नरेन्‍द्र दाभोलकर- अप्रतिम योद्धा (शुक्रवार मई 16)

आजाद भारत के इतिहास में अंधविश्‍वास, कूपमडूंकता, धर्म के नाम पर काले धंधों के खिलाफ लड़ने वाला ऐसा अप्रतिम योद्धा दूसरा नहीं हुआ। इसलिए ब्राह्मवादी सोच ने सरेआम 20 अगस्‍त 2013 को पूना में नरेन्‍द्र दाभोलकर की हत्‍या कर दी। पेशे और शिक्षा से चिकित्‍सक डाक्‍टर नरेन्‍द्र के काम, अंजाम, संघर्ष और अंतत: बलिदान की कहानी इन तीनों खंडों में बहुत स्‍पष्‍टता से समेटी गयी है। पूरे देश की नयी पीढ़ी, हर भाषा-भाषी के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है।

नरेन्‍द्र दाभोलकर को पढते वक्‍त कई बातें उभरती हैं कि हिन्‍दी पट्टी विशेषकर उत्‍तर प्रदेश, बिहार बाकई कायरों के प्रदेश हैं। जो वांकुरे कर सकते हैं वह है तो आजादी के बाद से आज तक सिर्फ  सत्‍ता हथियाने की घिनौनी राजनीति जिसके चलते यहां के नागरिकों को दरबदर होकर मुंबई, दिल्‍ली, मद्रास, सूरत सभी जगह लात खानी पड़ती है। दोष इन वेचारे मजदूरों का नहीं है उन तथाकथित राजनेताओं, बुद्धिजीवियों का है जो हर बार इन गरीबों को सही शिक्षा न देकर उन्‍हें धर्म, जाति की उन्‍ही छठ, रमजान, पूजा, भगवती जागरण, सांई बाबा, मूर्तियों में ही बनाए रखना चाहते हैं। वरना, क्‍या कारण है कि समानता, गरीबों के पक्ष में सामाजिक परिवर्तन की, लडा़ई पिछली सदी में ज्‍योतिराव फुले यह लडा़ई लड़ते हैं और मौजूदा वक्‍त में नरेन्‍द्र दाभोलकर, कलवुर्गा, अन्‍ना आदि। नरेन्‍द्र दाभोलकर के अंधविश्‍वासों के खिलाफ संघर्ष के सैंकड़ों किस्‍से इन पुस्‍तकों में विखरें पड़े हैं।

 

Narendra Dabholkar Bookभाग दो में अलग -अलग अध्‍यायों में भूत से साक्षात्‍कार, मीठे बाबा, बाबा जी की करतूत, लंगर का चमत्‍कार दरवेश की पुकार, शनि, भूत के खिलाफ अभियान चलाया तो उन लोगों ने हजारों की भीड़ के समक्ष माफी मांगी कि भूत नहीं होता और हम लोगों को गुमराह करते थे। सत्‍यनारायण की कथा के औचित्‍य पर भी उन्‍होंने सवाल उठाए और जनता का समर्थन हासिल किया। उसी का नतीजा था कि दाभोलकर पूरे हिन्‍दू समाज उन सभी पोंगापंथियों के निशाने पर आ गए। किसी ने उनके सर कलम करने की धमकी दी तो किसी ने महाराष्‍ट्र से निकालने की। उन्‍होंने पुलिस सहायता लेने से भी मना कर दिया और पिस्‍तौल रखने से भी। ‘ये दोनों बातें ही मुझे उचित नहीं लगी क्‍यों‍कि इससे विवेकवादी अंदोलन का मूल तत्‍व ही खत्‍म हो जाता है’ (पृष्‍ठ 130) और तो और कुछ तत्‍वों ने उन पर ईशाई मिशनरियों के इशारे पर काम करने के आरोप लगाए और उन्‍हें अंधविश्‍वास उन्‍मूलन समिति से भी बाहर निकालने के लिए आवाज उठाई। अमेरिका के महाराष्‍ट्र फांउडेान ने ‘दशक का सर्वश्रेष्‍ठ कार्यकर्ता का दस लाख का पुरस्‍कार देने की घोषणा की तो फिर विरोध शुरू इन शब्‍दों में किया गया। ‘धर्मद्रोही डॉ. दाभोलकर को पुरसकार देने वाले अमेरिका का महाराष्‍ट्र फांउडेशन का विरोध करें। लोंगों से इसके खिलाफ ई मेल भेजने की अपील की गई। पुरस्‍कार तो हिन्‍दू विरोधी दाभोलकर द्वारा हिन्‍दुओं के जख्‍मों पर नमक छिड़कने जैसा है। इसलिए इस रोका जाए (पृष्‍ठ 131 भाग-2) लेकिन जब दाभोलकर अमेरिका पहुंचे तो विरोधियों से ज्‍यादा ईमेल पुरस्‍कार के पक्ष  में पंहुचे थे।

 

अंनिस (अंध विश्‍वास निवारण समिति) केवल हिन्‍दु विरोधी हैं इसका जबाव दाभोलकर की पुस्‍तक के इन शब्‍दों से समझा जा सकता है।
अंधविश्वास श्रद्धा के क्षेत्र का काला बाजार है और काले धंधे करने वाले धर्म नहीं देखते। इसलिए अंधविश्‍वास उन्‍मूलन समिति हिन्‍दु, मुस्लिम, ईसाई धर्म के ढकोसलों का बराबर विरोध करती है। हां अधिसंख्‍यक मामले हिन्‍दुओं के जरूर हैं क्‍योंकि भारत में अस्‍सी प्रतिशत हिन्‍दू आवादी है। हिन्‍दू धर्म में जितनी बारीक जाति व्‍यवस्‍था है, सबके अपने अपने कर्म-कांड, देवी-देवता हैं इसलिए अंधविश्‍वासों को पनपने का पर्याप्‍त कारण भी। हिन्‍दुओं के इन अंधविश्‍वासों के खिलाफ हिन्‍दू ही बोलते हैं क्‍योंकि उससे नुक्‍सान तो उन्‍हीं का ज्‍यादा होता है। इसी भाग में ‘भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव क्‍यों’ नामक अध्‍याय भी हैं। (पृष्‍ठ 38-39) जिसमें पूरी एतिहासिकता के साथ इसके कारण गिनाए हैं।

कई निष्‍कर्ष – मां-बाप पहले ऐसे संस्‍कार देते हैं फिर पछताते हैं। हमारे आस-पास कोहली का बेटा, जगदीश का बेटा, दीपक मित्‍तल की बेटी- हरिओम का बेटा- मां-बाप दवाई लेने जाते थे बाबाओं के पास। धीरे धीरे अनेक बच्‍चे भी भक्‍त बने और बरवाद हुए।
हिन्‍दी पट्टी के लिए कई सबक हैं इन पुस्‍तकों में। सौ बरस पहले इन पोंगापथियों के खिलाफ यहां कुछ नहीं कर पाये तो अब तो कर सकते हैं। अब तो उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, बिहार में सामाजिक न्‍याय की सरकारें हैं। धीरे धीरे इन्‍हें भी तीन दशक हो रहे हैं। इन कुरीतियों का शिकार तो यही तबका है। सौभाग्‍य से हिन्‍दी का पढा लिखा बुद्धिजीवी लेखक समुदाय भी इन्‍हीं सरकारों की पक्षधरता का दावा करता है और सत्‍ता पर काबिज मौजूदा शासकों या उनसे पहले की कांग्रेस सरकारों के प्रति भी वे दक्षिणपंथी ताकतों के मुकाबले ज्‍यादा नरम और नजदीक हैं। उन्‍हीं से पुरस्‍कृत उपकृत भी। फिर एक भी दाभोलकर क्‍यों नहीं पैदा होता यहां जो सत्‍ता को चुनौती दे? क्‍यों नहीं महाराष्‍ट्र जैसा कानून इन प्रदेशों में लाया जाता? महाराष्‍ट्र में कानून बने दो वर्ष (2014 के शुरू में बना) होने जा रहे हैं जिसके अतर्गत तीन सौ गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। क्‍या इनकी इतिश्री दाभोलकर या कलवुर्गों के नाम पर जंतर-मंतर पर घंटे दो घंटे धरना प्रदर्शन करना भर है? बुराइयां तो पटना, इलाहाबाद, लखनऊ, कानपुर में हैं धरना विरोध के नाम पर लेकिन इनके खिलाफ लड़ाई का ड्रामा दिल्‍ली में खेला जाता है। नरेन्‍द्र दाभोलकर के प्रति सच्‍ची श्रदांजलि यही होगी जब इन किताबों को हर स्‍कूल में बांटा जाए और ऐसे ही समानांन्‍तर लडा़ई जल्‍द से जल्‍द पूरी हिन्‍दी पट्टी में शुरू की जाए। लेखकों को और दो कदम आग बढ़कर सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई का नेतृत्‍व करना होगा।

पूरे महाराष्‍ट्र में समिति की 180 शाखाएं है जो पिछले 20 वर्षों से राज्‍यभर में कार्यरत है। मुकदमेबाजी, मारपीट, संघर्षो के सैंकडों किस्‍से बिखरे पड़ें हैं इन संकलनों में/ हजारों कार्यकर्ता सक्रिय है। समिति के मुख्‍य क्षेम हैं- वैज्ञानिक जागरण, विवेकवादी जीवन दृष्टि का प्रचार- प्रसार बुबावा जी का पर्दाफास, ज्‍योतिष, भानमति, डाकिन, जादू टोना कर्म कांड का विरोध और अन्‍तर्राजीय धार्मिक विवाह का समर्थन।

हमें दिल्‍ली क्षेत्र के कई विमर्शो पर पुन: विचार करने की जरूरत है। जैसे ब्राह्मणवाद का विरोध जायज है सारी शोषण व्‍यवस्‍था का आधार भी ब्राह्मणवाद हे लेकिन जब जन्‍मना ब्राह्मण पर ही हमला करते हैं तो यह तर्कहीन है। ब्राह्मणवाद को दूसरी जातियों वाले भी उसी ढंग से फैला रहे हैं। वही वास्‍तु, ज्‍योनिष, जन्‍मकुडली, पूजा, ग्रह नक्षत्र। लेकिन जाति जानते ही कई बुद्धिजीवी चुपी साध लेते हैं। बडे़ भोलेपन से कहते हैं इनमें यह बुराई धीरे-धीरे समाप्‍त होगी ।लेकिन अफसोस अं‍धविश्‍वास, धर्मांधता इन गैर ब्राह्मणों में भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। कहां तो हम इन बुराइयों को खत्‍म करने चले थे और कहां इसका उल्‍टा हो रहा है हमारी कायरता से । नरेन्‍द्र दाभोलकर ने खुलकर ऐसे जातिगत ब्राह्मणवाद की निंदा की है। अच्‍छी बातों के लिए उन्‍हें सावरकर भी (जिन्‍हें हर जगह स्‍वातंत्र्य वीर सावरकर लिखा गया है।) स्‍वीकार्य है। सावरकर को उदधृत करते हुए वे कहते हैं- धर्मग्रंथ में जो लिखा है यदि वह प्रत्‍यक्ष सबूत, निरीक्षण, अनुभव और प्रयोग से साबित हो तभी स्‍वीकारें। पुरातन युग के ग्रंथ बंद करके विज्ञान युग का पन्‍ना पलट कर देंखें इन ग्रंथों में कल क्‍या हुआ था। (पृष्‍ठ 111 भाग 3) इसी तरह संत गाड्गे बाबा तर्क की बात करते हैं तो वे भी स्‍वीकार्य हैं। सिर्फ संत नाम में लगाने से अतार्किक चिड़ क्‍यों। ईश्‍वर की खिल्‍ली (पृष्‍ठ 111) जैसी संत गाड्गे बाबा उड़ाते हैं वैसे तो हिन्‍दी का बुद्धिजीवी भी नहीं उड़ाता। दाभोलकर ने तीसरे खंड में बहुत तर्क के साथ समान नागरिक कानून की बात का भी समर्थन किया है।(पृष्‍ठ 130 भाग :3) तो ईश्‍वर, खुदा को खुश रखने के नाम पर बकरे की बलि का विरोध भी। लगता है इन्‍हीं सब कारणों से नरेन्‍द्र दाभोलकर किसी भी राजनीतिक पार्टी को हज़म नहीं हुए। असली बुद्धिजीवी की यही पहचान है और यही योगदान।

इन पुस्‍तकों के संपादक डॉ. सुनील कुमार लावटे और हिन्‍दी अनुवाद की भी तारीफ की जानी चाहिए- हिन्‍दी में इन पुस्‍तकों की इतनी आर्कषक सहज, पठनीय प्रस्‍तुति के लिए।

किताबें:
नरेन्‍द्र दाभोलकर:अंधविश्‍वास उन्‍मूलन (3 भाग)
संपादक डॉ. सुनील कुमार लवटे
मराठी से अनुवाद भाग-एक-आचार- डॉ. चंदा गिरीश
भाग- दो – विचार- प्रकाश कांवले
भाग- तीन- सिद्धांत- विजय शिंदे
प्रत्‍येक: 150/- रूपये- पेपरवैक
राजकमल प्रकाशन, दिल्‍ली—2

 

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