जन्‍मशती: पाठक कैसे बढे

वर्ष 2011  हिन्‍दी  भाषा,साहित्‍य,संस्‍कृति के लिए इतना महत्‍वपूर्ण  हो जाएगा यह 1911  में तो किसी ने भी नहीं सोचा होगा । उसके 50  साल पूरे होने तक 1961  में भी इतना नहीं । एक साथ इतने बड़े कवि,कहानीकारों का यह जन्‍मशती वर्ष है अज्ञेय,शमशेर,केदारनाथ अग्रवाल,नागार्जुन,फैज अहमद फैज, भुवनेश्‍वर ………… कितनी बड़ी विरासत है इनमें से हरेक को और यह देखकर और यह भी अच्‍छा लगता है कि हिन्‍दी  संसार अभी जागा हुआ है । इनके योगदान, अवदान,स्‍मृति को नमन करने के लिए देश भर में विशेषकर दिल्‍ली में लगभग हर सप्‍ताह कोई न कोई आयोजन हो रहा है ।  ‘नया पथ’ ने बड़ा  भारी भरकम फैज विशेषांक निकाला है । ऐसे ही विशेषांक शमशेर, अज्ञेय,नागार्जुन पर आने की प्रतीक्षा में है ।  यह सबके लिए बड़े संतोष की बात है ।

लेकिन विश्‍वविद्यालयों में गोष्‍ठी और सेमिनार होना एक बात है अगली पीढ़ी तक इन लेखकों के कृतित्‍व को ले जाना, बिल्‍कुल दूसरी ।  सरकारी ग्रांट या कुछ छोटे-मोटे संगठनों की सदाशयता से गोष्ठियां और सेमिनार तो हो जाएंगे लेकिन क्‍या इन्‍हें स्‍कूल-कॉलेजों की नई पीढ़ी पढ़ भी रही है ? या उनके लिए हम कोई सर्वसुलभ छोटी पुस्तिकांए,उनके सस्‍ते संकलन उपलब्‍ध करा पाएंगे ? या मामला भारी भरकम किताबों,अभिनंनदन ग्रथों,विशेषांकों तक ही सीमित होकररहेगा जो जनता के पास न जाकर कुछ दिनों के लिए किसीलायब्रेरी में अटा दी जाएंगी ।  प्रश्‍न निराशावाद का नहींउस हकीकत को समझने का है जो स्‍कूल-कॉलेजों में हो रहा है ।  जो पीढ़ी इनकी जन्‍मशती मना रही है इन सबने,वे चाहे विज्ञान के हों या पेशे से इंजीनियर, डॉक्‍टर हों, सभी ने हिन्‍दी  प्रदेशों में हिन्‍दी  साहित्‍य को कम से कम दसवीं,बारहवीं तक पढ़ा है ।  दसवीं, बारहवीं तक साहित्‍य की एक ऐसी समझ पैदा हो जाती है जिस पर आगे साहित्‍य के पठन,पाठन का भवन बनाना आसान है । बारहवीं के बाद अज्ञेय,बच्‍चन,ज्ञान चतुर्वेदी,स्‍वयं प्रकाश,पंकज विष्‍ट,संजीव,ओमा शर्मा,प्रियवंद ने भले ही हिन्‍दी  साहित्‍य के बजाए अंग्रेजी,डॉक्‍टरी,अर्थशास्‍त्र,इतिहास पढ़ा हो लेकिन साहित्‍य के जो बीज दसवीं बारहवीं तक संस्‍कारों में रोप दिए गए उन्‍हीं का विकास आगे चलकर इनके लेखकीय रूप में सामने आया । दिल्‍ली के स्‍कूलों में तो अब मामला ले दे कर हिन्‍दी  भाषा के रूप में पढ़ना सिर्फ आठवीं तक बचा है ।  नौवीं में आते-आते बच्‍चे,अभिभावक हिन्‍दी  के बजाए फ्रेंच,जर्मन,संस्‍कृत इसलिए ले रहे हैं क्‍योंकि उसमें नंबर ज्‍यादा आते हैं ।  इसका अंजाम निरंतर हिन्‍दी  भाषा के शिक्षण की गिरावट के रूप में हो रहा है । कुछ दिनों के बाद स्थिति ऐसी भी आने वाली है कि बच्‍चे और उनके अभिभावक आठवीं कक्षा तक भी हिन्‍दी  पढ़ने के लिए अपना मन मुश्किल से बनाएंगे । उन्‍हें गलत भी नहीं कहा जा सकता । जब अंग्रेजी में ही सारा अध्‍ययन, अध्यापन, कंप्‍यूटर, रोजगार उपलब्‍ध हों तो हिन्‍दी  आठवीं तक भी क्‍यों पढ़ी जाए ? माध्‍यम तो दिल्‍ली के अधिकतर पब्लिक स्‍कूलों में, कक्षा एक से अंग्रेजी हो ही चुका है ।  बचे हैं तो सिर्फ सरकारी स्‍कूल ।  वहां भी कुछ राज्‍यों में शुरूआत हो चुकी है और दिल्‍ली में भी हर साल ऐसे सरकारी स्‍कूल  जुड़ते जा रहे हैं जहां पहली क्‍लास से ही अंग्रेजी माध्‍यम हो । इस परिदृश्‍य में हिन्‍दी  कम से कम स्‍कूली कक्षाओं में पढ़ना लगभग नगण्‍य होता जा रहा है ।  कई पब्लिक स्‍कूलों में हिन्‍दी  बोलने पर सजा की शिकायतें भी मिलती हैं ।

क्‍या इन मूर्धन्‍य लेखकों की जन्‍मशती के बहाने हमारे विद्वान,लेखकों,संपादकों का यह दायित्‍व नहीं बनता कि कम-से-कम वे दिल्‍ली के स्‍कूलों में हिन्‍दी  का पढ़ाया जाना दसवीं तक अनिवार्य बनाने की कोशिश करें । यह हिन्‍दी  लादना नहीं है,सिर्फ शिक्षा जो अपनी भाषा में सर्वश्रेष्‍ठ,रचनात्‍मक होती है उसके महत्‍व को रेखांकित करना है ।  यकीन मानिए जिस जनता की बात राजनेता से लेकर विद्वान,पत्रकार,लेखक सभी करते हैं,वह भी हिन्‍दी  पढ़ाए जाने से अंदर से बहुत प्रसन्‍न होगी क्‍योंकि अंग्रेजी के आतंक ने उनके बच्‍चों को भी पगला दिया है और खुद माता-पिता को भी ।  आए दिन ऐसी खबरें अखबारों में आप सब देखते होंगे कि अंग्रेजी के आतंक से बच्‍चे कई बार स्‍कूल छोड़ देते हैं या अध्‍यापकों से मार खाते हैं । पहले बिहार में भी अंग्रेजी का ऐसा ही आतंक था । जब से दसवीं में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्‍म की गई है, वे गरीब बच्‍चे जो दसवीं पास नहीं कर पाते थे,वे दसवीं ही नहीं पास कर रहे उनका भविष्‍य भी अपनी भाषा में बेहतर संवर गया है । दिल्‍ली में इस समय किसी भी दूसरे शहर के मुकाबले सबसे ज्‍यादा पत्रकार,लेखक रहते हैं ।  जन्‍मशती को मनाने का एक रास्‍ता,सबसे सार्थक कदम यही हो सकता है कि हम हिन्‍दी  साहित्‍य को उसके शिक्षा मंदिरों में उचित जगह दिलाएं । उन मनीषियों की जिनके नाम पर हम रोज सेमिनारों में भाषण दे रहे हैं, उनकी आत्‍मा को भी उससे ज्‍यादा संतोष मिलेगा कि उनकी किताबें सौ साल के बाद उस पीढ़ी के पास और उन पुस्‍तकालयों में हैं ।

एक रास्‍ता यह भी हो सकता है कि लगातार अज्ञेय, शमशेर जैसे दुरूह कवियों के बजाए इनके लेखन का वह सरल रूप विशेष रूप से कहानी,उपन्‍यास सामने लाया जाए जिससे कि अगली पीढ़ी पठनीयता के दम पर हिन्‍दी  साहित्‍य के प्रति आकर्षित हो ।  शमशेर पर अभी तक अलग-अलग झंडो के नीचे कम-से-कम दस गोष्ठियॉं तो दिल्‍ली में हो ही चुकी हैं ।  शमशेर हिन्‍दी  उर्दू के बहुत नायब कोमल कवि हैं तो दूसरी तरफ जटिल अर्थ के संदर्भ में ‘कवियों के कवि’भी हैं । उनकी रूमानियत,सौन्‍दर्य को समझना भी इतना सहज नहीं है ।  वे वाकई इतने ऊंचे हैं कि कई बार अंग्रेजी के आतंक में पला-बढ़ा हिन्‍दी भाषी पाठक भी उनकी पकड़ से बाहर रह जाता है । यदि मैं यह पूछने की धृष्‍टता करूं कि इतनी सारी गोष्ठियों के बावजूद कोई शमशेर की दो-चार पंक्तियां उसी प्रवाह और अंदाज में सुना सकता है जैसे- फैज अहमद फैज,दिनकर या बच्‍चन की ? शायद नहीं । तर्क यह हो सकता है कि कविता के पाठक ज्‍यादा नहीं होते ।  लेकिन क्‍या यह भी इतना बड़ा सच नहीं है कि अच्‍छी कविता,अच्‍छी कहानी ज्‍यादा पाठकों के दम पर ही जिंदा रह सकती है ।  तुलसीदास की रामायण,कबीर के दोहे,पद,प्रेमचंद,शरत की कहानियां इनका नायाब उदाहरण हैं ।  मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि शमशेर और अज्ञेय की गोष्ठियों के साथ–साथ भुवनेश्‍वर जैसे महान कथाकार के ऊपर भी कुछ गोष्ठियॉं होनी चाहिए,पत्रिकाओं के विशेषांक निकलने चाहिए । माना कि उन्‍होंने न इतना ज्‍यादा लिखा और न वे उस प्रबुद्ध अभिजन और सत्‍ता के संपर्क में रहे जिनके नाम पर कई न्‍यास और पीठ बनाए गए हों लेकिन एक नाटककार,कहानीकार के रूप में हिन्‍दी साहित्‍य उनका वैसा ही ऋणी है जैसे चन्‍द्रधर शर्मा गुलेरी,सुदर्शन आदि का ।  क्‍या ‘भेडि़ए’ कहानी या उनके नाटकों को छोटी पुस्तिका में स्‍कूल-कॉलेजों में नि:शुल्‍क बांटना भुवनेश्‍वर के प्रति वैसी श्रद्धाजंलि नहीं होगी ? जो पैसा मानव विकास मंत्रालय शमशेर और दूसरे लेखकों की जन्‍मशती मनाने के लिए दे रहा है अच्‍छा हो हमारे संगठन लेखक उसी में से कुछ कटौती करके भुवनेश्‍वर के योगदान को जनता के सामने रखें।  हेरी पोटर और चेतन भगत के उपन्‍यासों की तरफ भागती नयी पीढ़ी को यदि रोका जा सकता है तो भुवनेश्‍वर,प्रेमंचद,नागार्जुन की कहानियों के बूते ही । शमशेर की कविता या पुरस्‍कार के बूते नई पीढ़ी हिन्‍दी  की तरफ लौटेगी इसमें कुछ संदेह है ।

यदि जन्‍मशती के बहाने इतना  भी कर पाए तो साहित्‍य,संस्‍कृति की विरासत के लिए वर्ष 2011  एक महत्‍वपूर्ण पड़ाव साबित होगा ।

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