शत प्रतिशत का पैमाना (जागरण)

पिछले कुछ वर्षों से पूरा देश सुन रहा है दिल्ली विश्‍वविद्यालय में दाखिले की इस कट-ऑफ के बारे में हर वर्ष और कुछ पांइटी ऊँची हो। पहले एक-दो कॉलेज में 100 के करीब थी अब कई कॉलेजों में मान भी लें अच्छी बात है बच्चे मेहनती के धावी हैं तो नम्बर भी अच्छे लायेंगे लेकिन दाखिले के बाद फिर क्या हुआ? कॉलेज में प्रतिभाओं के इस झुंड ने कोई खोज की? कोई ऐसा आविष्‍कार किया जिससे देश दुनिया को बदला हो। किसी बीमारी को रोका हो, प्राकृतिक आपदा को जानने का उपकरण बनाया हो। या इन कॉलेजों के वातानुकूलित मैकडोनाल्ड, कैन्टीन, क्लासों में 2-3 वर्ष और अंग्रेजी सुधारकर विदेश या बहुराष्‍ट्रीय कम्पनियों में चले गये? देश की सिविल सेवा में भी गये तो वहाँ भी भ्रष्‍टाचारा, बदतमीजी, कुशासन के अनोखे कीर्तिमान बना डाले। ऐसी ऊँची प्रतिष्‍ठता पाने वाले छात्र जब एक अन्तर्राश्ट्रीय घीसा नाम भी याद आते है। दुनिया बदल देने वाले वैज्ञानिकों, लेखकों के बचपन और स्कूली दिन। आइंस्टाइन’ 20वीं सदी के महानतम वैज्ञानिक हैं। लेकिन स्कूल में थे निपट भौंदू। माँ-बाप भी उन्हें बुद्धु ही समझते थे। जैसे-तैसे विश्‍वविद्यालय में उनका दाखिला हुआ और आगे चल कर प्रिंस्टन विश्‍वविद्यालय भौतिकी के प्रोफेसर भी हुए और नॉवल पुरस्‍कार भी मिला। महान जीव वैज्ञानिक और विकासवाद के जनक डॉबिन को कभी किसी स्कूल ने दाखिला नहीं दिया और तो और प्रोफेसर यशपाल जब अमेरिका पढ़ने गये तो प्रवेश परीक्षा में असफलत रहे। भला हो अमेरिकी विश्‍वविद्यालयों का जिसमें एक महीने बाद प्रोफेसर यशपाल को फिर से मौका दिया। आज पूरा देश प्रोफेसर यशपाल के योगदान से परिचित है। आखिर इन सभी उदाहरणों से हम क्यों नहीं सीखाते।

पूरी दुनिया शिक्षा की बहेत्तरी की तरफ बढ़ रही है और इस बेहत्तरी में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। अपनी भाषा में पढ़ने-पढ़ाने का बच्चों को तनाव मुक्त रखने का। शिक्षक और स्कूल जैसी संस्थाएं में भी बदलाव आएं हैं। लेकिन भारतीय संदर्भ में प्रसिद्ध शिक्षाविद्  जॉन टेलर गेट्टोका सहारा लिया जाए तो भारतीय स्कूल-कॉलेज मूढ़ बनाने के कारखाने में तबदील हो रहे हैं।

परीक्षा में बैठे तो भारत का नम्बर छियत्तर देशों में सबसे फिसड्डी क्यों रहा? और क्यों फिसड्डी रहने के डर से भारत ने इसमें अब भाग लेना भी बंद कर दिया है? सौ में सौ लाने के डकें से हम किसको मूर्ख बना रहे हैं? क्या अंग्रेजी और अमीरी के बूते शिक्षा के नाम पर स्कूली धंधा अब कॉलेज विश्‍वविद्यालयों को भी अपनी चपेट में ले रहा है?

प्रसिद्ध इतिहासकार रामचन्द्र गोहा की किताब अंतिम उद्धारवादी में महात्मा गाँधी की मार्कशीट नाम का बहुत रोचक बोध’’ परक लेख है। इस लेख के अनुसार स्कूल में महात्मा गाँधी की उपस्थिति बहुत खराब रहती थी और वार्षिक परीक्षा में 45 से 55 प्रतिशत के बीच अंक मिलते थे। मैंट्रिक परीक्षा में शामिल’’ 3067 बच्चों में 799 उत्तीर्ण हुए। जिसमें गाँधी 404 वें स्थान पर रहे और उन्हें 40 प्रतिशत अंक मिले थे। क्या दुनिया ने कभी गाँधी जी की मार्कशीट या डिग्री देखने की हिम्मत की! आज के माँ-बाप तो आत्महत्या ही कर लें। 40 प्रतिषत अंकों को देखकर।

पिचानबे प्रतिशत अंक लाने वाले बच्चे के पिता ऐसे उदास से थे जैसे घर लुट गया हो। स्वाभाविक है कि बच्चा और भी परेशान कि मेरे इस विषय में 2 नम्बर कैसे कट गए? अब दाखिला कैसे मिलेगा। दिल्ली ने पिछले वर्षों में प्रदूषण, कानून व्यवस्था, दुर्घटना जैसे केई पैमानों पर नाम कमाया है अब उसमें यह भी जुड़ रहा है कि यहाँ के कई कॉलेजों में दाखिला तभी मिलता है जब आप आपकी ज्यादातर। न्यानबे प्रतिशत अंक आये। दिल्ली में दाखिले की खातिर हर वर्ष फर्जी मार्कशीट बनाने का धंधा भी जोरों से चल निकला है।

दुनिया के कई दुःख आश्‍चर्य भारतीय शिक्षा के परिदृष्य पर रेखांकित किये जा सकते हैं। एक तरफ सौ में से सौ नम्बर लेने वालों की संख्या सैकड़ों हजारों में हैं तो दूसरी तरफ ऐसे भी हजारों, लाखों में जो है तो आठवीं, दसवीं पास लेकिन दूसरी-तीसरी की किताब भी नहीं पढ़ सकते। इससे भी बड़े आश्‍चर्य की वे मंत्री हैं, कानून बनाते है लेकिन डर कानून तोड़कर उनके पास फर्जी डिग्रियाँ हैं। अफसोस यह है कि इस परिदृष्य ने दुनिया भर का यकीन भारतीय विश्‍वविद्यालयों से हट गया है। मुँह मियाँ जगतगुरु कहलाने वाले देश के नौजवान पढ़ने की ललक में दुनिया भर में मारे-मारे फिर रहे हैं।

दिल्ली में दाखिला नहीं मिलता तो दिल्ली के करीब, नौएडा, वागपत, करनाल के कॉलेज खाली पड़े हैं।

समस्याएं हर समाज में होती हैं लेकिन उन्हें हल करने वाले समाज और देश ही आगे बढ़ते हैं। दसवीं तक प्रतिशतता को ग्रेड में बदलकर अच्छा ही किया है लेकिन बारहवीं तक आते-जाते फिर बेताल ताल पर और भी इतने भयानक ढंग से कि इतनी ऊँची प्रतिशतता देश ने कभी नहीं देखी। ठीक इसी वक्त का एक और विरोधाभास भारतीय नौकरशाही की सर्वोच्च परीक्षा सिविल सेवा में वर्ष 2013-14 में वे सभी चुने और सफल घोषित किये गये हैं। जिनके तेंतीस प्रतिशत से अधिक अंक आये थे। सर्वोच्च नौकरशाही चालीस प्रतिशत से काम चला सकती है, दिल्ली विश्‍वविद्यालय के कॉलेज नहीं।

वक्त आ गया है जब देश के कर्णधार राजनीति पार्टियों शिक्षा के मसले पर गंभीरता से विचार करें, वरना इतिहास और दर्शन की यह बात फिर राय देगी कि शासक’’ बदलने से सत्ता का चरित्र नहीं बदलता। शिक्षा का तो कतई नहीं बदल रहा, न नकल रूक रही, बल्कि और बरवाद हो रहा है।

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