नाम के लेखक

कृपया आप इसे मेरे व्‍यक्‍तिगत राम-द्वेष का कारण न मानें, लेकिन ऐसे अपरिवर्तनवादी समाज में कुछ लेखकों का कोई परिवर्तन करने से पहले अपने नाम से ही परिवर्तन की शुरुआत करना चौंकाता तो है ही । जब मैंने उनसे विवरण लिखकर देने को कहा, तब असली नाम पता चला । असली नाम अरविंद कुमार, कवि नाम-विमल कुमार । हिन्‍दी में ऐसे उपनाम रखने की लम्‍बी परम्‍परा है । अज्ञेय, नागार्जुन, मुद्राराक्षस से लेकर कमलेश्‍वर तक सैकड़ों ज्ञात-अज्ञात लेखक असली नाम की बजाय नकली नाम से ही लिखते हैं । आजादी की लड़ाई के दिनों में स्‍वतंत्रता-संग्राम में भाग लेने वाले प्रेमचंद सरीखे कुछ लेखकों का अलग-अलग नाम से लिखने की बात तो समझ में आती है, लेकिन आजादी के बाद तो शायद ही हमारे किसी लेखक का उसकी रचनाओं के आधार पर उत्‍पीड़न हुआ हो । बल्‍कि इनमें से अधिकांश जो साहित्‍य अकादमी, हिन्‍दी अकादमी और अन्‍य संस्‍थानों के लाखों के पुरस्‍कार बटोरकर और मलाई खा-खाकर मुटिया रहे हों, फिर वे क्‍यों छदमनाम रखकर छिपते फिरते हैं ? कांग्रेसी सरकारें इतनी भी क्रूर नहीं रहीं ।

एक बड़ी मशहूर ब्रिटिश उक्‍ति है-‘गुलामी कानून में नहीं होती, उसे मानने वालों में होती है ।’ इन्‍होंने संभवत:यह सुन लिया था कि रूसी राष्‍ट्रपति स्‍टालिन ने बोरिस पास्‍तरनाक, सोल्‍जेनित्‍सिन या अन्‍य सत्‍ता-विरोधी लेखकों को देश-निकाला, फांसी, जाने क्‍या-क्‍या सजा दी थी, तो कहीं ऐसा न हो कि भारत सरकार भी उन्‍हें ऐसी ही सजा दे दे । हालांकि इन्‍हें अपनी कलम की आग और धुआं के यथार्थ के आधार पर इतना तो अपने अंदर यकीन होगा ही कि फांसी तो हरगिज नहीं होगी, हां, नौकरी जाएगी और भारत मुल्‍क में सरकारी नौकरी का जाना किसी भी फांसी या मौत से कम नहीं है । ये लेखक स्‍टालिन द्वारा प्रताड़ित लेखकों की तस्‍वीर की फेंटेसी में अपनी काया जरूर देखते रहे । पार्टी-प्रतिबद्धता की वजह से स्‍टालिन के खिलाफ कभी एक शब्‍द तक नहीं बोले और हकीकत यह रही कि भारतीय सत्‍ता ने इन्‍हें कभी नोटिस लेने लायक भी नहीं माना-इमरजेंसी के एकाध अपवाद को छोड़कर ।

क्‍या लिखना शुरू करने से पहले मेरे इन युग-प्रवर्तक लेखकों को सबसे जरूरी यह लगा कि समाज में परिवर्तन तो बाद में हो जाएगा या होता रहेगा, पहले परिवर्तन की शुरूआत नाम से करते हैं । मुझे पड़ताल की जरूरत इसलिए पड़ी कि मैं उस मनोविज्ञान के बारे में सोच रहा हूं जिससे गुजरते हुए हम लेखक बनने या बनाने की सोच को अपनी काया पर फिट करने के बारे में सोचते हैं । अपनी कहूं तो ज्‍यादातर हिन्‍दी लेखकों की तरह कविताओं से ही शुरुआत की । वैसे भी इस देश में मुझे यह काम सबसे ज्‍यादा आसान और आपके पास कुछ ‘प्रबंधन क्षमता’ है तो बिना हर्र फिटकरी लगे साहित्‍य, संस्‍कृति में सबसे चोखा रंग देने वाला लगता है । गरीब को भी कविता अपने तईं कुछ करने का एहसास देती है, तो भारत सरकार के सचिव, प्रधानमंत्री, उपकुलपति, राज्‍यपाल, मुख्‍यमंत्री को भी । खैर, तो मुझे मेरे दोस्‍त जिसका असली नाम आयेन्‍द्र था और कवि नाम परवाना, उसने अपने नाम के साथ जुगलबंदी करते हुए सुझाया कि तु ’अनजाना’ उपनाम रख ले । उन मित्र का संकेत, सुझाव, आग्रह यही था कि नाम कुछ फड़कता-सा होना चाहिए जो फ़ौरन ध्‍यान खींचे । जब लेखन की सोचते ही समाज-परिवर्तन की मंशा की बजाय जेहन में फड़कते-चमकते विशेषणों की तमन्‍ना हो, उस हिन्‍दी के लेखक और उसके समाज की दुर्गति दुनिया-भर में अव्‍वल नम्‍बर पर होगी ही । संभव है कुछ तथा कथित बड़े लेखक ऐसे फड़कते, विवादास्‍पद जुमले इसी ध्‍यानाकर्षण के लिए उछालते रहते हों । अफसोस यह है कि उन्‍हें चर्चा में भी वहीं हिन्‍दी की प्रेस बनाए रखती है । बाहर उन्‍हें कोई इतना भी नहीं जानता । न सरकार, न सरकार बनाने वाली जनता ।

एक कारण यह हो सकता है कि अक्‍कल-दाढ़ उगने के बाद उन्‍हें एहसास हो कि मांगे लाल या घूरे लाल तो बड़ा सड़ियल-सा नाम है, अत:बदल दिया जाए । उन्हें अपनी प्रतिभा की रौशनी में पुराना नाम कालिख की तरह लगता हो । लेकिन अरविंद नाम तो उतना ही खूबसूरत है, इसे बदलकर निर्मल या विमल करने के पीछे क्‍या मनो-विज्ञान काम करता है, मेरा दिमाग उसे नहीं पकड़ पा रहा । राजस्‍थान की जनजातियों के कई मीणा-अधिकारी जनजातियों के नाम पर आरक्षण को लूटते हुए सबसे पहले बचपन में हुई शादी की पत्‍नी को बदलने के बारे में सोचते हैं । पता नहीं महात्‍मा गांधी उर्फ मोहनदास ने क्‍यों अपना नाम वही रहने दिया । हमारे लेखकों से सबक लेते तो समाज चाहे नहीं बदल पाते, आजादी मिलती या न मिलती, नाम तो बदल ही सकते थे । आखिर, मोहनदास भी कोई नाम हुआ ।

पिछले वर्ष कैट परीक्षा के पेपर-लीक घोटाले में सुर्खियों में आए अभियुक्‍त डा. रंजीत सिंह उर्फ श्रवण सिंह उर्फ सुमन सिंह ने भी तीन नाम रखे हुए हैं और वे बिहार में विधान सभा के चुनावों में एक बड़ी पार्टी के उम्‍मीदवार हैं । इब्राहीम दाऊद, बबलू श्रीवास्‍तव जैसे कई माफिया डॉन भी ऐसे ही एक से ज्‍यादा नामों पर पासपोर्ट, लाइसेंस रखते हैं । यदि खास-खास विशेषताओं पर जाएं तो हो सकता है इनकी और हमारे लेखकों की जरूरतें, पहचान, थोड़ी-बहुत तो मेल खाती ही होंगी । शायद इन्‍हीं छदम नामों से लिखने के कारण अकसर इस प्रश्‍न से सभी लेखक मुखातिब होते हैं-‘आप किस नाम से लिखते हैं ?’ मानो असली नाम से लिखना कोई आश्‍चर्य या अपराध हो ।

 

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