केकड़ा संस्‍कृति

यह तो होना ही था । और कौन जाने कितने अन्‍य हिन्‍दी भाषी अपने सपनों में वैसा ही बनने की सोचते हों । यानि कि अंग्रेज़ी में लिखने-बोलने का अभ्‍यास तो जन्‍म से हर भारतीय अपनी-अपनी सुविधाओं के हिसाब से करता ही है । ‘आखिर मैसेज (संदेश)पहुँचता तो है उन तक जो मैटर करते हैं।’ चलो संदेश भाड़ में जाए, आप नाम तो पहुँचता है । नाम से कुछ नहीं होता ? और किससे होता है ? राजकमल झा, पंकज मिश्रा, झुम्‍पा लाहिड़ी, सागरिका घोष, अमिताभ घोष, विक्रम चंद्रा और अरुंधती रॉय—क्‍या आपने इनकी कोई किताब पढ़ी है ? भले ही एक ही लिखी हो इन्‍होंने । इसके बावजूद आप इनके नाम से ऐसे परिचित हैं जैसे- गांधी, सुभाष, नेहरू । पहले नाम ही पहुँचता है न !

 

मृणाल पांडे हिन्‍दी  में 30  वर्ष से लिख रही थीं । कहानियां लिखीं, उपन्‍यास लिखे । स्‍त्री-विषयक विषयों पर धुआंधार लिखा, संपादिका रहीं, दैनिक की भी, साप्‍ताहिक की भी । लेकिन किसी भी हिन्‍दी  अखबार ने उनकी किसी भी किताब की ‘डेटलाइन’ में पहले पृष्‍ठ पर स्‍टोरी की ? वह भी दो-तीन दिन लगातार । साप्‍ताहिक परिशिष्‍ट में अलग । और एक अखबार ने नहीं । सभी ने । मृणालजी को हफ्ते भर में जो पब्लिसिटी अंग्रेज़ी में छपी ‘माई ओन विटनैस’(My own witness) ने दिलाई वह उनको 30  साल में भी नहीं मिली होगी । और अंग्रेज़ी में पहली किताब पर ही ।  अंग्रेज़ी वाले सभी के साथ ऐसा ही करते हैं । राजकमल झा हों या अमेरिका में बैठी झुम्‍पा लाहिड़ी, उनकी शादियों तक ही खबरें भी मुख्‍य पृष्‍ठ पर सम्‍मान से छापते हैं । हिन्‍दी  अखबार तो शादियों की खबरें ही छापते हैं, लेकिन लालू की बेटी, मुलायम के बेटे, सोनिया जी के नानी बनने की मिनट-दर-मिनट खबर या उसके नामकरण । या बची-खुची जगह लारा दत्‍त, गोविंदा की खबरें ले लेती हैं ।  और ये सब मुख्‍य पृष्‍ठ पर मुख्‍य खबर होती हैं। हिन्‍दी  के उन अखबारों में भी जो अपने को ‘पंजाब केसरी’ से अलग मानते और घोषित करते हैं। यदि अंग्रेज़ी का सांचा उधार लें तो क्‍या रामविलास शर्मा, राजेंद्र यादव, विनोद कुमार शुक्‍ल, मैत्रेयी पुष्‍पा, अलका सरावगी, नई-पुरानी पीढ़ी के किसी भी लेखक पर इस किस्‍म की ‘डेटलाइन’ नहीं जा सकती ? उनके लेखन को आधार बनाकर । नई रचना के संदर्भ में, पुरस्‍कार के बहाने । नहीं, हिन्‍दी  में ऐसा होगा भी तो सिर्फ मरने के बाद । मरती भाषा प्रतीक रूप में मृत्‍यु में ही संतोष ढूँढ़ती है ।

 

किसी विद्वान ने एक बार एक सेमीनार में हिन्‍दी  विद्वानों की तुलना उन केकड़ों से की थी जो आपका अलग आगे बढ़ना बरदाश्‍त ही नहीं कर सकते । केकड़े की खासियत होती है कि एक-दूसरे को इस कदर पकड़े रहते हें कि आप अलग हो ही नहीं सकते । खुद भी वहीं मरेंगे, आपको भी वहीं मरने को विवश करेंगे ।

 

दिल्‍ली से लौटे एक मिश्र बड़े उदास थे । काराण—‘जहां भी गया, और कोई बात ही नहीं है किसी के पास । हर लेखक दूसरे लेखक के बारे में जाने क्‍या-क्‍या अनर्गल प्रचार में शुरू हो जाता है । हर लेखक की अपनी पत्रिका है या कहिए उसने शुरू ही दोस्‍तों की तरफ तोप का मुँह करने के लिए की है । उसमें भी यही । बात कुछ भी शुरू कीजिए, लौट-फिर कर वही विष-वमन । या अनंत गाथाएं हैं उनके पास—दस-बीस साल से लेकर खबर इतने वीभत्‍स, दावपेंच के रूप में हो जाएगी कि आप माथा पीट लें ।’ आप इस प्रदूषण का क्‍या करेंगे ? दिनभर की बसों में जाने-आने, बिजली-पानी की चिंताओं से पस्‍त दिल्‍ली का लेखक सिर्फ इसी में आत्‍मसंतुष्टि पाता है । आप लाख चाहकर भी इस साहित्यिक प्रदूषण से नहीं बच सकते ।

 

क्‍या केकड़े की कहानी सच नहीं लगती आपको इन लेखक-मित्रों को देखकर ?

 

अभी हाल ही की बात है । पिछले पुस्‍तक मेले में घूमते-घूमते एक वरिष्‍ठ कवि व संपादक मिल गए । उनकी12  वर्षीय बेटी भी साथ थी । संपादक मित्र ने परिचय कराया । बेटी ने तनिक आश्‍चर्य से पूछा,‘ये वैसे ही लेखक हैं, जैसे अरुंधती रॉय ?’ हम दोनों से कोई जवाब नहीं बना । क्‍या हम कह सकते हैं कि हमारे बड़े-से-बड़े लेखक को भी वह नाम और नामा नहीं मिला जैसा कि अरुंधती रॉय को उनकी महज एक पुस्‍तक की प्रविष्टि ने दिला दिया है ? क्‍योंकि यह पुस्‍तक अंग्रेज़ी दुनिया में, अंग्रेज़ देश से, अंग्रेज़ प्रकाशक ने हिंदुस्‍तान की धरती पर उतारी है ।

 

तुम कहां झक मार रही थीं मृणालजी अब तक ? कटे बाल, स्‍मार्ट मुस्‍कराहट, अभिजात्‍य शैली, अंग्रेज़ी अदाएँ ! तुम और हिन्‍दी  ? हिन्‍दी  को तो त्रिलोचन, नागार्जुन जैसे बाबा लोगों के लिए ही छोड़ दीजिए । आओ, बैठो इस अंग्रेज़ी की नाव में । हम तुम्‍हें अभी सात समुद्र पार ले चलते हैं । और मृणालजी बैठ गईं । हममें से कई बैठने की तैयारी में हैं ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.