चूड़ी बाजार में लड़की

यदि आप लेखक हैं तो हर कदम आपके रचनाकार को समृद्ध करेगा । कृष्‍ण कुमार जी लेखक पहले हैं शिक्षाविद बाद में । ‘शिक्षा’ उनके लेखन का निष्‍कर्ष या उत्‍तरार्ध भी कहा जा सकता है । इनके आरम्भिक लेखन पर कहानी, संस्‍मरण हावी रहा है और पिछले दो दशक से शिक्षा । पूरी शिक्षा व्‍यवस्‍था को बदलने की बेचैनी । उनके पूरे हस्‍तक्षेप को सार्थक भी कहा जा सकता है । दर्जनों मौलिक किताबों के अलावा कृष्‍णकुमार ने निदेशक के रूप में एन.सी.ई.आर.टी. पर अमिट छाप छोड़ी है । उसकी सामग्री, पद्धति, विन्‍यास, शिक्षा, दर्श सभी तरफ । कायाकल्‍प भी कह सकते हैं ।

यहां तक कि इतिहास में उनकी छलांग बहुत मौलिक रही है जिसका प्रमाण है ‘मेरा देश तेरा देश’ और शांति का सफर । मौजूदा किताब ‘चूड़ी बाजार में लड़की’ समाज शास्‍त्र के बेहतर नमूने की तरह हमारे सामने है ।

भारतीय समाज में लड़की की स्थिति पर इतनी विशद गहराई से जांच परख पिछले कुछ बरसों में तो मेरे ज्ञान में नहीं है । खांप के बहाने या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में   के लड़कियों की रोक और जनसंख्‍या के आंकड़ों के बरक्‍श पिछले तीन दशकों से लगातार चलनेवाली बहसों में एक कॉलम या लेख से ज्‍यादा गुंजाइश नहीं होती । अक्‍सर पहले से ही सिद्ध बातों को किसी घटना विशेष के माध्‍यम से जोड़कर लगभग लीपा-पोती अंदाज में निपटा दिया जाता है ।

इस पुस्‍तक के पीछे  यहां एक शिक्षक है, शिक्षाविद है, कथाकार है अपनी पूरी संवेदनशीलता के साथ । फीरोजाबाद का चूड़ी उद्योग तो मात्र एक खिड़की है उसे पूरे समाज में स्‍वयं की स्थिति को सदियों के आर-पार जांचने के लिए । लेखक बचपन में लौटता है । इस पुस्‍तक की रचना-प्रक्रिया के पहले, बहुत पहले, कोई भी कृति एक कारण अथवा चेतना का प्रस्‍थान-बिन्‍दु मॉंगती है । इस पुस्‍तक का कारण फिरोजाबाद की दस वर्ष पुरानी यात्रा है । कॉंच और चूड़ी के इस शहर में जाने का कारण मेरी शिष्‍या डॉ.लतिका गुप्‍ता का यह अनुरोध था कि मैं उनकी छात्राओं के साथ चलूँ । सभी का संस्‍मरण और जिक्र करना कठिन है, किंतु कुछ की स्‍मृति यहां कृतज्ञतापूर्वक दर्ज करना चाहूंगा । मॉं के प्रति कृतज्ञ होना जीवन का स्‍थायी भाव है, पर इस पुस्‍तक की रचना में मम्‍मी, श्रीमती कृष्‍णा कुमारी का योगदान लगातार विशिष्‍टता लिये रहा । मेरे प्रारंभिक जीवन का एक हिस्‍सा उस स्‍कूल में बीता जिसकी वे प्राचार्य थीं । वहां का वातावरण इतने दशकों बाद इस पुस्‍तक की रचना के दौरान मेरे लिए अनेक बार सजीव हुआ । सामाजिक परिवर्तन और शिक्षा के अमुक प्रश्‍न उस अनुभव की गहराइयों में छिपे थे ; रचना के संघर्ष के दौरान मैं उन्‍हें पहचान सका । इसी तरह की कृतज्ञता का ज्ञापन मैं महादेवी वर्मा के प्रति करना चाहूंगा । उनका निबंध ‘संस्‍कृति का प्रश्‍न’ मुझे बी.ए. के दिनों में मेरे प्रिय शिक्षक प्रोफेसर चन्‍द्रभानधर द्विवेदी ने पढ़ाया था । उसमें प्रयुक्‍त अवधारणाओं के ढॉंचे की छाप मेरे मन पर लगातार बनी रही है । इस पुस्‍तक के लेखन में महादेवी की अमर गद्य कृति ‘श्रृंखला की कडि़यॉं’ एक यक्ष प्रश्‍न बनकर मेरी समझ को कुरेदती रही है । महादेवी के गद्य पर व्‍याख्‍यान देने के लिए 2008 में मुझे बनारस हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर सदानंद शाही ने आमंत्रित किया । इस अवसर की तैयारी ने मुझे महादेवी की चिंतन –शैली को करीब से देखने के लिए विवश किया । उस सभा के माहौल में भी कुछ अनोखी प्रेरणा थी । (पृष्‍ठ 147)

फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग पर ही नहीं उत्‍तर प्रदेश की गरीबी, जर्जर शिक्षा व्‍यवस्‍था और इन सबके बोझ से सबसे ज्‍यादा पिसती लगभग दबी लड़की की एक-एक सांस को सुना जा सकता है । हमारे सामने लगी हुई ‘अनौपचारिक’ कक्षा में लगभग सौ बच्‍चे फर्श पर बैठे थे । उनके छोटे-छोटे शरीरों, कपड़ों और कातर चेहरों में उनकी जिंदगी को परिभाषित करने वाली गरीबी और लाचारी अंकित थी । इन नन्‍हें बच्‍चों के चेहरे जैसे एक सड़क या मैदान बन गए थे जिस पर पूरे शहर और देश में व्‍याप्‍त विषमता और दरिद्रता की क्रूरता साक्षात् खड़ी थी । अनौपचारिक शिक्षा गरीब बच्‍चों के लिए ही निर्धारित है, पर फिरोजाबाद की भीषण गरीबी में उसका अर्थ उस शाम इतना ही था कि सर्वशिक्षा अभियान के तहत आने वाले कई अधिकारी, आगंतुकों की तरह हम लोग उन बच्‍चों के बीच जा पहुंचे थे और अब हमें इस मुलाकात को किसी-न-किसी तरह सार्थक बनाना था या कम से कम आधा-पौन घंटा चल सकने वाली कोई आकृति देनी थी । (पृष्‍ठ 91)

भारतीय स्त्री के नख-सिख से लेकर पहनने-ओढ़ने की हर वस्तु पर उन्होंने मंथन किया है विशेषकर शहरी जीवन की महिलाओं की उंची ऐड़ी की चप्पलों पर उनकी टिप्पणी देखिए (पृष्ठ 86)

इसी क्रम में वे स्त्री के सिन्दूर और चूड़ी पहनने को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हैं ।

अपने सीमित और सटीक अर्थ में सिंदूर व चूड़ी लड़की के विवाहित होने की सूचना देते हैं । इस सूचना को पाने वाला व्‍यक्ति समाज की मूल्‍य-रचना के हवाले से यह जानता है कि लड़की विवाहित है या नहीं, इस बात की सूचना उसके शरीर पर चिह्नित कर देना क्‍यों जरूरी है । इस प्रकार लड़की की देह पर चिपका या टॉंग दी गई सूचना, सूचित होने वालों में परिचित और अपरिचित अथवा रिश्‍तेदार या बेगाने का भेद नहीं करती । जाहिर है, सभ्‍यता ने यह बात, कि जिस लड़की को हम देख रहे हैं, वह विवाहित हो चुकी है या नहीं, हर किसी के संज्ञान में अविलंब बता देना जरूरी माना और बनाया है । (पृष्ठ 87)

चूड़ी का पूरा समाज शास्त्र यहां उपलब्ध है शायद भारतीय साहित्य की किसी भी भाषा में इतनी गहरी संवेदनशीलता के साथ इस पर विचार नहीं किया गया हो ।

चूड़ी पहन लेने या पहनाए जाने की प्रक्रिया में होने वाली क्षणिक-सी रुकावट चूडि़यॉं धारण करने की सांस्‍कृतिक क्रिया का हिस्‍सा हैं । हर चूड़ी इस बात की सावधानी के साथ हाथ से गुजार कर कलाई तक पहुंचानी होती है कि वह पहने जाने के दबाव में टूट न जाए । चूड़ी एक ऐसी वस्‍तु है जो दो ही अवस्‍थाओं में रह सकती है-संपूर्ण या खंडित । कॉंच की अन्‍य वस्‍तुऍं, जैसे गिलास या तस्‍वीर का फ्रेम, चटख जाऍं तो भी दरार के साथ बनी रह सकती हैं । चूड़ी के साथ ऐसा नहीं है । वह यदि पहने जाते वक्‍त खिंच गई तो टूट जाएगी । टूटी हुई चूड़ी सिर्फ फेंके जाने योग्‍य रह जाती है, उसका स्‍थान दूसरी चूड़ी को लेना होता है । चूड़ी के अस्तित्‍व का यह ध्रुवीकृत जीवन के पहने जाने के क्षण में जितनी स्‍पष्‍टता से व्‍यक्‍त होता है, उतना फिर कभी नहीं ।

पहनी हुई चू‎ड़यों में से ही कोई चूड़ी कभी किसी बर्तन या दीवार से टकरा जाए तो अपशकुन माना जाता है और उसका एहसास कराया जाता है । पहनते समय चूड़ी के चटक जाने का भावबोध गहनता से कराने के लिए भाषा की मदद ली जाती है और लड़की से कहा जाता है कि ‘टूट गई’ मत बोलो, ‘मौल गई’ बोलों क्‍योंकि टूटने में तोड़ी जाने का भाव निहित है जो विधवा हो जाने से जुड़े संस्‍कार का बोध कराता है । पहने जाते समय टूटी चूड़ी लापरवाही की घोषणा  करती है । (पृष्ठ 83)

आभूषणों के संदर्भ में भी एक-एक नजरिए का कायल होना पड़ता है । आभूषणों में नकेल के आकार की नथ का चलन शादियों में देखने को मिल रहा है । क्रीम बनाने वाली लक्‍मे कंपनी का एक विज्ञापन एक बड़ी नथ पहने वधू को ‘नई तर्ज की कामुक दुल्‍हन’ की तरह पेश करता है । एक हिंसक सामाजिक परिवेश की रचना में ऐसे प्रतीकों और मुहावरों के जरिए स्‍त्री को पुरुष की दासी और उसके मनोरंजन के लिए एक खिलौने के रूप में प्रस्‍तुत करने का उद्योग चल रहा है । यह परिवेश लड़कों के मानसिक यथार्थ के केन्‍द्र में लड़कियों की एक रंगीन, लचीली गुडि़या जैसी छवि को स्‍थापित करने में मदद देता है । इस छवि में समाई लड़की खुद वहीं व्‍यवहार मॉंग रही होती है जो लड़कों के किशोर-कल्‍पनालोक में स्‍थापित हो चुका होता है ।  (पृष्ठ 37)

स्त्री के लिबास में उसके परिधान साड़ी भी उसे परिभाषित करते हैं । ऑंचल की भूमिका कृष्ण कुमार जी इन शब्दों में बयान करते हैं । साड़ी के ऑचल की भूमिका भी इसी तरह की है । ऑंचल के साथ भी संस्‍कृति के अनेक प्रतीकार्थ जुड़े हुए हैं । इन प्रतीकार्थों को साधने की जटिल लिपि लड़की को स्‍त्री बनने के क्रम में समझना और अपनाना होती है । सिर से लेकर कमर तक ऑंचल की भूमिका के प्रतीकार्थों में स्‍त्री के यौन-जीवन और मातृत्‍व की संश्लिष्‍ट सामाजिक इबारत दर्ज है । (पृष्ठ 85)

यों यह पुस्तक एक शोध निबंध के रुप में सामने आती है लेकिन उसके अन्दर चलने वाली कथाएं, यात्रा का विवरण उसे एक बेहद पठनीय कथा में बदल देता है । अपनी भाषा और शब्द चिह्न के लिए अनूठे कथाकार के रुप में जाने जाने वाले कृष्ण कुमार जी का गद्य ही नया नहीं है पूरी पुस्तक की सामग्री ही हिन्दी की इस विधा को कुछ और नाम देने की मांग करती है । गॉंव के मौजूदा सांचों और खांचों से उपर जिसमें लेखक  पूरी संवेदनशीलता के साथ मनमर्जी प्रवाह में बहता है । स्थितियों की पूरी भयावहता से आहत और पाठकों को  भी उस दु:ख में शामिल करता हुआ । कभी-कभी कई पन्नों पर बिखरा विमर्श सिर को भारी भी बनाता है और तब लगता है कि काश ! इसका विन्यास छोटी-छोटी टिप्पणियों में होता तो भारतीय समाज में पिसती औरत की पीड़ा और सहज रुप से पाठकों के पास पहुंचती । लेकिन कृष्ण कुमार जी से ऐसी उम्मीद करना किसी मैराथन दौड़ने वालों से सौ मीटर की दौड़ की उम्मीद करना है ।

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