गुलामी की भाषा

लोहिया शताब्दी वर्ष के बहाने बार बार उन मुद्दों की याद आती है जिनके लिए वे अंतिम क्षण तक लड़ते रहें । सामाजिक बराबरी के साथ साथ जो दूसरा मुद्दा उनके दिल के सबसे करीब था वह था अपनी भाषाओं में देश का शासन, प्रशासन, शिक्षा । लेकिन लगता है ये दोनों ही लक्ष्य समय की रफतार के साथ और दूर होते जा रहे हैं । इसका सबसे तीखा अनुभव हाल में तब हुआ जब चीन के प्रधानमंत्री भारत आए थे । दोनों को दूरदर्शन पर प्रेस कॉफ्रेंस में साथ साथ बोलते हुए पूरी दुनिया ने देखा । चीन के प्रधानमंत्री ने बिना किसी सलवट, संकोच के अपनी बात चीनी भाषा में रखी, जबकि हमारे प्रधानमंत्री अंग्रेजी में बोलें । वह भी उस चीन के साथ जिसकी हेकड़ी पूरे दौरे में कदम कदम पर दिखाई दे रही थी । सीमाओं का मसला हो या आतंकवाद की बात । पूरे दौरे का अन्जाम अखबारी रिपार्टों का सच मानें तो लगभग शून्य रहा । शायद इसलिए चीन ने भारतीय प्रेस की आलोचना भी की । भाषा के मामले में हर विदेशी राजनयिक के आने पर यही होता है, वह चाहे रूस के प्रधानमंत्री हों या लैटिन अमेरिका के। उदारीकरण के दो दशक के बाद तो ऐसी घटनाएँ समाज के स्तर पर शायद ही किसी को उद्वेलित करते हों । भाषाओं के पतन की पराकाष्ठा और उसके जरिए आम आदमी की आवाज को दबाने की चरम परिणति दिल्ली पुलिस के उस निर्णय से समझी जा सकती है जहाँ ये फैसला किया गया है उसके पीसीआर वैन में तैनात सिपाहियों को अंग्रेजी बोलने का प्रशिक्षण दिया जाएगा । यह इसलिए किया जा रहा है कि यदि सिपाहियों से कोई अंग्रेजी में बोले तो वह तुरंत समझ में आ जाए और उस पर कार्यवाही उतनी ही तेजी से की जा सके ।

 

पुलिस और व्यवस्था को किसी भी त्वरित कार्यवाई के लिए संवेदनशील और सक्रिय बनाना बहुत ही अच्छी बात है और इस अर्थ में अंग्रेजी सीखने, सिखाने के प्रति भी कोई दुर्भावना नहीं रखनी चाहिए, लेकिन सत्ता या व्यवस्था की यह संवेदनशीलता तब कहाँ गायब हो जाती है जब 5 प्रतिशत अंग्रेजी जानने वालें को छोड़कर पिच्चानवे प्रतिशत जनता अपने जीवन, जायदाद की बात न किसी न्यायालय में कह पाती और न केंद्र सरकार के बड़े बड़े मंत्रालयों में । संविधान में हिन्‍दी की स्थिति को देखते हुए आप आवेदन तो कर सकते हैं लेकिन उस आवेदन पर समुचित कार्यवाई होगी, इसकी गारंटी पिछले 60 वर्षों में उस रूप में कभी नहीं की गई, जैसे दिल्ली पुलिस को तुरंत एक घटना विशेष के संदर्भ में अंग्रेजी सीखने के लिए कहा जा रहा है । व्यवस्था से जुड़े सभी अधिकारियों को पता है कि हिन्‍दी में लिखे आवेदन किस ढंग से दिल्ली के दफ्तरों में कूड़ेदान में डाल दिये जाते हैं । यहाँ तक कि दिल्ली के किसी निजी स्कूल तक में आप अपनी शिकायत हिन्‍दी में दर्ज करा कर किसी उचित उत्तर की उम्मीद नहीं कर सकते ।

 

जो दिल्ली और उसकी पुलिस बड़े आदमियों की बात अंग्रेजी में न समझी जाने के कारण उतनी संवेदनशीलता दिखा रही है उसी दिल्ली के न केवल राजनेता बल्कि वहाँ के बुध्दिजीवियों ने भी अपनी भाषा में पढ़ाई लिखाई की बात ही करनी बंद कर दी है। इनमें सबसे कुरूप चेहरा हिन्‍दीभाषी बुध्दिजीवी लेखक हैं । तमिल, मलयालम, बंगला के दिल्ली में स्थित स्कूलों में तब भी उनकी भाषाएँ बेहतर सम्मान पा रही हैं । दिल्ली के गोल मार्केट के समीप मुक्तधारा भवन में इस बार की पुरस्कृत बंगाली फिल्मों का प्रदर्शन था । सर्वश्रेष्ठ कलाकार के रूप में पुरस्कृत अनिदिंता बनर्जी समेत नये पुराने दिग्गज कलाकारों समेत संसद सदस्य भी मौजूद थे । सभी वक्ता बंगाली में ही बोले । न सचिन, धोनी की अंग्रेजी वहाँ थी, न उन्होंने हिन्‍दी पट्टी के अधकचरे नौकरशाहों, नेताओं की तर्ज में अंग्रेजी बोलने की कोशिश की । हाल ही में करूणानिधि और केरल मॉडल की भी तारीफ की जा सकती है । देश के इन हिस्सों से सबक लेने और इन्हें एक विश्वास के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है लेकिन हिन्‍दी के लिए कोई भी आवाज कहीं से भी नहीं उठ रही है । उत्तर प्रदेश, बिहार के उन नागरिक बुध्दिजीवियों की तरफ से भी नहीं जो अपने खिलाफ किसी भी राजनेता की छोटी सी टिप्पणी कर देने भर से ही लोकतंत्र की दुहाई देते हुए सड़क पर उतर आते हैं । अकादमियाँ बनाने के दौड़ में ये जितने शामिल हैं काश स्कूलों में कम से कम दसंवी तक हिन्‍दी को अनिवार्य बनाने के लिए यदि थोड़ा भी चिंतित होते तो शिक्षा की सूरत इतनी बदशक्ल नहीं होती ।

 

शिक्षा में सुधार के नाम पर पिछले 5 – 7 वर्षों से रोज कुछ न कुछ गाया-बजाया जा रहा है । नया पाठ्यक्रम, ग्रेड सिस्टम, दसवीं की परीक्षा की अनिवार्यता को खत्म करने से लेकर क्वालिटी के नाम पर विदेशी विश्वविद्यालयों को न्योता । कुछ कदम बेशक जैसे कि पाठयक्रम निर्माण सराहनीय कहे जा सकते हैं लेकिन अपनी भाषाओं में माध्यमिक स्तर तक अनिवार्य रूप से और विश्वविद्यालय के स्तर पर भी अपनी भाषा में शिक्षा की सुविधा देने जैसे किसी भी मसले पर एक भयानक चुप्पी है । शिक्षाविद डॉक्टर डी.एस. कोठारी की अपनी भाषाओं में शिक्षा देने की सिफारिश को कभी भूल से भी याद नहीं किया जा रहा है । एन सी ई आर टी द्वारा हाल ही में प्रकाशित समझ का माध्यम में इसकी कुछ प्रमुख बातों को फिर से रेखांकित किया गया है:-

शिक्षा आयोग की रिपोर्ट : स्कूली पाठ्यचर्या – 1964-66

आज हमें प्राथमिक शिक्षा में जिस आधारभूत प्रश्न का समाधान करना है, वह है- मातृभाषा में अच्छी तरह पढ़ाना और निरक्षरता समाप्त करना । उद्योग की दृष्टि से उन्त देशों में भी, पहले प्राथमिक शिक्षा का पूरा पाठयक्रम केवल एक भाषा के अध्ययन पर आधारित रहता था । शिक्षा के विकसित होने और आर्थिक स्थिति में समृध्दि के आने के बाद ही, उन्होंने प्राथमिक अवस्था में दूसरी भाषा शुरू की ।
हमारा विश्वास है कि अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा सीखने से पहले मातृभाषा पर पर्याप्त अधिकार हासिल कर लेना चाहिए । इसके अतिरिक्त अवर प्राथमिक कक्षाओं में, जिनमें लाखों छात्रों का नामांकन होता है, अंग्रेजी के प्रभावी शिक्षण के लिए बहुत बड़ी संख्या में प्रशिक्षित अध्यापकों की आवश्यकता होगी, लेकिन वह उपलब्ध नहीं हैं । यदि उपलब्ध हो जाएं तो इस कार्यक्रम से शिक्षा के लिए नियत की गई निधि पर बहुत बोझ पड़ेगा । हमारी राय में, यह बहुत बड़ा काम है और व्यर्थ में इसके पीछे पड़ने पर स्कूल अवस्था पर अंग्रेजी का स्तर उठने के बजाय गिर जाएगा । इसलिए हम सिफारिश करते हैं कि विदेशी भाषा के रूप में अंग्रेजी का अध्ययन कुछ-एक स्कूलों में प्रायोगिक आधार पर शुरू करने के सिवाय, पाँचवी कक्षा से पहले शुरू नहीं होनी चाहिए ।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति -1968
भारतीय भाषाओं और साहित्य का समूचित विकास और शैक्षिक तथा सांस्कृतिक विकास एक-दूसरे पर निर्भर हैं । इसके अभाव में लोगों की सृजनात्मक ऊर्जा का विकास नहीं हो सकेगा, शिक्षा के स्तर में इजाफा नहीं होगा, लोगों तक ज्ञान की पहुँच नहीं होगी और पढ़े-लिखे तथा आम जनता के बीच की खाई ऐसी ही बनी रहेगी, भले ही बढ़े नहीं पर कम नहीं होगी । कई भाषाएँ पहले से ही शिक्षा के माध्यम के रूप में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर प्रयोग की जा रही हैं । उच्च शिक्षा में भी इसे लागू किए जाने की जरूरत है। 2005 में एनसीईआरटी द्वारा प्रस्तावित पाठ्यचर्या की रूपरेखा में भी इसको दोहराया गया है । स्कूल में पहली भाषा जो पढ़ाई जाए वह मातृभाषा हो या क्षेत्रीय भाषा और उसके बाद दूसरी भाषाओं को स्थान मिले।

ऐसा नहीं कि हिन्‍दी के बुध्दिजीवी, कोठारी आयोग या दूसरी शिक्षा समितियों की इन सिफारिशों से परिचित न हों लेकिन वे शायद ही अपने बूते कभी कोई रास्ता अख्तियार करते हों इनकी लालटेन उसी दल के पीछे जलती और चलती है जो उसमें ईंधन डाले। मंडल कमीशन राजनीतिज्ञों के हित की बात थी वोट की राजनीति कहो या सामाजिक बराबरी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए और उसके कुछ परिणाम अच्छे भी रहे हैं लेकिन काश इसी जुझारूपन के साथ कोठारी आयोग की सिफारिशों के लिए आंदोलन चलता या साहित्य भाषा के मनीषी लेखक इन राजनेताओं पर भाषा के लिए भी वैसा दबाव बनाते तो हम पराजय के इतने निकट नहीं होते। 1979 में कोठारी आयेग की बदौलत सिविल सेवा परीक्षा में अपनी भाषाओं में परीक्षा देने की शुरूआत हुई थी। उसके बाद किसी अन्य परीक्षा में ऐसा नहीं हो पाया । आरक्षण बढ़ाने की लड़ाई जरूर जारी है लेकिन उन दबे पिछड़ों की भाषा के लिए नहीं। क्यों जाहिर है एक सीमा के बाद सारे खाते पीते वर्ग के स्वार्थ जाति धर्म से ऊपर उठकर एक हो जाते हैं और अंग्रेजी उसी के बूते भारतीय भाषाओं को स्कूलों से बाहर कर रही है ।

दिल्ली में यों तो आए-दिन नेपाल, कश्मीर, भूटान से लेकर व्यक्तिगत निंदा-प्रशंसा के लिए अपील और गोष्ठियाँ होती हैं लेकिन मेरी स्मृति में पिछले 20-30 सालों में अपनी भाषाओं में शिक्षा देने जैसे मसलों पर शायद ही कभी कोई गंभीर आंदोलन शुरू हुआ हो । 80 के जिस दशक में उम्मीद यह की जाती थी कि विज्ञान और चिकित्सा की पढ़ाई भी अपनी भाषा में जल्दी शुरू की जाएगी उसके ठीक विपरीत यह हुआ कि सामाजिक विषयों की पढ़ाई भी अपनी भाषा में दिल्ली विश्वविद्यालय में उत्तरोत्तर दुर्लभ होती जा रही है । दिल्ली में पढ़ा रहे उत्तरप्रदेश, बिहार के कई प्राध्यापक मूर्खतापूर्ण अहंकार में ये भी कहतेहैं कि यदि हिन्‍दी में पढ़ना है तो इलाहाबाद, पटना वापस लौट जाओ ।

मैकाले और अंग्रेजी उपनिवेशवाद का रोना बहुत हो चुका। शिक्षा के अधिकार या शिक्षा पर छिड़ी बहस के संदर्भ में हम सबके सामने फिर एक मौका और चुनौती है कि हम गरीब को उसी की भाषा, बोली, लहजे में पढ़ाये लिखाये। उसकी समझ और रचनात्मकता तभी खिलकर सामने आयेगी। यह गरीबों के हित में भी होगा और राष्ट्र लोकतंत्र के हित में भी।

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