नये शाहजहां

देश भर के नौजवानों के लिये शाहजहां रोड बड़ी जादुई जगह है । इससे गुजर कर न जाने कितने वैतरणी पार कर गये तो उससे हजार गुना किसी काम के नहीं रहे । वैतरणी पार कर गये नब्बे प्रतिशत नौकरशाह इस गलतफहमी में बरबाद हुए और इस देश को भी कर रहे हैं कि वे सब कुछ जानते हैं, वे सर्वज्ञ हैं । हिंदी पट्टी के ज्यादातर नौजवान शाहजहां रोड से पिटकर पत्रकारिता में लौटे तो ताउम्र नौकरशाही उनकी स्वाभाविक दुश्मन बन गयी । वे सरेआम कहते हैं कि पांच-सात प्रश्न क्या रट लिये ये बाबू जमीन पर पैर ही नहीं रखते । नौकरशाह कहते हैं कि हम पत्रकारों की तरह गाल नहीं बजाते जनता की भलाई के लिये नीतियां बनाते हैं, उनकी समस्याएं सुलझाते हैं, जान पर खेलकर देश तो हम चलाते हैं । गाल बजाने और काम करने में बड़ा अंतर है । पत्रकार चुटकी लेते हैं राजधानी के ऐ.सी. कमरों में रहने वाले ये बड़े बाबू क्या जाने जनता का दर्द ! इसीलिये ऐसी नीतियां बनाते हैं जो जनता के सिर के ऊपर से गुजर जाती हैं ‘जनता’ शब्द का इस्तेंमाल राजनेताओं की तरह ये भी दोनों पक्ष कम नहीं करते । शाहजहां रोड का ठप्पा लगे बड़े बाबू तमक उठते हैं ये सेक्रेटरी, ज्वाइंट सेक्रेटरी को भी बाबू लिखते हैं । सिविल सेवा में पास न होने की इनकी खिसियाहट पूरी उम्र नहीं जाती । छत्तीस का आंकड़ा हर समय सिर्फ उस समय को छोड़कर जब दोनों नेताओं के अगल-बगल बैठे हों ।

 

शाहजहां रोड़ को छूते ही गरीब देश के गरीब घरों से आए नौजवान भी तंत्र और अमीरों की संगति में रातों-रात बदल जाते हैं । कमरे का फर्श लकड़ी का करो और ये परदे मुझे पसन्द नहीं । कुर्सी, सोफा, परदे सब एक कलर के चाहिए । और सुनो ! कलर मैं बाद में बताऊंगा । मेरे गुरूजी अभी सत्संग में गये हुए हैं वे नये साल में आएंगे । रंग वे बताएंगे और मेज भी किस दिशा में लगेगी ये भी फैसला उन्हीं का होगा । उनके पास एक इलेक्ट्रोव मैगनेटिक जर्मन यंत्र है । उससे देखकर बताते हैं कि मेज ऐसी जगह होनी चाहिए जिससे कमरे में प्रवेश करने वाली नैगेटिव ऐनर्जी खत्म हो जाए । अच्छा पूर्व दिशा कौन सी है ? पूजा की चीजें उधर रखनी हैं । काका नगर में एक अधिकारी की पत्नी शाहजहां रोड़ के एक और मातहत अधिकारी को हड़काती है कि इस खंडहर की तरफ खुलने वाली खिड़की को बंद कर दो । यह अशुभ होता है । खंडहर ? मेम साहब ने खुलकर बताया ‘अरे ! वही जिसे तुम हुमायूं का मकबरा कहते हो ।’ लुटियन की दिल्ली में इनके बंगलों की देख-रेख में लगा इन्हीं शहशाहों में से एक कहता है इनकी खवाहिशों का अंत नहीं । हर ख्वाहिश ऐसी कि सरकारी तिजौरी खाली हो जाये । ये हैं चंद नमूने तथाकथित शहंशाहों की सांस्कृतिक व वैज्ञानिक समझ के ।

 

आईये इन नये शहंशाओं के कुछ और एक्सरे देखते हैं । आपने भूतपूर्व केबिनेट सैक्रेटरी किताब ‘बाबूडम’ पढ़ी ? प्रश्न पूछते ही बड़े बाबू उबाल खा गये । मैं नहीं पढ़ता । जो कुछ नहीं कर पाते वही रिटायरमेंट के बाद ये सब लिखते हैं । मैंने तो अखबार पढ़ना भी छोड़ दिया है । क्या होता है उसमे ? और सुनो- मैं नहीं चाहता कि मेरे विचार किसी के लेख से प्रभावित हों । कितने उच्चे आदर्श हैं मेरे नये शहंशाहों के । यानि नौकरी के राजमहल में घुसने के बाद सिद्धांत रूप में भी पढ़ना-लिखना बंद ।

 

एक वक्त था जब अंग्रेजी राज में आई.सी.एस. की पोस्टिंग से पहले उन्हें अंग्रेजी, लैटिन के साथ-साथ भारतीय भाषा संस्कृति का ज्ञान भी जरूरी था । उस क्षेत्र को समझने-जानने के लिये । जो गजेटियर, विवरण लिखे वे उनकी भारतीय समाज, जन, जनजाति, परंपराओं को जाने के पुख्ता प्रमाण है । और अब शाहजहां रोड से फिलहाल गुजरकर आने वाला एक अफसर कहता हैं मैं हिंदी क्यों पढूं । मुझे कहीं कोई जरूरत नहीं पड़ती है । इतना बोलना तो आता ही है । शायद इन्हीं पदचापों की आहटों को सुनकर कोठारी रिपोर्ट ने भारतीय भाषाओं के लिये जो किया अब उसे भी उल्टा जा रहा है । अब वे ज्यादा चुने जायेंगे जो ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज में पढ़ें या दूसरे अंग्रेजीदां स्कू‍लों में पढ़े हों ।

 

ऐसा नहीं कि स्टी‍ल फ्रेम के ये हिस्से या रखवाले शुरू से ही ऐसे थे । आई.सी.एस. की विरासत में जाति धर्म से परे शासन, न्याय, व्यवस्था में ज्यादातर चीजे अच्छी मिली तो अपने को शंहशाह समझने की एकाध बुराई भी । लेकिन अच्छा हिस्सा तो भारतीय राजनीति की बुनावट से गायब होता गया । शंहशाही और विकृत रूप में मजबूत । गलती व्यक्तिगत रूप से इनकी भी नहीं । एक समाजशास्त्री के कथन पर यकीन किया जा सकता है, जो भी परीक्षा प्रणाली हो, थे तो ये सर्वश्रेष्ठ् ही । गड़बड़ यह हुई कि अकल के इन पुतलों को अपनी प्रतिभा, रचनात्मकता को दिखाने का पूरा मौका तंत्र ने नहीं दिया । आखिर ऊर्जा, अकल तो है ही बस पौरस के हाथी की तरह उल्टे अपने ही तंत्र को जीतने, शोषण करने में जुट गये । अपने आका राजनेताओं की संगति में हर पल सुविधाओं, जोड़-तोड़ में लगे ।

शाहजहां रोड से गुजरते वक्त मुझे अमरकांत की कहानी डिप्टी कलेक्टरी के साथ-साथ फिल्मीं गीत भी याद आ रहा है- इस इमारत ने कितने घर तोड़े, कितने जोड़े; जाने क्यों लोग मुहब्बंत किया करते हैं ।

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