ज्ञान आयोग और अंग्रेजी

राष्‍ट्रीय ज्ञान आयोग एक विचित्र आयोग है क्‍योंकि कक्षा एक से अंग्रेजी की अनिवार्यता को ज्ञान की बात माना जाए या अज्ञान की । शिक्षा पर अभी तक जितने भी आयोग बनाए गए हैं कोठारी आयोग हो या दूसरे उन सभी ने पुरजोर वकालत यही की है कि‍ भारतीय भाषाओं को ज्‍यादा से ज्‍यादा प्रोत्‍साहन मिले । कोठारी आयोग ने तो सिविल सेवा परीक्षाओं तक में भारतीय भाषाओं के प्रयोग की अनुमति दी थी और 1979 से हजारों छात्र भारतीय भाषाओं के बूते इस सर्वोच्‍च नौकरशाही में प्रवेश पा चुके हैं और लगातार पा रहे हैं । कोठारी आयोग न होता तो गांव-देहात-दूरदराज के गरीब, दलित, आदिवासी अंग्रेजी की इस वैतरणी को शायद ही पार कर पाते । यह ऐसा कौन सा ज्ञान है जो सिर्फ अंग्रेजी से ही आता है ।

प्रोफेसर यशपाल के नेतृत्‍व में एन.सी.ई.आर.टी. के पाठ्यक्रम पर कार्यान्‍वयन जारी है । उन्‍होंने भी राष्‍ट्रीय पाठयचर्या कार्यक्रम में शिक्षा को परिवेश से जोड़ने की बात कही है । मेरी समझ में परिवेश में सबसे महत्‍वपूर्ण पक्ष भाषा का ही है । उसी भाषा से तो वह अपने चारों ओर के माहौल से सवाल करेगा और वही अनुभव या ज्ञान उसे सही मायनों में सुशिक्षित बनाएगा । इस बात को नई शिक्षा नीतियों द्वारा बार-बार रेखांकित किया जा रहा है । बस्‍ते का बोझ कम करना या पाठयक्रम में क्‍या और कैसे पढ़ाया जाए ये सब बातें इसके बाद आती हैं । परिवेश से जोड़ने की बात यशपाल और कृष्‍ण कुमार जैसे शिक्षाविद यूं ही नहीं करते । उसके पीछे साफ दर्शन है कि परिवेश से जोड़कर ही आई.आई.टी. या मेडिकल या दूसरे संस्‍थानों में पढ़ने वाले छात्र इन राष्‍ट्रीय समस्‍याओं से जुड़ेंगे और उसी से मौलिक अनुसंधान या शोध खोज सामने आएंगी । मौजूदा पद्धति तो इन संस्‍थानों में अमेरिका और दूसरे यूरोपीय देशों के हित ज्‍यादा साध रही है बजाय भारत के । क्‍या इसी वजह से हम लगातार विज्ञान तकनीकी क्षेत्र में नहीं पिछड़ रहे हैं । आई.टी. और दूसरे क्षेत्रों में अपनी प्रगति पर इतराना दरअसल तकनीक की नकल का दंभ ज्‍यादा है बजाय मौलिक योगदान के ।

लेकिन दूर दूर तक भारतीय भाषाओं पर अंधेरा बढ़ता ही जा रहा है । कोई राज्‍य ऐसा नहीं बचा जहां अंग्रेजी की वकालत नहीं की जा रही है । इसमें धुर दक्षिणपंथी गुजरात से लेकर पश्चिम बंगाल, कर्नाटक सभी शामिल हैं । हिन्‍दी प्रांत तो अपनी भाषा के तिरस्‍कार करने के गुनहगार हैं ही । यदि ऐसा नहीं होता तो देश के सबसे ज्‍यादा अंग्रेजी पब्लिक स्‍कूल हिन्‍दी प्रांतों विशेषकर मसूरी, देहरादून, दिल्‍ली, अजमेर में नहीं होते । अब तो ये छोटे-छोटे शहरों में भी तेजी से बढ़ रहे हैं ।

पिछला वर्ष सत्‍याग्रह के 100 साल पूरे होने पर विभिन्‍न किस्‍म की गोष्ठियों-बहसों से गुजरा है । मैं यहां सत्‍याग्रह की तारीफ की बहस और शोध में नहीं जाऊंगा लेकिन भाषा के संदर्भ में एक पक्ष की तरफ आपका ध्‍यान खीचूंगा । वर्ष 1907 में दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार एक ऐसा अध्‍यादेश लाना चाहती थी जिसके तहत हर भारतीय एशियाई को अपना पहचान पत्र जिसमें जाति, उम्र, शरीर पर पहचान, रंग आदि का उल्‍लेख हो, रखना पड़ेगा और न होने पर देश निकाला । इसके विरोध में गांधी जी उठ खड़े हुए । एक-एक शब्‍द की तलाश शुरू हुई कि इसका विरोध कैसे किया जाए । किसी ने सुझाया पैसिव रेसिसटेंश । और भी कई शब्‍द आए । जैसे- सत्‍याग्रह । गांधीजी ने बहुत सोच-विचार कर जो शब्‍द चुना उसका नाम था सत्‍याग्रह यानि‍ कि अपनी भाषाओं से निकला शब्‍द । यह थी गांधीजी की मौलिकता और यही पक्ष महत्‍वपूर्ण है कि मौलिकता अपनी भाषा में है जो प्रभावी ढंग से सामने आती है । इसके बाद मैं देख रहा हूं कि चारों तरफ अपने हिन्‍दी प्रांतों से निकलने वाले हिन्‍दी अखबारों से लगता है मानो वे अंग्रेजी सिखाने के लिए निकाले जा रहे हैं । दिल्‍ली से निकलने वाले नवभारत टाइम्‍स ने तो अंगेजी प्रयोग में सारी मर्यादा तोड़ दी है । कुछ प्रयोग देखिए । एक्‍जाम ऑप्‍शनल बनाने का काम सबको जंचा । पैरेंटस और स्‍टूडेंट भी नई व्‍यवस्‍था के पक्ष में हैं ।

पैसेंजर बढ़ रहे हैं कनेक्टिविटी नहीं । दिल्‍ली के लिए वेटर सर्विस दैनिक भास्‍कर । बड़े अखबार से लेकर छोटी पत्रिकाएं तक धड़ल्‍ले से अंग्रेजी शब्‍द देवनागरी लिपि में लिखे जा रहे हैं । ले-देकर जनसत्‍ता ही एक ऐसा अखबार है जहां प्रभाष जोशी भारतीय भाषाओं की अलख जगाए हुए हैं । बोली भाषा और देशज शब्‍दों का जितना बेहतर इस्‍तेमाल प्रभाष जोशी कर रहे हैं वह अद्वितीय है ।

अंग्रेजी भी उतनी ही जरूरी है लेकिन इस अति से बचा जाए कि यदि वह प्राथमिक कक्षाओं से ही नहीं पढ़ाई गई तो बच्‍चे पिछड़ जाएंगे । क्‍या यह शिक्षा के सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है । बच्‍चा तभी रुचि से पढ़ता है जब वह अपनी मातृभाषा में उस ज्ञान को सीखे जो उसके आसपास है । यहां तक कि विज्ञान और गणित की पढ़ाई जब मातृभाषा में कराई जाती है तो ये बच्‍चे भी उस मानसिक तनाव से बच जाते हैं जो अंग्रेजी के रटंत से पैदा होता है । एक बार प्राथमिक शिक्षा अपनी भाषाओं में जा जाए तो उसके बाद आगे के स्‍तरों पर अंग्रेजी या कोई भी विदेशी भाषा उनके विकास में ज्‍यादा मददगार होगी ।

एक और मूलभूत प्रश्‍न है कि यदि ज्ञान आयोग की बात मान ली जाए तो इस देश के करोड़ों गरीब-दलितों के लिए अंग्रेजी शिक्षा कहां से, कैसे मिलेगी । क्‍या इन गरीबों को शिक्षा के बुनियादी अधिकार से और दूर फेंकना नहीं होगा । जब मौजूदा दौर में ही शिक्षकों की हजारों लाखों रिक्तियां खाली पड़ी हों वहां अंग्रेजी की अनिवार्यता करके ज्ञान आयोग क्‍या कहना चाहता है । इस अंधेरे से लड़ने का एक ही उपाय है कि समान शिक्षा देश के हर हिस्‍से में लागू की जाए और अंग्रेजी या कहें पब्लिक स्‍कूलों की चौधराहट खत्‍म हो ।

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