गांधी के आखिरी दिन- अनशन, प्रार्थना, प्रवचन

हाल ही में जाने-माने इतिहासकार सुधीर चंद्र की किताब आई है- ‘गांधी : एक असम्‍भव सम्‍भावना’ । गांधी के अंतिम दो-तीन वर्षों का लेखा-जोखा । साम्‍प्रदायिक सद्भावना के लिए अनूठा प्रयास । गांधी के इस पक्ष पर तो कभी ध्‍यान ही नहीं गया । बहुत-से-बहुत इतना सुना, जाना कि 15 अगस्‍त 1947  की आजादी के दिन गांधी नौआखाली में थे । हिन्‍दू-मुसलमानों के बीच मची मारकाट को रोकने की खातिर । कैसी आजादी और कैसा जश्‍न जब अहिंसा की पूरी बुनियाद ही हिल रही हो । आजादी का जश्‍न वे मनाएं जिन्‍होंने अपनी-अपनी कुर्सियों के लिये विभाजन की बात मान ली ।  खैर ! यह पुस्‍तक गांधी के अंतिम दिनों के कतरे-कतरे का बहुत आत्‍मीयता से लिखा आख्‍यान है । इसकी प्रासंगिकता और भी ज्‍यादा इसलिये बढ़ जाती है क्‍योंकि देश के सामने 1946-47 के दिनों से भी बड़ी चुनौतियां हैं । शायद सुधीर चंद इतिहास की  इन्‍हीं पगडंडियों के सहारे, एक सहारे की तलाश में गांधी तक पहुंचे हों ।

 

पुस्‍तक की आधार सामग्री ही गांधी जी द्वारा 1946-47 में किये अनसन, प्रार्थना, प्रवचन हैं । बड़े दिल से निकली हुई किताब है । भावनात्‍मक उछास भी कह सकते हैं । रोज एक नयी समस्‍या से झूझते गांधी । साम्‍प्रदायिकता की लपटों में जलता देश । भ्रष्‍ट आचरण की तरफ बढ़ती कांग्रेस । और किसी वक्‍त उनके पीछे चलने वाली पूरी कांग्रेस, पूरा देश मानो धीरे-धीरे उनसे दूर हट रहा हो । गांधी के ही शब्‍दों में ‘एक दिन था जब गांधी को सब मानते थे । पर आज कहते हैं कि गांधी हमें रास्‍ता नहीं बता सकता ।’ तब क्‍या विकल्‍प बचता है असहाय गांधी के सामने । फिर-फिर वही प्रार्थनाएं, अनसन । प्रार्थना गांधी का नित्‍य क्रम था । हर व्‍यस्‍तता के बीच नियम समय पर । दिन भर की सैंकड़ों घटनाएं, लोगों से मुलाकात, चिट्ठी-पत्री, अखबार से जो भी छनकर उन तक पहुंचता उन्‍हें लगता कि हस्‍तक्षेप करना चाहिए । जनता तक अपनी बात पहुंचानी चाहिए । पूरी पारदर्शिता से उसे पहुंचाते । बस एक लौ के साथ कि सच से दूर न हों । क्‍योंकि सत्‍य गांधी के लिए ईश्‍वर का दूसरा नाम था । अनेकों प्रसंग पुस्‍तक के याद रहने लायक हैं ।

 

काठियावाड़ में मुसलमानों के मारे जाने, उनके घर लूटने की खबर गांधी को ‘डॉन’ अखबार से मिलीं । कुछ चिट्ठियां भी उनके पास पहुंचीं । बस बिछड़ गये दशकों से साथी रहे । इस अवसर पर पटेल पर भी और सामलदास गांधी पर भी जो काठियावाड़ के सर्वेसर्वा थे । प्रार्थना सभा में उन्‍होंने बड़े दु:ख से और विस्‍तार से अफसोस जताया । काठियावाद मेरा घर है । जब घर ही इस तरह से जल जाता है तो फिर किसी को कहने का क्‍या मौका रह जाता है । सामलदास गांधी मेरा लड़का सा ही है । मेरे दिल में चुभता है कि काठियावाड़ में ऐसा हो सकता है और वहां के लोग इस तरह दीवाने बन सकते हैं । काठियावाड़ का दु:ख अगले आठ दिनों तक चलता रहा उनकी प्रार्थना, प्रवचनों में । (पृष्‍ठ 79-80) सामलदास बम्‍बई से तुरंत दौड़े और पटेल भी घबरा गये । गांधी ने सरेआम उनकी खबर ली थी । तो उन्‍होंने अपनी सफाई दी । सफाई का जिक्र फिर गांधी ने 4-5 दिसम्‍बर को अपनी प्रार्थना में दिया । यानि बिना किसी दुराव, छिपाव के जनता तक सच पहुंचना चाहिए । यह है गांधी की निष्‍कपटता ।

 

क्‍या नेहरू की आत्‍मा को भी स्‍वराज के प्रश्‍न पर ऐसे ही नहीं झिंझोड़ा गांधी ने ? गांधी ने यह पत्र पांच अक्‍तूअर, 1945 को अंग्रेजी में नहीं लिखा हिन्‍दुस्‍तानी में लिखा । बड़े ऐतिहासिक महत्‍व का है यह खत । सुधीर चंद्र के शब्‍दों में गांधी का अन्तिम, और पराजित, टेस्‍टामेंट । हिन्‍द स्‍वराज से भी अधिक महत्‍वपूर्ण । दर्शाता हुआ कि गांधी के लिए अपने बीज-पाठ की इबारत का महत्‍व नहीं था । महत्‍व था उसमें कही बात का । तो इस दृष्टि से भी यह खत महत्‍वपूर्ण है कि यह दिखाता है कि गांधी सतत पुनर्पाठ करते रहते हैं । खुले दिमाग से ऐसा पुनर्पाठ जो बदलते सन्‍दर्भ के प्रति अतिरिक्‍त संवेदनशील है । नेहरू को चेताते हुए और हिन्‍द स्‍वराज की बात याद दिलाते हुए – आखिर मैं बूढ़ा हूं और तुम मुकाबले में जवान हो । इसी कारण मैंने कहा है कि मेरे वारिस तुम हो । कम-से-कम उस वारिस को मैं समझ लूं और मैं क्‍या हूं वह भी वारिस समझ ले तो अच्‍छा ही है और मुझे चैन रहेगा । (पृष्‍ठ 26)

 

सबसे खदबदी पैदा करने वाला प्रसंग सोहराबर्दी का है । वही सोहराबर्दी जिन्होंने 16 अगस्‍त 1946 को ‘डायरेक्‍ट एक्‍शन डे’ में भयानक हिंसा कराई थी । सोहराबर्दी गांधी की मदद चाहते हैं हिंसा को रोकने में । सोहराबर्दी ने गांधी पर मुसलमानों के प्रति उदासीन होने का आरोप तक लगाया था । लेकिन गांधी मारकाट को रोकने की खातिर सब भूल गये । बस एक शर्त रखी कि दंगा प्रभावित इलाकों में दोनों एक ही घर में रहेंगे और एक साथ जनता से मिलेंगे । कोई किसी के पीछे बात नहीं करेगा । सोहराबर्दी का मानो काया कल्‍प होता  जाता है और गांधी जैसा कहते जाते हैं वे करते जाते हैं । और दंगों पर काबू कर लिया गया । सुधीर चंद्र के शब्‍दों में ‘अपने को धीरज में रख विपक्षियों के विवेक को जगाना, यह थी गांधी की राजनीति की बुनियाद । विपक्षी को संवाद में ले आने की विलक्षण सलाहियत थी उनमें ।’ उस रात गांधी की इस सलाहियत का कड़ा परीक्षण हुआ । उनके कमरे में घुसते ही नवयुवकों के प्रतिनिधियों में से एक उबल पड़ा : ‘गए साल 16 अगस्‍त के दिन जब हिन्‍दुओं पर डायरेक्‍ट एक्‍शन की मार पड़ी थी तब आप नहीं आए थे हमें बचाने । अब जबकि मुस्लिम इलाकों में थोड़ी-सी गड़बड़ हो गई है, आप भागे आए हैं उनकी मदद करने । हम नहीं चाहते । आप को यहॉं ।’

 

गांधी का जवाब था : ‘अगस्‍त 1846 से अब तक बहुत-कुछ बदल गया है । मुसलमानों ने तब जो किया सरासर गलत था । पर 1947 से 1946 का बदला लेकर क्‍या हासिल होगा  ?’ (पृष्‍ठ 100)

 

एक और मार्मिक प्रसंग । हबीब-उल-रहमान –गांधी के बहुत नजदीक थे । गांधी को चाहते और मानते भी थे । हो सकता है अपराध-बोध जैसा भी कुछ रहा हो कि खुद भी जिम्‍मेदार थे इस आमरण अनशन के लिए । दिल्‍ली में फैली हिंसा के दौरान दूसरे चुनिन्‍दा मुसलमानों के साथ आते रहते थे गांधी के पास मुसलमानों के हालात बताने । कह बैठे एक दिन : ‘अब हमें इंग्‍लैंड का टिकट कटा दें तो अच्‍छा हो । आज तक हमने कांग्रेस के पापड़ बेले, कुरबानियॉं कीं । आज कांग्रेस हमें अपनाती नहीं, पाकिस्‍तान में हमारी जगह है नहीं ।’ गांधी समझ न सके इस उलाहने में दबी पीर, और उबल पड़े : ‘आपको आपके देशबान्‍धव हैरान कर रहे हैं, यह मैं जानता हूं । इसीलिए तो मैं यहां पड़ा हूँ । —- आखिर यह कितने दिनों तक चलेगा ?’ कुछ दिनों से आप पर इस आजाद हिन्‍द में थोड़ी आफत आ गई तो क्‍या आपको गुलामी प्‍यारी है ? फिर यह सारी गन्‍दगी तो उन्‍हीं (अंग्रेजों) की नीति की आभारी है । फिर भी क्‍या आपको अपने देश- भाई के हाथों मरने की अपेक्षा गुलाम रहना ही पसन्‍द है ? क्‍या यही है आपका वह स्‍वराज्‍य और वह आत्‍म-सम्‍मान ? (पृष्‍ठ 156)

 

मानसिक ऊहापोह, निर्णय-अनिर्णय, सहमति-असहमति के कितने-कितने चौराहों की तरफ बढ़ रहे थे सभी नेता । समस्‍या ही इतनी विकराल थी । पटेल गुजरात के थे । सारी उम्र गांधी के सहयोगी व श्रद्धालु रहे । गांधी भी बहुत मानते थे लेकिन उन्‍हें लगने लगा कि मैं सरकार में क्‍यों रहूं । मन में तूफान चल रहा था । गांधी को लिखा कि मैं जिस तरीके से काम कर रहा हूं उससे अलग तरीके से नहीं कर सकता । ऐसी स्थिति में मेरी छुट्टी जल्‍दी कर दें तो मेरा और देश का भला हो सकता है । वरना मेरा बने रहना सत्‍ता का मोह माना जाएगा । (पृष्‍ठ 147) लौह पुरुष का यह कातर पत्र बहुत कुछ कह रहा है ।

 

ऐसे ढेरों प्रसंग हैं जो सदा के लिए दिमाग पर अंकित रहते हैं । 78 वर्ष के बूढ़े को क्‍यों बार-बार अनशन करना पड़ रहा है । आजाद भारत में तो वे बमुश्किल 169 दिन ही जीवित रहे । वे नौआखाली भागते हैं, कभी बिहार, कभी दिल्‍ली । इतनी बड़ी उम्र में इतनी मेहनत । देश की चिंता में और साम्‍प्रदायिक सद्भाव को बचाने के लिए अपनी कुर्बानी देने को तैयार । विभाजन के वे कतई खिलाफ थे । यहां तक कहते कि विभाजन होगा तो मेरी लाश पर होगा । लेकिन हकीकत को पहचानते हुए उन्‍होंने समझ लिया कि देश तो बंट गया अब दिल नहीं बंटने चाहिए । बंटवारे का प्रस्‍ताव मान लेने के अगले हफ्ते ही गांधी ने कहा भले ही भूगोल के टुकड़े हो गए हों पर दिलों के टुकड़े नहीं हुए तो हमें रोना नहीं है ; क्‍योंकि जब तक दिलों के टुकड़े नहीं होते तब तक खैर ही है ।  फिर चाहे मुल्‍क के हिस्‍से पाकिस्‍तान-हिन्‍दुस्‍तान कुछ भी हों । हम एक ही हो जाने वाले हैं । यह नहीं कि वे थककर और परेशान होकर हमें मिलने आएंगे । पर हमारा बरताव ऐसा होगा कि चाहने पर भी वे हमसे अलग रह नहीं सकेंगे ।

 

इसी बात को थोड़ी दूसरी तरह रखते हुए गांधी ने उसी हफ्ते कहा : अब मैं ऐसा मानता हूं कि हिन्‍दुस्‍तान के हिस्‍से हो गए हैं और सब कांग्रेस ने मजबूरी से कबूल किया है । लेकिन हिन्‍दुस्‍तान के टुकड़े हो जाने पर अगर हम खुश नहीं रह सकते हैं तो हम रंजीदा भी क्‍यों हों ? हमें अपने दिल के टुकड़े नहीं होने देने चाहिए । हृदय को चूर-चूर होने से बचाना चाहिए । वरना जिन्‍ना साहब की बात सही साबित हो जाएगी कि हम दो राष्‍ट्र हैं । ….हम सच्‍चे बनेंगे, ईश्‍वर के बन्‍दे बनेंगे और जरूरत पड़ने पर मरेंगे भी । जब ऐसा करेंगे तब हिन्‍दुस्‍तान अलग और पाकिस्‍तान अलग, यह बात नहीं रह जाएगी और ये कृत्रिम हिस्‍से निकम्‍मे बन जाएंगे । अगर हम लड़ाई करेंगे तो हम पर दो राष्‍ट्र का इलजाम सच्‍चा साबित होगा । इसलिए आप और मैं ईश्‍वर से प्रार्थना करें कि हिन्‍दुस्‍तान और पाकिस्‍तान अलग तो हुए पर अब हमारे दिल अलग-अलग न हों ।

 

तीसरे दिन, उसी हफ्ते में, गांधी ने फिर कहा : हम चाहें तो हिन्‍दुस्‍तान तथा पा‍किस्‍तान को या और जो कोई नाम धरो वह बिगाड़ भी सकते हैं और सुधार भी सकते हैं । ….कांग्रेस का धर्म अब यह बन गया है कि पाकिस्‍तान का हिस्‍सा छोड़कर जो उसके हाथ में रह जाता है उसे वह अच्‍छे-से-अच्‍छा बनावे और पाकिस्‍तान वाले अपने हिस्‍से को कांग्रेस वालों से भी अच्‍छा बनावें । तो फिर दोनों मिल जाते हैं और हम सुख से रह सकते हैं । (पृष्‍ठ 61 और 62)

 

उन्‍होंने ईश्‍वर से प्रार्थना की कि हे ! ईश्‍वर हिन्‍दुस्‍तान आजाद तो हुआ उसे बरबाद न कर । गांधी के कलकत्‍ता पहुंचने वाले दिन ही भारत सरकार के सूचना विभाग का एक अधिकारी 15 अगस्‍त के अवसर पर छापे जाने के लिए उनका सन्‍देश लेने गया । गांधी ने कह दिया कि वह अन्‍दर से सूख गए हैं, कुछ नहीं है उनके पास कहने को । भारत सरकार तैयार नहीं थी इस जवाब के लिए । सो दो और अधिकारी भेजे गए गांधी से सन्‍देश देने की विनती करने के लिए । विनती करते हुए उन्होंने कहा कि बहुत ही खराब होगा अगर इस ऐतिहासिक अवसर पर गांधी को कोई ‘मैसेज’ न छपा । गांधी का जवाब था : ‘है नहीं कोई मैसेज, होने दो खराब ।’

 

इसी के दो दिन बाद बी.बी.सी.-ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन-का एक नुमाइन्‍दा आया गांधी से एक संक्षिप्‍त सन्‍देश लेने के लिए जो 15 अगस्‍त को दुनिया भर में प्रसारित होना था । उसे भी गांधी ने कहला दिया कि उन्‍हें कुछ नहीं कहना है । वह भी, स्‍वाभाविक ही, खाली हाथ जाने को तेयार नहीं था । एक बार फिर कोशिश करते हुए उसने गांधी को कहलाया कि हिन्‍दुस्‍तान की आजादी के मौके पर सारी दुनिया जानना चाहेगी कि गांधी को क्‍या कहना है, और इसलिए बी.बी.सी. ने तय किया है कि उनका सन्‍देश दुनिया की तमाम भाषाओं में अनुवाद करके प्रसारित किया जाए । इस बार पहले ही इस्‍तेमाल किए गए किसी कागज के एक टुकड़े की दूसरी तरफ दो वाक्‍य अंग्रेजी में लिखकर गांधी ने उसको भिजवा दिए । ये वाक्‍य थे : ‘आई मस्‍ट नॉट ईल्‍ड टू द टेम्‍प्‍टेशन । दे मस्‍स्‍ट फॉरगेट दैट आई नो इंग्लिश’ । (मुझे इस लालच में नहीं फंसना चाहिए । उन्‍हें भूल जाना चाहिए कि मुझे अंग्रेजी आती है । (पृष्‍ठ 74)

 

सुधीर चन्‍द्र की किताब गांधी के माध्‍यम से अपनी भाषा के पक्ष को भी बहुत गहराई से रेखांकित करती है । याद कीजिए 1945 में नेहरू को लिखा लम्‍बा पत्र । गांधी उसे जान-बूझकर हिन्‍दुस्‍तानी में लिखते हैं, अंग्रेजी में नहीं । जिस पत्र में वे हिंद स्‍वराज की अपनी नयी-पुरानी अवधारणाओं को कहना चाह रहे हैं उसके लिए हिन्‍दुस्‍तानी का चुनाव भाषा के मसले पर उनके भविष्‍य के इरादों को जताता है । प्रार्थना सभाओं में भी वे अधिकतर हिन्‍दुस्‍तानी का प्रयोग करते हैं । साम्‍प्रदायिकता को रोकने के लिए उनकी कही गई ज्‍यादातर बातें उसी जनता की भाषा में ही हैं । इसी पुस्‍तक में एक और वाकया आता है । गांधी का अनसन समाप्‍त करने के लिए जो सौ गण-मान्‍य लोगों की तरफ से पत्र लिखा गया वह देवनागरी हिंदी और उर्दू में था । गांधी के प्रति यदि कांग्रेसी सत्‍ता का कुछ भी सम्‍मान होता तो वह अपनी भाषाओं के मुकाबले अंग्रेजी को इतनी तरजीह नहीं देती । विशेषकर भाषा के मसले पर नेहरू का सारा छदम तार-तार हो जाता है । गांधी जी ने इन्‍हीं को अपना वारिस चुना ।

 

गांधी के साथ कम्‍यूनिस्‍ट कभी नहीं रहे । यह पूरे स्‍वतंत्रता संग्राम से जाहिर है । 1942 के चरम भारत छोड़ो आंदोलन में भी नहीं । लेकिन विभाजन के वक्‍त मारकाट को रोकने के लिये ‘गांधी’ जैसा महापुरुष उनके पास एक भी नहीं है । कम्‍यूनिस्‍टों के साथ परेशानी है कि उनकी बाईबिल भी मार्क्‍स और प्रेरणा भी सारे विदेशी-लेनिन से लेकर माओ तक । इसीलिये भारत में इनकी लोकप्रियता भी सीमित रही है ।

 

क्‍या इतिहास ऐसी भाषा में भी लिखा जा सकता है ? कभी लगता है लेखक नैरेटर है कभी वह गांधी की आत्‍मा में प्रवेश कर जाता है तो फिर बाहर निकलकर खुद से ही बतियाता  है । ठहरकर सांस लेता और फिर-फिर सोचता । मानो इन अंतिम वर्षों में सिर्फ साम्‍प्रदायिकता और उससे उत्‍पन्‍न गांधी का दु:ख उसे कुछ और सोचने ही नहीं दे रहा ।

 

दरअसल पुस्‍तक की मूल चिंता में देश का मौजूदा परिदृश्‍य है । लेखक शायद उसी को समझने के लिये पीछे हटते-हटते गांधी के अंतिम दिनों और उस नये बनते भारत की आकृति की शिनाख्‍त करता है कि कांग्रेस ऐसी क्‍यों हुई  ?  नेहरू के अंदर गांधी से दूर होने के लक्षण सत्‍ता की ओर बढ़ते कदमों के साथ ही क्‍यों आये ?  और सबसे महत्‍वपूर्ण सवाल जो गांधी स्‍वयं से ही पूछते हैं कि यदि आजादी का आंदोलन अहिंसक था तो यह हिंसा क्‍यों फूटी ? और क्‍या यह हिंसा कोई भी पुलिस रोक पायेगी । गांधी कहते हैं यही कि पुलिस आएगी और नागरिकों की हिंसा का दमन करेगी । फिर पुलिस भी आम नागरिकों वाली साम्‍प्रदायिकता से ग्रसित हो जाएगा और अर्द्ध-सैनिक बल बनाए और बुलाए जाएंगे । उनका भी वैसा ही मानसिक कायाकल्‍प होगा, और सेना तलब की जाएगी नागरिक शान्ति कायम करने के लिए । कब तक सैनिक अछूते रहेंगे साम्‍प्रदायिक विद्वेष से ? अछूते रह भी एक, तो साम्‍प्रदायिकता से ओतप्रोत समाज द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए शासक क्‍या उन सैनिकों को बुलाएंगे, या करने देंगे अपना काम ? (पृष्‍ठ 127)

सुधीर चन्‍द्र जी ने चाहे कितने ही ऊंहापोह से गुजरते हुए इसका शीर्षक ‘असम्‍भव सम्‍भावना’ रखा  हो, जो असर पाठक पर बचा रहता है वह यही कि गांधी या उनका बताया रास्‍ता ही एक सम्‍भावना है । देश को बचाने के लिए भी और दुनिया के लिए भी ।

हाल के मुज्‍जफरनगर के दंगो के बीच तो ऐसी पुस्‍तक और भी प्रासंगिक हो जाती है ।

 

पुस्‍तक   : गांधी : एक असम्‍भव सम्‍भावना

लेखक   : सुधीर चन्‍द्रा

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन

कीमत  : 250/- रुपये

पृष्‍ठ    : 184

आई.एस.बी.एन.: 978-81-267-2114-6

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