दामिनी कांड – सत्ता और समाज का क्रूर चेहरा

दामिनी कांड ने आजादी के बाद की सत्ता। के नाटक की सारी कलई खोल दी है । रोज एक परत खुलती है । इन नृशंस कृत्यों के बावजूद भी राष्ट्र पति का बेटा विरोध प्रदर्शन का यह कहकर मजाक उड़ाता है कि यह सब रंगे-पुते लोगों की नौटंकी है । एक और नेता कहता है कि लड़कियां बाहर निकलती ही क्यों हैं ? ऊपर से यह नमक लगाते हुए कि आजादी का मतलब सड़क पर घूमना नहीं है । कुछ दिनों पहले एक और नेता और हरियाणा की खाप पंचायतों ने कहा था कि इनकी शादी की उम्र कम कर देनी चाहिए । एक और धर्म का नुमाइंदा कहता है कि चालीस वर्ष से कम उम्र की महिलाएं बाजार अकेली न जाएं । एक और संगठन बेलेटाइन-डे पर लड़कियों के साथ बदसलूकी करता है । कश्मी र से कन्या। कुमारी तक शायद ही किसी पार्टी का दामन साफ हो । इन्हीं को हम लोकतंत्र का रखवाला कहते हैं । संसद और विधायिकाएं- कानून बनाने का अधिकार इन्हींन को दे रखा है । इस कांड की रोशनी में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जो कानून हैं कितना तो उन पर अमल होगा और सत्ताक के ऐसे नुमांइदों के रहते कौन-सा कानून भविष्या में बनेगा । दुनिया का तथाकथित सबसे बड़ा लोकतंत्र जंगलराज की तरफ धीरे-धीरे बढ़ता ।

दिल्लीत से लेकर मणिपुर और तमिलनाडु तक सड़कों पर उतरे नौजवानों की दाद देनी चाहिए कि वे एकजुट, निर्भय होकर सड़कों पर उतरे । दुनिया भर में बदलाव तभी आता है जब यह पीढ़ी सड़कों पर उतरती है । आप इनकी मोमबत्तियों की मजाक न उड़ायें । ऐसा न हो कि इनकी मोमबत्तियों की लौ छूते ही सत्ताम भस्म हो जाएं । अच्छीी बात यह रही कि अभी तक पूरा विरोध और प्रदर्शन अहिंसक रहा है । एक-आध छिट-पुट हुई घटनाओं को छोड़कर । तंत्र, उसका मीडिया या सत्तार के भोंपू बुद्धिजीवियों ने हर बार की तरह ऐसे विरोध, प्रदर्शन को कभी मध्यत वर्ग के नाम पर खारिज करना चाहा तो कभी जाति, धर्म की अपनी विकृत मानसिकता के तहत नुमांइदगी के आधार पर ।

बार-बार उंगली सत्ता् के दोगले बेईमान चरित्र की तरफ उठती है । अगर सत्ता ईमानदारी होती तो लड़की को सिंगापुर भेजने की नौटंकी न करती और न रोज-रोज बयान बदलती । बेईमान, झूठी सत्ता़ सबसे कायर भी होती है । इसीलिए कई दिन तक जंतर-मंतर के आसपास मैट्रो बंद रही । धारा 144 लगा दी गई । लेकिन नौजवानों का गुस्साए कि मुख्यकमंत्री पुलिस की निगरानी में ही वहां से निकल पायीं । ज्यालदातर मामलों में पुलिस वालों को दोषी करार दिया जाता है । नहीं ! यह सरासर गलत है । पुलिस उसी समाज का हिस्सा हैं जहां बलात्कासरी पैदा होते हैं और जो समाज वोट के दम पर नेताओं को चुनते हैं । पुलिस की चूक और ज्याकदतियां तो सामने आती हैं लेकिन क्याट उस बृहत्त र समाज को माफ किया जा सकता है जो गुस्सेय के बावजूद भी टुकुर-टुकुर देखता रहता है । कई घंटों तक इतनी बड़ी बस दिल्ली की सड़कों पर घूमती रही यह सरासर पुलिस की चूक थी । लेकिन जहां बस दामिनी को फैंक कर गई थी वहां भी बीस-तीस लोग खड़े थे । उन्हों ने क्याम किया ? क्यान समाज का कोई दायित्व नहीं होता ? क्याख हमारे आस-पास ऐसा रोज नहीं हो रहा ? क्याय केवल कानून बनाने से समाधान हो जायेगा ?

ऐसे किसी प्रश्नस पर ठहरकर सोचें तो समाज सबसे महत्वेपूर्ण घटक है । क्याय वर्षों से हम नहीं सुनते आ रहे कि दिल्ली और उसके आसपास के समाज में लड़कियां या महिलाएं सबसे ज्याोदा असुरक्षित हैं । सैंकड़ों दास्ताऔन महिलाओं की रोज अखबारों में भरी रहती हैं । शाम, अंधेरा होते ही उनके चेहरों पर डर पुत जाता है । देश के दूसरे शहर भी पूरी तरह मुक्त न हों लेकिन देश की राजधानी दिल्ली सबसे ज्या‍दा असुरक्षित है । और सत्ता के नुमांइदे कहते हैं कि ऐसे विरोध प्रदर्शन से देश की तस्वी्र विदेशों में गिरेगी । कितनी चिंता है देश की तस्वीेर की इन नेताओं को ! संसद में हाथापाई, माईक लेकर एक-दूसरे को मारना, लगातार चलने वाले बायकाट ? क्या यह सब देश की तस्वीार को बेहतर बनाते हैं ?

हम इस मोड़ तक क्याह इसलिए नहीं पहुंचे कि हमारी विधायिकाएं और संसद में लगातार ऐसे लोगों की संख्याह बढ़ती रही हैं जिनके हाथ खुद ऐसे अपराधों से रंगे हुऐ हैं । उनके खिलाफ तो पुलिस में एफ.आई.आर. तक दर्ज नहीं की जा सकती और जब कोई अरविंद केजरीवाल या अन्नान हजारे सत्ताफ के नुमांइदों के खिलाफ आवाज भी उठाता है तो सत्ता अपने मीडिया-तंत्र या साठ साल से अपने पाले हुए बुद्धिजीवियों की मदद से उसे भी खारिज कर देती है । इस पूरे प्रकरण पर उन बुद्धिजीवियों की भी कलई कम नहीं खुली जो साम्प्रउदायिक विरोध के नाम पर एक नाटक रचता और शामिल होता हुआ ऐसी सत्तानओं के सहारे जिंदा हैं । इन स्थितियों के लिये जिम्मेतदार सत्ताल के बराबर ही बुद्धिजीवी भी हैं । विशेषकर हिंदी पट्टी के क्यों कि बलात्का र की ज्यािदातर ये घटनाएं हिंदी क्षेत्रों में हैं । घूंघट और बुरका, लिंग अनुपात, स्त्रियों पर अत्यापचार सभी में ये क्षेत्र देश को शर्मिंदा कर रहा है । यहां इस क्षेत्र के पत्रकार, लेखकों का काम जागरूकता पैदा करना था लेकिन वे चंद विज्ञापनों, कमेटी के सदस्य या दूसरे प्रलोभनों में इन प्रश्नोंख से बचकर निकलते रहे हैं । अचानक नहीं है कि जब पूरे देश के नौजवान कई तरह के गुस्सेइ से बजबजाते बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के सड़कों पर उतर रहे हैं हिंदी का ज्या दातर लेखक समुदाय अपनी चुप्पीन से सत्ता। के साथ खड़ा दिखता है ।

प्रश्नक है कि आगे का रास्ताम क्या् हो ? आगे का रास्ताह निकलेगा उस समाज, उस शिक्षा से जो जन्मा से ही लड़के-लड़कियों के भेद के खिलाफ हो । यह एक स्वकप्ने नहीं हकीकत है । सौ-दो सौ साल पहले यूरोप, अमेरिका में भी स्त्रियों को वह बराबरी नहीं थी । धर्म से जैसे-जैसे यूरोप को मुक्ति मिलती गई स्त्रियां बराबरी के अपने अधिकार प्राप्तस करती गईं । हमारी शिक्षा में हमें उस धर्म से मुक्ति पानी होगी जो तरह-तरह के श्लोवकों और आयतों के बूते पहले तो लड़कियों को पैदा ही नहीं होने देता और हो भी जाएं तो न वे अपनी संख्यां के अनुपात में स्कूयल में होती, न सरकार में, न संसद में । वे बराबरी की मांग करें तो उनकी देह और कपड़ों के आधार पर समाज का कट्टरपंथी तबका मजाक उड़ाता है । क्याो मौजूदा भारत की स्त्री की स्थिति ऐसी है जिसे इक्की सवीं सदी का भारत कहा जा सके । हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्म इतने क्रूर और अमानवीय हैं कि औरत इनके बोझ से कभी मुक्ति नहीं पा सकती । स्त्रीम की मुक्ति इन धर्मों की जकड़न से बाहर ही संभव है । धर्म, जाति से मुक्ति इस देश के गरीब वंचितों को भी मुक्ति दिलाएगी ।
कुछ कदम तुरंत शिक्षा के जरिए उठाने होंगे – सबसे पहले स्कूाल पाठ्यक्रम की किताबों को देश भर में जांचा परखा जाये कि वे अनजाने में भी लड़की-लड़के का भेद-भाव न करें और न उन बातों, रीति-रिवाजों जैसे करवा चौथ या दूसरे स्त्री केन्द्रित व्रतों आदि को बढ़ावा न दें जो सदा के लिये उन्हें दोयम या निचले पायदान पर खड़ा करते हैं । एन.सी.ई.आर.टी. का नया पाठ्यक्रम संकेत में बहुत संवेदनशीलता से बराबरी की बात करता है । यदि इन्हींे किताबों को भी अनिवार्य रूप से लागू कर दिया जाये तो अगले पांच बरस में अपेक्षित परिणाम मिल सकते हैं । एन.सी.ई.आर.टी. एक राष्रीा य शैक्षिक संस्थाा है । अत: इस पाठ्यक्रम को कड़ाई से शिक्षा की हर संस्थान- सरस्वकती, शिशु मंदिर, मदरसे से लेकर सभी सरकारी निजी स्कू लों में राष्ट्रीोय हित लागू किया जा सकता है ।
ऐसा ही दूसरा कदम फिल्मों की पटकथा, आइटम गीत आदि की समीक्षा है । मनोरंजन के नाम पर स्त्री को एक आइटम, वस्तुज के रूप में पेश करना अपराध की श्रेणी में शामिल होना चाहिये ।
दामिनी कांड सत्‍ता के साथ-साथ भारतीय समाज के क्रूर चेहरे का भी आइना है और इसे तुरंत हर स्तसर पर बदलने की जरूरत है ।

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