जाति : ये दाग कब धुलेंगे ?

आखिर गलती कहॉं हुई ? मेरा मन पिछले कुछ बरसों से बार-बार स्वचयं को टटोल रहा है । सरकारी दफ्तर में बिना पूछे सवर्ण या ब्राह्मण के ऐसे फ्रेम में कस दिया गया हूँ जिससे मुक्ति की उम्‍मीद ही खत्म हो रही है ।

मैं यह सब किसी को सफाई देने के अंदाज में नहीं लिख रहा और न किसी जाने-अनजाने अपराध बोध से मुक्ति के लिये । पिछले दिनों मैला ढोने वाले, सीवर साफ करने में जान देने वाले सफाई कर्मचारियों के संदर्भ में मन-ही-मन अपने को जरूर धिक्कांरा कि चालीस बरस पहले जब गॉंव में रहते थे तो उनके प्रति हमारे अंदर इतनी क्रूरता, दूरी, तिरस्काॉर या उदासीन भाव क्योंि था ? तुरंत उत्त र अन्द र से आता है । क्योंरकि सवर्ण, जातिवादी सामाजिक सांचे ने हमें जो दिया हमने मान लिया । जैसे-जैसे पहले गांधी फिर अम्बेाडकर और दूसरी पुस्तदकों की रोशनी में इनका दर्द महसूस किया, इनको समझा इस निर्णय पर पहुंचने में देर नहीं लगी कि जाति प्रथा के इस कलंक को मिटाने की जिम्मे दारी सवर्णों की ज्या दा है या कहिये कि उन्हींा की है ।
1975 में कॉलिज के दिनों में जे.पी. आंदोलन की जिस आंच में मैंने देश, समाज, स्वेयं को मौजूदा सांचे से कुछ अलग समझना, जीना शुरू किया जाति के ग्ले शियर कुछ-कुछ पिघलते लग रहे थे । यों जाति के कठोर सांचे और प्रभावों से हम घिरे जरूर थे मगर मुक्ति की छटपटाहट शुरू हो चुकी थी । घर में उनके अलग कप रखे जाने पर हम भाइयों द्वारा इसका विरोध शुरू हो चुका था । अपनी भाषा, समान शिक्षा, धर्मांधता, अं‍धविश्वा सों का विरोध, जातिविहीन समाज के सपने दिन में आने लगे थे । आज बहुत सोचकर भी उत्तइर नहीं ढूंढ पाता कि सब कुछ फिर उल्टाग क्यों शुरू हुआ ? ज्योंू-ज्योंल दवा ली मर्ज बढ़ता क्योंम गया ? जाति की फसलें किस खाद, पानी से लहलहाने लगीं ? कहीं अधकचरे, अपरिपक्वय लोकतंत्र, राज्ये व्य वस्थाह या धर्म का जटिल सांचा ही तो इसका जिम्मेबदार नहीं है ?
गॉंव के छीतरमल जाटव के चिथड़े और तार-तार हो गये हैं तो शहर में मैला ढोने वाले, सफाई वाले, मोची, मजदूर और बेहाल । चांदी काट रहे हैं और दर्प से हुंकार रहे हैं तो जाति के नाम पर गोलबंद होकर दफ्तरों के बड़े पदों पर पहुंचे बाबू, विश्वरविद्यालयों के प्रोफेसर और इनके नाम पर बनने वाले संगठनों के मुखिया, कार्यकर्ता । राजनीति के खिलाडि़यों की तो इस बहाने फसल पहले से ही नीचे से ऊपर तक लहलहा रही है ।
स्कूतल, कॉलिज से नौकरी की यात्रा में साथी रहे कई दलित चेहरे उभर रहे हैं । एक से एक भले, नम्र, ईमानदार । सोमप्रकाश आई.ए.एस. हैं । सिविल सर्विस की तैयारी के दिनों में पूर्वी दिल्ली की गलियों में घूमते हुए उसने बताया कि इस मकान में दसवीं क्लांस की छुट्टियों में गारा, ईंट की मजदूरी की है । घर आना-जाना था । एक कमरे का घर था उसका । शादी-शुदा । तीन बच्चे । न मैं सवर्ण था, न वह दलित । रेलवे के एक और अधिकारी आज तक उतने ही करीब हैं जितने प्रशिक्षण के दिनों में । उन्हों ने मॉं-बाप के साथ ईंटों के भट्टे पर मजदूरी की है । भट्टा मजदूरों पर वे कहानी लिखने का वादा करते रहे । यदि लिखें तो बहुत प्रामाणिक कथा सामने आयेगी । एक दोस्ता सूचना सेवा में है । जाति से हरिजन हैं, लेकिन काम से हरि का अवतार । लबीोस फेहरिस्त है । दोस्तीस की जमीन थी तो बस समान गरीबी, समान भाषा, परिवेश, महत्वातकांक्षाएं, कुछ बदलने की चाह । बरसों, दशकों तक जिन लेखकों, बुद्धिजीवियों की जाति का कभी ख्यााल भी नहीं आया धीरे-धीरे पिछले दस बरसों में उनके हाव-भाव बता रहे हैं कि उनकी पहचान अब खास जाति या संगठनों से जानी जाती है । वे खुद वहॉं गये या उन्हें जाति के हुंकारे देकर वहॉं धकेला गया ? पिछले दिनों से जैसे-जैसे वे पदों की सीढि़यां चढ़ते गये और कुछ जाति संगठनों की घेरेबंदी में आते गये, मैं उनके लिये मात्र सवर्ण बन गया हूँ । यदि मैं उत्तनर प्रदेश, बिहार की दुर्दशा पर सच्चेा मन से रोना भी चाहूं तो उसे जाति के चश्मेप से देखा, परखा जाता है ।
और सवर्ण ? इसालिये नाराज हैं कि इसने अपनी जाति के लिये किया क्यात ? कई शर्माओं की जातिवादी उम्मीसद पर खरा नहीं उतरा । उनकी ब्राह्मण सभा में जाने से मना किया तो उनको शक हुआ कि कहीं ये नकली शर्मा तो नहीं । देश के संविधान में अच्छीत बात यह है कि किसी भी जाति, उपनाम को नाम के साथ नत्थीि करने की आजादी है । एक ने कहा हमारे यहां के सारे बढ़ई शर्मा लगाते हैं । शक हो भी क्योंद न ? जो न रामायण के बारे में जानता हो, न माता रानी, देवताओं और बाबाओं को भाव देता हो, मंदिर भी परसाई की व्यंंग्य। रचना में आई बकरी, बिल्ली की तरह भटकते हुए चला गया हो तो चला गया हो । लेकिन एक दिन ऐसा भी आया कि मेरे इसी सरनाम में शुद्ध ब्राह्मण मेरे अजीज मित्रों ने खोज लिया । और वे कमीशन गये कि इस पोस्टं पर हममें से क्योंम नहीं ? संयोग से छह पदों और उन पर तैनात छह अधिकारियों में मैं अकेला तथाकथित सवर्ण था । खैर, प्रशासन ऐसी संवैधानिक संस्थारओं के आगे न केवल झुकता है, बल्कि जमीन पर रेंगने लगता है । मुझे ज्यासदा झटका जातिवादी विश्ले षण की राजनीति से लगा जरूर, काम के बोझ से तो राहत ही मिली । अकेलेपन के अहसास से भी गुजरा । वे कहते हैं सवर्णों ने तो सैंकड़ों बरसों से हमें अकेला कर रखा था । यानि खून का बदला खून ।
याद नहीं कि मैंने कभी किसी की जाति पूछी हो । कोई बताता है तो सुनने में भी आत्माम मैली होती है । हाल ही में स्कूाली छात्रों के लिये पाठ्यक्रम तैयार करनेवाले संस्‍‍थान में जब जाना हुआ तो नाम के आगे जाति लिखना भी अनिवार्य था । क्योंं ? क्याा मुझे किसी जाति विशेष के कारण बुलाया गया था या किसी शैक्षिक मकसद से ? संस्थायन का मिमियाता जवाब था कई बार संसद में प्रश्नों का जवाब देना होता है ? शिक्षकों के लिये सुझाव, उपदेश दिया गया कि वे दलित जाति के बच्चोंे पर विशेष ध्यािन दें । क्यों ? शिक्षक से तो सभी को बराबरी और सहानुभूति से देखने की अपेक्षा की जाती है । जाति विशेष को पहचानेंगे कैसे ? क्या यह उन मासूमों का ही अपमान नहीं है ? क्याष सरकार और उसकी संविधानिक संस्थामएं समाज में फैली गंदगी को और बढ़ाने के लिये है ? मेरे प्रगतिशील दोस्तोक ! क्याथ देश वाकई प्रगति कर रहा है ? क्याे ‘फूट डालो और राज करो’ के नये संस्कारण के तहत धुआंधार जाति विमर्श के पिछले बीस बरसों में देश कारपोरेट कम्पकनियों की गिरफ्त में नहीं चलता चला गया ? आपसी जातीय रंजिश, मुकदमे, विद्वेष, गुटबाजी के चलते सरकारी विभाग निरंतर ह्रास की तरफ बढ़ रहे हैं । क्या सरकारी स्कूोल, अस्पसताल, एअर लाइन्सढ का डूबना इसका प्रमाण नहीं है ? वक्तव आ गया है जब सवर्ण शब्दग को फिर से परिभाषित किया जाये । इस दौर में सवर्ण वे हैं जो अंग्रेजी, निजी स्कूफलों, अस्पेताल और निजी पूंजी की वकालत करते हैं । सदियों से सताये लोगों के पक्ष में गांधी, साहू जी महाराज, ज्यानतिबा फूले आदि सामने आये थे । नये संकीर्ण जातिवाद के खिलाफ किसी दलित चिंतक की आवाज का इंतजार आज पूरे देश को है ।
जाति व्यदवस्थाा से मुक्ति का बाजा बजाने वाले मेरे पवित्र दोस्तोंी ! क्याे शपथ खाकर कह सकते हैं कि वे जाति का उल्लेकख परिचित, अपरिचित किसी के लिऐ गलती से भी नहीं करेंगे ? क्या‍ हर सरकारी कर्मचारी को जातिसूचक नाम रखने पर प्रतिबंध लगाने का वक्त नहीं आ गया ?
जाति मुक्ति इसी रास्तेत से संभव है ।

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