नकल की शिक्षा

परीक्षा केन्‍द्रों पर अखबारों, मीडिया में आ रही खबरों पर सारी दुनिया को आश्‍चर्य हो सकता है लेकिन उत्‍तर प्रदेश, बिहार या कहें हिंदी पट्टी के नागरिकों के लिए यह कोई अनौखी बात नहीं है । बस थोड़ा अनौखापन यह लगा कि चार मंजिला इमारत की खिड़की पर नकल कराने वाले जांबाज लटके हुए हैं । कह सकते हैं कि चार दशक पहले जो नकल पहली मंजिला थी अब वो चार गुना बढ़ कर चार मंजिला हो गई है । नकल यानि चोरी और यह दिन के उजाले में इस स्‍तर पर हो तो शायद इसे डाका और लूटमार जैसे शब्‍दों में भी नहीं रखा जा सकता । हम तो वर्षों से स्‍कूल, कॉलेजों, शिक्षा संस्‍थानों को ज्ञान के मंदिरों के रूप में कहते, सुनते आए हैं तो क्‍या इस शिक्षा व्‍यवस्‍था ने मंदिरों को भी अपराध के ऐसे अड्डे बना दिया है जहां किसी को किसी का डर नहीं ? शिक्षा व्‍यवस्था के स्‍कूलों के प्राचार्य, शिक्षकों का क्‍या दायित्‍व है ? और क्‍या ऐसे हर अपराध में पुलिस व्‍यवस्‍था भी उतना ही सहयोग देती है जितनी अभिभावक या छात्रों के दूसरे संबंधी । यह हाल अकेले बिहार का नहीं है । उत्‍तर प्रदेश की स्थिति भी उतनी ही गंभीर है । और क्‍यों न हो जहां नकल के एजेंडे पर ही एक नयी समाजवादी सरकार बीस साल पहले उत्‍तर प्रदेश में बनी थी । तत्‍कालीन शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सख्‍ती से नकल पर पाबंदी लगाई थी । उसका समाजवादी काट छात्रों को नकल की छूट देकर किया गया था और जनता ने उन्‍हें चुना भी । बस उसके बाद तो उत्‍तर प्रदेश और बिहार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा । नकल में दुनिया भर में अव्‍वल ।

 

इन्‍हीं ऐसी खबरों से उत्‍तर प्रदेश, बिहार से परीक्षा देने वाले, बोर्ड से पास होने वाले विद्यार्थियों पर भी विश्‍वास उठ चुका है । उत्‍तर प्रदेश, बिहार के उन मेहनती छात्रों को भी अपमानित होना पड़ता है जिन्‍होंने अपनी मेधा के आधार पर अच्‍छे अंक पाए हैं । शक की सूई बेईमानी, नकलची छात्रों के कुकर्मों से पूरे राज्‍य के मेधावी, मेहनती छात्रों पर भी ।

 

ज्‍यादा पुरानी बात नहीं है । पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के एक विकलांग बच्‍चे ने यह बताया कि वह भी दसवीं पास हो गया है क्‍योंकि उसकी जगह उसका बड़ा भाई परीक्षा दे आया था । अफसोस की बात यह है कि अपाहिज बच्‍चे के दसवीं के पास होने की खुशी पूरे परिवार की आंखों में थी । धोखाधड़ी, बेईमानी का अपराधबोध दूर-दूर तक नहीं । परीक्षा के इन दिनों में उत्‍तर प्रदेश, बिहार के रिश्‍तेदार एक दूसरे की मदद के लिए पहुंचते हैं । राम, रहीम से लेकर विवेकानंद, गांधी के देश की नैतिकता का यह है नमूना । गिरावट है तो सत्ता शीर्ष से शुरू होकर नीचे के पायदान तक । वैसे नैतिकता जैसे शब्द की हजारों परिभाषाएं भी इस क्षेत्र ने गढ़ ली हैं । नकल करना, कराना और इस के लिए घूस देना, लेना उन्हें कहीं से भी अनैतिक नहीं लगता । वे साफ कहते हैं जब हमें अपने काम के लिए घूस देनी होती है तो हम क्यों न लें । इस साँचे से निकले हुए अधिकतर बच्चे वे चाहे पुलिस में हों, कचहरी में भर्ती हों, अमीन हों या पटवारी उनके आगे भ्रष्टाचार के खिलाफ बजाया हर बाजा भैंस के आगे बीन बजाना है ।

 

उत्तर प्रदेश, बिहार के स्कूलों की शिक्षा का यह एक नमूना है । बुलंदशहर जिले के लोग कहते हैं कि एटा में अच्छी नकल होती है और एटा वाले अलीगढ़ और बलिया का नाम लेते हैं । दसवीं, बारहवीं की बोर्ड परीक्षा के रेट बंधे हुए हैं । पाँच हजार, सात हजार, दस हजार । पेपर शुरू होते ही हल की हुई पुस्तिका छात्रों के बीच नकल करने के लिए वितरित कर दी जाती हैं । बस हो गई परीक्षा । जो पैसा इकट्ठा होता है वह शिक्षा व्यवस्था में नीचे से ऊपर तक बांट लिया जाता है । विज्ञान की दसवीं, बारहवीं की पढ़ाई में जो प्रायोगिक परीक्षा होती है उसमें प्रति छात्र पाँच सौ या हजार लिये जाते हैं और इसका भी ऐसा ही बंदर बाँट । इन सबसे शिक्षकों की आमदनी कई गुना बढ़ गई है और वह भी बिना पढ़ाए । कुछ लोग इसमें और इजाफा टय़ूशन करके कर रहे हैं । इतना सब करने से उत्तर प्रदेश में शिक्षक की नौकरी एक ऐसे आनंद की जगह बन गई है जिसे पाने के लिए पाँच से दस लाख रूपये रिश्वत देकर भी भीड़ बनी हुई है । स्कूल प्रबंधन भी खुश है इस अतिरिक्त कमाई से । इसीलिए वे एक के बाद एक स्कूल खोलने और उसे सरकारी मान्यता दिलाने के लिए रात-दिन राजनैतिक गठ जोड़ में लगे रहते हैं ।

 

साल में कम से कम दस-बीस सर्वे तो ऐसे आते ही हैं कि आठवीं का बच्‍चा अपना नाम नहीं लिख सकता या पांचवी का बच्‍चा दूसरी कक्षा की किताब नहीं पढ़ सकता । यह बढ़ते-बढ़ते अब इंजीनियरिंग कॉलेजों और विश्‍वविद्यालयों तक पहुंच गया है जहां प्राध्‍यापक बताते हैं कि हम इन इंजीनियरों को इंजीनियरिंग पढ़ाए या चार वाक्‍य हिंदी, अंग्रेजी में लिखना सिखाएं । वर्षों तक ऐसी नकल चलने के बाद यदि दुनिया के दो सौ या पांच सौ विश्‍वविद्यालयों में हमारी गिनती कहीं नहीं है तो इसमें आश्‍चर्य की कोई बात नहीं । मीडिया की इन खबरों पर कुछ आश्‍चर्य दक्षिण भारत के राज्‍यों को जरूर होता होगा कि हिंदी प्रदेश के नागरिक क्‍यों शिक्षा की खातिर बंगलौर, नागपुर, पूना, तमिलनाडू या उससे भी आगे इंग्‍लैंड, अमेरिका भाग रहे हैं ।

 

माना कि शिक्षा विषय राज्‍य की समवर्ती सूची में आता है लेकिन ऐसी खबरों को दिल्‍ली कब तक अनसुनी करती रहेगी ? आखिर केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय का दायित्‍व तो पूरे देश की शिक्षा व्‍यवस्‍था को देखना और नियमित करना है । इसीलिए ही तो राज्‍यों के शिक्षा बोर्ड से लेकर यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन आदि संस्‍थाएं बनाए गई हैं । क्‍या इसका इलाज भी विदेशी विश्‍वविद्यालय लाना है ? फिर कैसा स्‍वराज्‍य और कैसी आजादी जब विदेशी भाषा से लेकर सब कुछ वही करेंगे और हम सिर्फ नकल करेंगे, करायेंगे ।

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