधानमंत्री ने इस बार नौकरशाही को संबोधित करते हुए कही, क्या वह इतना आसान है? यह अचानक नहीं है कि सत्तर-अस्सी के दशक में ही भारतीय नौकरशाही दुनिया के ‘भ्रष्टतम’ में गिनी जाने लगी थी। बार-बार देश के अंदर और बाहर उंगली भी उठती रही है लेकिन ‘पतन का पतनाला’ वहीं गिर रहा है। न जयप्रकाश का आंदोलन कुछ  कर पाया, न वी.पी.सिंह  की भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम। उदारीकरण के आगाज के साथ तो यह प्रसंग उठना भी बंद हो गया। भला हो अन्ना आंदोलन का कि पारदर्शिता, भ्रष्टाचार, जिम्मेदारी जैसे शब्दों के बहाने फिर जनता ने सोचना शुरू किया। ‘सूचना का कानून’ जैसा कानून यकीनन इस भ्रष्टतंत्र की कोख से जन्मा है और भारतीय लोकतंत्र में आजादी के बाद नि:संदेह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, लेकिन नौकरशाही में गिरावट अब भी जारी है। यदि पिछले तीन वेतन आयोगों- पांचवा 1996, छठा 2006 और अब सातवां- के खर्चों को सामने रखकर देखें तो पता चलता है कि आखिर हाथी जैसी नौकरशाही पर इतना खर्च करने की जरूरत क्या थी। यहां नौकरशाही का अर्थ केवल आईएएस, आईपीएस, राजस्व और रेलवे की सेवाएं ही नहीं है, बल्कि इसमें वे सभी कर्मचारी शामिल हैं जो केन्द्र सरकार या राज्य सरकार की निधि से वेतन पाते हैं। आखिर लोकसेवक तो  सरकारी स्कूल शिक्षक भी है, पटवारी भी, सचिव और मुख्य सचिव भी। उदारीकरण के बाद लागू पांचवें वेतन आयोग (1996) ने पहली बार सरकारी सेवाओं के वेतन में भारी-भरकम वृद्धि की। तर्क था कि इन्हें पर्याप्त वेतन-भत्ते मिलेंगे तो यह ज्यादा लगन से काम करेंगे। इनकी जरूरतें पूरी होंगी तो यह भ्रष्टाचार से भी दूर रहेंगे। इन्हें सम्मानजनक वेतन मिलना ही चाहिए। तब तक मंडल कमीशन भी सारे कोर्ट-कचहरियों के लांघता हुआ लागू हो चुका था। अत: किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इनकी बढ़ती तनख्वाहों पर उंगली नहीं उठाई। जबकि पैसे की कमी के कारण आम जनता के स्कूल बंद होने शुरू हो गए, भर्तियों में कमी आने लगी, किसान बर्बादी की तरफ कर्ज लेकर बढ़ने लगे। लेकिन नौकरशाही मालामाल। इतनी कि दुनियाभर की कारें बाबुओं के इसी बढ़ते मध्यमवर्ग को तलाशती हुई भारतीय बाजारों में छा गईं। बाबू जितना मोटा होता गया, जनता की पतलून और जेब उतनी ही ढीली।

कुछ अच्छे कामों की फेहरिस्त में याद आ रहा है जबलपुर के जिला कलक्टर का सड़कों के बीच में आने वाले मंदिरों, मस्जिदों और अन्य पूजास्थलों को हटाने का अभियान। उसने कैमरे के सामने सभी धार्मिक गुरूओं, मुल्लाओं के साथ बैठकें कीं, उन्हें समझाया और सफल हुआ। विज्ञान भवन में पूरी विडियो दिखाई गई थी। तालियां भी खूब बजीं। लेकिन संवाद के सिलसिले में जब इसी मॉडल को पूरे देश में, सभी शहरों में लागू करने का प्रश्न आया तो राजनीतिक नेतृत्व सदा की भांति पलकें झपकाने लगा। चित्तौड़गढ के जिलाधीश ने जेनेरिक दवाओं को लागू करवाकर दम लिया और गरीबों को सस्ती दवाएं उपलब्ध हुईं। फिर ऐसे व्यक्ति को दवानीति के प्रमुख के पद पर क्यों नहीं बैठाया जाता, इस बात पर पसरी चुप्पी सारे आडंबर से पर्दा उठा देती है। हालांकि हर साल लाखों नौजवानों के बीच से एक हजार की भर्ती के बाद सिर्फ दो-चार काम ही नौकरशाही की सीमा और संभवनाओं को बता देते हैं। कुछ सच्चाई इस बात में भी है कि हमारी सिविल सेवाओं में भर्ती तो सर्वश्रेष्ठ की होती है, लेकिन क्योंकि उन्हें उनकी प्रतिभा के अनुरूप काम नहीं मिलता तो ये आपस के ही रणक्षेत्र में शहीद हो जाते हैं। हालांकि पिछले 20-30 सालों में न सर्वश्रेष्ठ आ रहे हैं, न वे शहीद हो रहे हैं।

नेताओं के साथ गठजोड़ ने इन्हें व्यवस्था का शहंशाह बना दिया है। उच्चतम नौकरशाही के प्रशिक्षण केन्द्र मसूरी, बड़ौदा और नागपूर से मिली फीडबैक बताती है कि उतरोत्तर ऐसे अधिकारी भर्ती हो रहे हैं जो सिर्फ ताकत, प्रतिष्ठा और आराम की नौकरी के लिए सिविल सेवा में आए हैं। सरकार को यह पता भी है और अनेक समितियों, प्रशासनिक सुधार आयोग की लंबी रिपोर्टों में सुधार के उपाय भी सुझाए गए हैं, लेकिनं  न वार्षिक  मूल्यांकन रिपोर्ट में सुधार आया, न भर्ती की उम्र कम करनेके लिए कोई कदम उठाया गया . । गिरावट निरंतर जारी है।

पिछले कई वर्ष से सिविल सेवा दिवस पर एक नई सीख-आदेश,उपदेश  ईजाद किया जाता है। एक बार उन्हें निडर, ईमानदारी से बात कहने की ताईद की गई थी। भरपेट चाय-पकौड़ों-रसगुल्लों के साथ सभी के चेहरों पर संतोष झलक रहा था। लेकिन जैसे ही कुछ अफसरों ने अपनी आपबीती और ईमानादारी के किस्से और राज्यों के मुख्समंत्रियों को उनके सस्पेंड करने, गाली देने या कोई पोस्टिंग न देने के दर्जनों उदाहरण बखान किये गये, तंत्र  का शीर्ष सिर्फ सुनता रहा। काश! मौजूदा राजानीतिक नेतृत्व ऐसे आड़े वक्त में नौकरशाही को कुछ सहारा दे पाता। इतने बड़े जमावड़े पर हुए इतने खर्च के बाद कुछ उत्तर तो मिलने चाहिए। नौकरशाही के सही लोकतान्त्रिक बनने की शुरुआत वर्ष १९७९ में कोठारी समिति के लागु होने पर हुई थी .पहली पीढ़ी के गरीब दलित अपनी अपनी भाषाओं में पढकर नौकरशाही में शामिल हुए थे .अब वहां सिर्फ क्रीमी लेयर ,सहरी बच्चों ,अमीरों का बोलबाला है और इसीलिए लुंजपुंज निर्णय ,लालफीताशाही ,कामचोरी .बड़ी मशहूर उक्ति है दूसरी तीसरी पीढ़ी के नौकरशाह उसी अनुपात में भ्रष्ट होतें हैं .

क्या हर साल  के उपदेश इन्हें बदल सकतें हैं ?

 

दरअसल इसे सिर्फ नौकरशाही के क्षय या गिरावट के रूप में नहीं देखा जा सकता। हां, इनकी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा बनती है। जब आपको ऐसी कमजोर अर्थव्यवस्था के बावजूद बड़ी-बड़ी तनख्वाएं दी जा रही हैं, भविष्य निधि है, मेडिकल सुविधाएं हैं और अब तो इतनी बड़ी पेंशन तो फिर डर क्यों? कहां गया सरदार पटेल का वह स्टील फ्रेम? क्यों जंग खा गया? क्यों सिर्फ सुविधाओं की भूख ही पूरी सिविल सेवाओं या कहें सरकारी नौकरी का एकमात्र उद्देश्य बन कर रह गया है। क्या मंडल के बाद इसीलिए युवा सड़कों पर आत्मदाह कर रहे थे या गुजरात के पटेल, हरियाणा के जाट, राजस्थान के गुर्जर नौकरशाही के इसी लूटतंत्र की खातिर अव्यवस्था फैलाने पर उतारू नहीं हैं?

लेकिन क्या ‘व्यवस्था’, नेताओं के राजनीतिक समूह या दल इतने पाक-साफ हैं? नब्बे के दशक में कही गई इस बात को गौर से पढ़िये- नौकरशाहों और राजनेताओं का समूह सबसे ज्यादा संगठित गिरोह है वेतन-भत्ते, सुविधाओं के हड़पने के मामले में। दिल्ली सरकार से लेकर तेलंगाना, मद्रास के जनप्रतिनिधियों के भत्तों में वृद्धि क्या इसे फिर से पुष्ट नहीं करती।

एक प्रश्न यह भी है कि जब नौकरशाह इतने ताकतवर हैं, उन्हें इतनी सुविधाएं मिली हुई हैं तो राजनेता अपने बच्चों को महंगे दून, सिंधिया, मेयो स्कूलों और उसके बाद इंग्लैंड-अमेरिका में पढ़ाकर भी नौकरशाही की बजाय राजनेता ही बनाना क्यों पसंद करते हैं? माधवराव सिंधिया हों या उनके बेटे ज्योतिरादित्य, दून स्कूल के राजीव गांधी के साथी अरूण सिंह, अरूण नेहरू, मेनका, अजीत सिंह और उनके पुत्र जयंत, अखिलेश यादव…सैंकड़ों नहीं हजारों में हैं राजनोताओं के पुत्र। आखिर राजनीति कहीं तो उन्हें इक्कीस लगती ही है। देश की लगाम सीधे तो इन्हीं के हाथों में होती है। तो बदलाव का हिस्सा बनने की बात तो सही है लेकिन राजनेताओं को उसका उदाहरण स्वयं बनना पड़ेगा- गांधी की तरह। आजादी के संघर्षों के सबसे अच्छे स्वप्न संविधान में जरूर दर्ज हो गए, लेकिन उसके बाद सत्ता पर निरंतर वे ताकतें या दल हावी होते गए जो सिर्फ सत्ता चाहते थे। नौकरशाही तो उन्हीं के इशारों पर नाचती है और अभी भी नाच रही है। इंदिरा गांधी को  इसीलिए प्रतिबद्ध नौकरशाही (committed bureaucracy) और प्रतिबद्ध न्यायपालिका चाहिए थे। और वैसा ही होता गया। कुछ अपवादों को छोड़कर। नौकरशाही के अनुभवों पर छपी किताबों- ‘मोमोयर्स ऑफ ए सिविल सर्वेंट’ (धर्मवीर, आईसीएस), ‘रेड टेप एंड व्हाईट कैप’ (पीवीआरवी राव) से लेकर हाल ही में आई पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम की ‘द लैंड ऑफ नेता एंड बाबूडम’ और ‘इंडिया एट टर्निंग प्वाइंट’, पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख की ‘क्रूसेडर ऑर कांसिपिरेटर’ और विनोद राय की ‘नॉट जस्ट एकाउंटेंट’ में नौकरशाही को मुठ्ठी में बंद चिड़ियां की तरह मसल डालने के उदाहरण भरे पड़े हैं। चित्रा सुब्रमनियम (बोफोर्स पत्रकार )की किताब ‘इंडिया इस फॉर सेल ‘’वर्ष २००० के आसपास आई थी ,इसमें राजनेताओ और नौकेरसाहो के गठजोड़ और दुरुभसंधियोंके सेकंडों उदहारण भरे पड़ें हैं .

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री का धमकी भरा यह वक्तव्य कि हर अफसर के कारनामे हमारे पास पांच मिनट में पहुंच जाते हैं किस बात का सूचक है? अरविन्द केजरीवाल का दावा कि हम अभी दस-पंद्रह साल कही नहीं जाने वाले उसी मानसिकता को दर्शाता है। राजनेताओं का जीवन, आचरण नौकरशाहों के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा होती है। त्रिपूरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार का उदाहरण हर सरकारी कर्मचारी को बताया जाना चाहिए।

इसीलिए जरूरत है तो समाज के हर हिस्से में बदलाव का हिस्सा होने की। अच्छाई और बुराई समान रूप से व्याप्त है- बिल्कुल जीवविज्ञान की इस कसौटी पर कि एक वर्गमील के क्षेत्र में पशु, पौधे सभी की प्रवृत्तियां समान ही होती हैं। प्रवृतियों की इस कसौटी पर हमें नौकरशाहों के साथ-साथ राजनेताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, प्रोफेसरों को साथ ही कसना होगा। और उसकी न्यायाधीश जनता होगी। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कियदि सरकार के कामो की गिरावट इसी रफ़्तार से चलती रही तो निजीकरण को कोई नहीं रोक पायेगा .यह देश हित में होगा या नहीं यह तो वक़्त ही बताएगा .

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