के.बी.सी.-हिन्दी का करिश्मा

कौन बनेगा करोड़पति कभी का बंद हो चुका है। अलग-अलग लोगों के बीच उसकी अलग-अलग स्मृतियां होंगी । नहीं भी हो सकती हैं । लेकिन एक तथ्य मुझे भाषा के संदर्भ में बार-बार याद आता है कि यदि उसकी ताकत अमिताभ बच्चन थे तो केवल हिन्दी के बूते पर । क्या अमिताभ अंग्रेजी नहीं जानते थे ? जानते थे और इन सब अभिनेताओं से ज्यादा । लेकिन उन्हें पता था कि केवल अपनी भाषा के बूते ही करोड़ों तक इतनी आसानी से पहुंचा जा सकता है । कम ही ऐसे प्रोग्राम होंगे जिन्हें इतनी लोकप्रियता मिली होगी । मेरी स्मृति में राही मासूम रजा द्वारा लिखित महाभारत याद आता है जब सुबह 9 से 10 तक सड़कें भी सुनसान हो जाती थीं । वह भी हिन्दी में ही था ।

 

स्वयं अमिताभ को नायक की सर्वश्रेष्ठ ऊंचाई पर हिन्दी फिल्मों ने ही पहुंचाया । यानि कि पूरे देश का नायक बनना है और सबसे ऊँचा तो हिन्दी के बिना संभवत:असंभव है ।

 

के.बी.सी. के अमिताभ को हिन्दी बोलने में प्रयास नहीं करना पड़ता था । इलाहाबाद के संस्कार, पिता बच्चन की विरासत, हिन्दी फिल्मों के नायक का तराशा व्यक्त्वि और ऊपर से शालीनता । कोई कितना भी उन्हें बड़ा कहता, महान बताता वे उतने ही नम्रता में विनय से भर उठते । लेकिन विनय की भाषा भी हिन्दी ही रही । कभी उर्दू मिश्रित तो कभी हिन्दी प्रदेशों की  शब्द-शब्द एक गहराई से भरा हुआ क्योंकि यह भाषा उनके संस्कारों में थी । कंधे उचका-उचकाकर बोलने वाले सचिन या दूसरे नायक-नायिकाओं का फूहड़ अंग्रेजी प्रदर्शन नहीं था ।

 

ये दिखावा करते हैं कि उन्हें हिन्दी नहीं आती । उन्हें समझ लेना चाहिए कि यदि हिन्दी नहीं आती तो उनकी बात एक सीमा से आगे कम से कम इस देश में तो नहीं ही जाएगी।

 

सरकारी कर्मचारी विशेषकर अफसर अकसर इस भ्रम को बढ़ाने में लगे रहते हैं कि उन्हें तो सिर्फ अंग्रेजी ही आती है । उसका कारण भी साफ है । अपनी छोटी-मोटी विशिष्टता बनाए रखना और साथ ही जनता से दूरी । भाषा की दूरी रहेगी तभी तो उनकी कुछ मुर्खताएं, अस्पष्टताएं लोगों को पता नहीं चलेंगी । पारदर्शिता से भी बचे रहेंगे । कैसे असहज लगते हैं कुछ लोग अंग्रेजी बोलते । मुझे रेलवे स्टाफ कॉलेज बड़ोदरा के वे दिन याद आ रहे हैं जब प्रथम श्रेणी की इंजीनियरी आदि सेवाओं के प्रशिक्षणार्थी सेवा के पहले दिन अपना परिचय देते थे । अधिकतर हिन्दी प्रांत से आने के बावजूद उनका पहले दिन ही अंग्रेजी में मिमियाना उस भविष्य की रूपरेखा बता देता था जिसमें मिमियाने के अलावा कोई विकल्प शायद ही बचेगा । मानों अंग्रेजी न बोलने से उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा । कई बार तो उनका यह व्यवहार एक क्रूर करुणा से भर देता था ।

 

मैं भाषा के कठमुल्लेपन में यकीन नहीं करता । तकनीकी शब्दों को ज्यों का त्यों लेने की जरूरत है लेकिन आम व्यवहार में अपनी भाषा का इस्तेमाल ही हमारे पूरे तंत्र को कौन बनेगा करोड़पति की तरह लोकप्रिय बना सकता है।

 

आपने प्रधानमंत्री वाजपेयी जी को देखा होगा बोलते हुए- क्या अंग्रेजी बोलते हुए वे उतने सहज लगते हैं जितने हिन्दी बोलते ? स्वयं वाजपेयी जी को इन ऊंचाईयों पर हिन्दी भाषा की सहजता ने ही पहुंचाया है । राजनीतिज्ञ भी हमारे नौकरशाहों से ज्यादा समझदार हैं । देवगौड़ा जी ने प्रधानमंत्री बनते ही हिन्दी सीखनी शुरू कर दी थी । कितनी सीख पाए ? यह अलग बात है लेकिन उनकी निष्ठा में कोई कमी नहीं थी।

 

वक्त आ गया है जब हम इन उदाहरणों से सीख लेकर व्यवहार में अपनी भाषा का इस्तेमाल बढ़ाएं ।

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