कथाकार संजीव —— कुछ नोट्स

जुलाई 6, 2012 को कथाकार संजीव 65 वर्ष के हो गये । प्रेमचंद की विरासत थामे इस उपन्याीसकार का हाल ही में प्रकाशित उपन्या।स ‘रह गयी दिशायें इसी पार’ उनकी कथा यात्रा का महत्वापूर्ण पड़ाव है । इससे पहले उनके प्रकाशित उपन्याेस हैं :- किशनगढ़ के अहेरी, सर्कस, सावधान ! नीचे आग है, धार, पॉंव तले की दूब, जंगल जहॉं शुरू होता है और सूत्रधार ।

तीस साल का सफ़रनामा, आप यहॉं हैं, भूमिका और अन्यउ कहानियॉं, दुनिया की सबसे हसीन औरत, प्रेत मुक्ति और अन्य, कहानियॉं, ब्लैाकहोल, खोज, दस कहानियॉं, गति का पहला सिद्धांत, गुफा का आदमी और आरोहण (कहानी संग्रह) ।

जन्मिदिन पर पाठकों की हार्दिक शुभकामनाएं ।

———

डायरी : 1991

सारिका के जनवरी 1980 के पुरस्काार अंक में ‘अपराध’ कहानी छपी थी- प्रथम पुरस्कृरत । तब से आज तक सैंकड़ों कहानियॉं पढ़ीं होंगी किन्तुर बहुत कम ऐसी हैं जिन्हेंक लौट-लौट कर पढ़ने को मन करता है । रामचन्द्रन शुक्लु के शब्दोंह में- प्रेम में हम एकाधिकार चाहते हैं जबकि श्रद्धा में हम चाहते हैं कि दूसरे लोग भी उसे प्याशर करें । शायद एकमात्र कहानी जिसकी मैंने बीसियों प्रतियॉं कराके उनको दी हैं जो हिन्दी कहानी की दरिद्रता को रोते हैं या जिनकी नजरों में आने से यह कहानी रह गयी । नक्सदलवाद को मैंने पहली बार उसी कहानी के माध्येम से अनुभव किया था । इससे पहले पता नहीं मैंने नक्सपलवाद नाम सुना भी था या नहीं । किन्तुय उसके बाद इस विचारधारा को न मैं निगल पाया, न अस्वीभकार कर पाया और यह सब असर है अपराध कहानी के पात्र बुलबुल और सचिन का । लोहे की भट्टी में तपे हुए दहकते अंगारे से पात्र ।
यूनिवर्सिटी में किसी को रिसर्च करते देखता हूँ तो याद आता है- ‘अपराध’ कहानी पर किया जाने वाला शोध । लाइब्रेरी ढूँढ़ते, खोजते, हर शोधार्थी की हर थीसिस मुझे ऐसा प्रयास लगती है कि जिसका कोई उपयोग नहीं इस सामाजिक व्यिवस्थाय में । मात्र डिग्री के लिए-किसी पिता के मंसूबों को साधने, तो कभी किसी रिश्तेमदार की नाक को लंबा करने के लिए । जब भी किसी बड़ी नदी को मैंने रेलगाड़ी में पार किया है, मेरी ऑंखों में अपराध पर लिखी थीसिस छपाक से पानी में गिरती है और सारी नदी में कागज छितराने लगते हैं । और बुलबुल भी । बुलबुल डॉक्ट र थी । सचिन कहता है- दीदी तुमी बुझवैना । ये सामंतोवादी शिक्षा व्योावस्थाी । तो अगले ही पल प्या।र की ठंडी फुहार छोड़ती बुलबुल । ऐसो ! हमार राजकुमार ।
कहानी में सचिन को दारोगा के मुंह पर थूकने का प्रसंग कितना सार्थक है । दारोगा जी । तुम नहीं समझोगे । अपने बेटे को भेज देना- उसे समझा दूंगा । कितनी गहरी पकड़ है- वक्तप के साथ हम सभी सुभाष, नेहरू बनते हुए अंत में गांधी में तब्दीील हो जाते हैं । सचमुच गर्म खून की भाषा गर्म खून ही समझ सकता है ।

साहित्यिक आलोचना की परिधियों से परे यह कहानी कुछ बड़े सीधे-सीधे प्रश्नय खड़ा करती है । क्यार हिंसा को और बड़ी हिंसा और नफरत को नफरत से दबाया जा सकता है ? जो व्येवस्थास स्वीयं अपराध को पैदा करती हो, उसके कारणों को जानने और लीपापोती के लिए अनुसंधान या आयोग, कमेटियॉं बनाने का कोई अर्थ है ? आखिर कौन सी मजबूरी है जिसके चलते डॉक्टयरी पढ़ रही संघमित्रा, जो मुर्दे की चीरफाड़ से भी बेहोश हो जाती थी, परिस्थितियों के वश में स्वीयं शातिर अपराधी बन जाती है ? सिद्धार्थ और सचिन जो एक छत के नीचे मार्क्सश, लेनिन और ‘सामन्तोावादी शिक्षाव्योधवस्थास’ को समझने की कोशिश कर रहे हैं; उनमें से एक अपराध की दुनिया से गुजरता हुआ जेल के सीखंचों के पीछे पहुँच जाता है और दूसरा उन्हीं प्रवृत्तियों पर तथाकथित शोध करके फलता-फूलता है । क्यों कि सिद्धार्थ, सेसन जज-पिता, एस.पी.-बड़े भैय्या, जिलाधीश-छोटे भैय्या और गृह सचिव जीजाजी की बदौलत ऐन वक्तप पर सचिन से ठीक विपरीत सॉंचे में फिट कर दिया जाता है । सुविधा भोगी ये सब वही चेहरे हैं जिनके लिए ‘न्यांय तथ्यस सापेक्ष है, सत्यृ सापेक्ष नहीं । तथ्य का प्रमाण स्वकयं में सामर्थ्य‍ सापेक्ष है । अत: निर्णय लचीला होता है । पुलिस एफ.आई.आर. प्रस्तु त करती है । चार्चशीट पेश करती है । गवाह होते हैं अपराध के सबूत । वकील होते हैं, कानून की किताबें होती है । इन सबमें से पर्त-दर-पर्त जो निष्क र्ष छन-छन कर आता है, हम वहीं निर्णय तो दे सकते हैं । और फिर तुम जिसकी सिफारिश करने आये हो उसका तो मुकाबला ही सत्ता, से है जो हमेशा न्यासयपालिका पर हावी रहती है ।’ सेसन जज पिता का सचिन के पिता को यह कहना है तो बेटे सिद्धार्थ के लिए यह कि ‘सी.बी.आई. वाले कब के तुम्हाररे विरुद्ध कदम उठा चुके होते । बचते आये हो तो अपने जीजाजी के चलते । लेकिन यही रवैया रहा तो आई फाइनली वार्न यू….यानि कि बड़े-बड़े सिद्धान्तों की दुहाई देता हुआ न्यााय ऐसा तरल पदार्थ जिसे जिस पात्र में ढाल दें वैसा ही ढल जायें । और सिद्धार्थ आ गया सुधार के रास्तेर, उस सॉंचे की बदौलत जो उसे मिला और सचिन बना खुँखार नक्सेलवादी उसी व्यतवस्थाी के दूसरे सॉंचे में ढलकर ।
सेशन जज पिता और एस.पी. भाई के सामने टी.वी. के सेनिटोरियम से सचिन के पिता हॉंफते-हाँफते दौड़े आये । किन्तुम न सचिन के पिता की याचना का कोई असर पड़ा, न सचिन का अपनी सफाई में एक शब्दे न कहने का । उल्टेच नक्सअलवाद को खत्म करने के लिए नक्स लवादी गॉंव को जलाने के पुरस्काकर स्वेरूप उनका प्रोमोशन हो गया ।
लेकिन उसी सचिन की सिफारिश यदि राजनेता, एम.एल.ए., एम.पी. या व्यिवस्थास का बड़ा अफसर एस.पी., जज, सेक्रेटरी करता या इनके किसी आदमी का आदमी निकल आता तो भी क्याथ दंड वही रहता ? यह सच केवल बिहार या बंगाल का सच नहीं है, आज पूरे देश का सच बन चुका है । कन्या कुमारी से लेकर कश्मीकर और आसाम से सोमनाथ तक गाया जाने वाला राग इस दोगली व्य वस्था का क्रूर चेहरा है ।
1967 में बंगाल के नक्सेलवाड़ी गॉंव से शुरू हुए इस आंदोलन ने देश के विभिन्नै हिस्सोंन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं और इसके पक्ष-विपक्ष में चली आ रही मीलों लम्बीस बहस का अभी भी कोई सिरा नहीं नजर आ रहा । अनेकानेक गुटों में फलता-फूलता यह आन्दोअलन स्वा धीन भारत के इतिहास में आज भी उतना प्रासंगिक बना हुआ है जितना सत्तआर के दशक में । लेकिन जो निष्किर्ष, निर्णय लाखों करोड़ों पन्नोंआ में नहीं मिलेंगे वे इस छोटी सी कहानी में बहुत संतुलित ढंग से रखे गये हैं- एक सहज पारदर्शी भाषा में । इतनी गुरू गंभीर विचारधारा का इतना पठनीय प्रस्तुपतीकरण । नक्स लवाद पर यूँ तो और भी कहानियॉं, उपन्यानस आये हैं पर इतनी खूबसूरती के साथ समस्यान को शायद ही किसी ने उठाया हो । संजीव यहीं बाजी मार ले गये हैं । शुरू से अंत तक अदृश्यश, बारीक धागों में बुनी सचिन और संघमित्रा की प्रेम कहानी- बिल्कुृल ‘ उसने कहा था ’ की तर्ज पर । किन्तु सौ वर्ष बाद के सामाजिक यथार्थ के अनुकूल व अनुरूप । मौजूदा भारत की मुकम्मिल तस्वीीर जिसमें अपने समय का सब कुछ बोलता है- प्यातर, नाते-रिश्तेि, व्यकवस्थान, जेल, विचारधारा । हिन्दी साहित्यन जिन कहानियों के बूते विश्व, साहित्य् को टक्केर दे सकता है अपराध उनमें से एक है ।
कहानी की एक अद्वितीय विशेषता उसका शिल्पक पक्ष भी है । एकदम लचीला-फंतासी का ऐसा प्रयोग जिसमें घटनाओं को मनमर्जी पाठकों के सामने रखा जा सकता है । उसका प्रवाह कहानी खत्मस होने से पहले भी पाठक को नहीं छोड़ता और न खत्मै होने के बाद ।
हिन्दीत की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक । यहीं कुछ कारण हैं जिससे मैं बार-बार इसकी प्रतियॉं कराता हूँ और दोस्तोंक को देता हूँ- देखो हिन्दीै कहानी क्याे चीज है ? मेरे मित्रों ने कहा कि यह कहानी बहुत भावुक है । मैं चुप रहता हूँ । यदि समाज का इतना वास्तरविक यथार्थ घिनौना रूप भी आपको भावुक नहीं बना सकता है तो साहित्यव आखिर क्याा बला है ? मैंने यह कहानी 1980 में पढ़ी थी और आज 1991 में भी मुझे भावुक बनाती है तो मैं ऐसी भावुकता की कद्र करता हूँ ।
साहित्या का अधिकांश क्याै भावुकता के बिना संभव हो पाता ?

 

डायरी : 3 मार्च 2011

यह देश का दुर्भाग्या है कि 60 सालों के बाद भी सत्ताी उन लोगों के पास सरकती चली गई जिसमें समाजवादी संविधान के बावजूद एक आदमी पांच हजार करोड़ का मकान मुम्ब ई में बनवा रहा है । दो-चार किलोमीटर की यात्रा भी हेलीकॉप्टमर से करते हैं और गरीब मुल्कह का इतना पैसा उनके गुप्ता नामों से विदेशी बैंकों में जमा है, जिसे अगर बॉंट दिया जाए तो पूरे देश में खुशहाली लौट आए । इसी दुर्भाग्या की परछाई साहित्यॉ को घेरे हैं । वैसे भी साहित्यल, समाज या राष्ट्रश का दर्पण ही तो होता है । नतीजा यह हुआ कि वह कहानी और उपन्यांस जो दिल्लीट या महानगरों में पहुँचे साहित्य कार पश्चिम, लैटिनी लेखकों के वक्त व्य , अंग्रेजी अदा के तड़के और स्त्रीा स्व्तंत्रता के नाम पर मनोवैज्ञानिक फ्राइड की आड़ में जरा साहित्यिक अंदाज में सैक्सस के चित्रण में रहे, उन्हेंर मीडिया या परजीवी आलोचक बुद्धिजीवियों के बैंड बाजे ने सारे देश के लिए आदर्श माना । जब आदर्श ऐसा हो तो संजीव जैसा ग्राम, कस्बाेई, मजदूर संवेदना का कथाकार कहॉं टिकता ? बंगाल की कुलटी जैसी छोटी-सी जगह में दिन-रात अपनी नौकरी करते हुए जो लिखता रहा उसे दिल्ली में बैठे आलोचकों ने शायद ही कभी जिक्र करने लायक समझा हो ।
सैंकड़ों कहानियॉं संजीव ने लिखी हैं और हर कहानी एक नयी जमीन तोड़ती है । ‘तीस साल का सफरनामा’ से बात शुरू की जाए तो यह कहानी आजादी के बाद चकबंदी के नाम पर जो कुछ हुआ उसकी व्यमथा कथा है । 1977 में यह कहानी लिखी गई थी तो ‘सुरजा’ आजादी की तरह तीस साल का था लेकिन ‘तीस की उम्र में ही उसके निचुड़े चेहरे, उस पर उगी बेतरतीब दाड़ी एक ऐसा चलता-फिरता दस्ताीवेज है जिस पर तीस साल की आजादी का इतिहास भूगोल सब कुछ पढ़ा जा सकता है ।’ श्रीलाल शुक्ला के राग दरबारी में भी ऐसे ही गॉंव के स्कूरल प्रधान, पंचायत के सैंकड़ों चित्र उभरते हैं लेकिन संजीव की कहानियॉं कभी-कभी उस पर भी भारी पड़ती हैं । नयी पीढ़ी तो गॉंव की भी, चकबंदी में हुए अन्याकय को नहीं समझ सकती शहर की तो बात छोड़ो । उन्हेंव जिन्हेंी यह नहीं पता कि दूध मदर डेयरी से आता है या गाय-भैंस भी देती हैं । गांव के जमींदार पैसे वाले जिनके यहॉं चकबंदी की लूट का चित्र देखिए । ‘जी ! …….. लूट शब्दव पर आपको आपत्ति है ? चकों को देखकर आप ही कोई उचित शब्दभ सुझाइये । यह रहा सरजू पांडे का चक । जमीन आठ आने मालियत की थी । कानूनगो साहब को प्रसन्नह कराकर चौदह आने मालियत की बनी और फिर नहर के बगल दो आने मालियत की ऊसर में आकर सात गुनी बन गयी । समय पर खुरबूजे और दशहरी आम न पहुँचा पाने के कारण सन्तोुखी कोइरी और मैकू कुरमी के द्वार पर के खेत और बाग का स्वातमित्वक खटाई में पड़ गया । गणेसी बढ़ई थोड़ा टेंटिया गया था । दो ही कुर्सियॉं तो मॉंगी थी साहब ने ! फल यह हुआ कि उसकी सिंचित गोंअड़ एक बीघे जमीन सोलह से दस आने मालियत की हो गयी । गणेसी गिड़गिड़ाया तो कानूनगो ने कानून की बारीकी समझायी – बाग की छाया पड़ रही थी उस खेत पर (पृष्ठी 110)
हजारों गरीब छोटे किसान इस चकबंदी ने बरबाद कर दिए तो वहीं भ्रष्‍ट, नौकरशाही, रिश्व त के बल पर नये अमीर सामंत पैदा हुए । धीरे-धीरे इन्होंटने लोकतंत्र के नाम पर सत्ताव पर भी कब्जाे किया । और सत्ताध पर कब्जाे होने के बाद अगला अध्याेय शुरू होता है यानि कि रामहरख पांडे, लोटन यादव और रमाशंकर सिंह जैसे समृद्ध किसान सामंती कागजों पर भूमिहीन बन गये और हरखू, लोटू और शंकर हरिजन के नाम से बंजर जमीन इन्हेंो मिल गई । ऐसे चरित्र, चित्र, भाषा शायद ही इधर के किसी लेखक के पास हों ।
पिछले दिनों 60 साल की आजादी के बाद माओवाद, नक्स,लवाद की आवाजें फिर उठ रही हैं । सुरजा की जमीन तो गई ही गई उसे एक चोरी के आरोप में जेल भी भिजवा दिया गया और सत्ताज का चमत्कामर देखिए जिस नंबरदार ने उसे जेल भिजवाया था उसी ने उसको बाहर निकलवाकर वाहवाही लूटी । इन स्थितियों में कौन पागल नहीं हो जाएगा और वही सुरजा के साथ हुआ । ऐसे प्रसंगों पर अखबारों में ऐसी खबरें आने पर बुद्धिजीवियों के बीच बहस चल पड़ी । ‘ब्लै क पैंथर ! मार्क्सा का वर्ग-संघर्ष ! …. नहीं-नहीं, लोहिया का वर्ण-संघर्ष ! किसी ने हेगेल के ‘फेनो-मेनोलॉजी ऑफ़ माइंड’ से प्रभावित बता डाला तो किसी ने फेनन की ‘द रैचेड ऑफ़ द अर्थ’ में ही इसका स्रोत ढूँढ निकाला । बड़े तर्क-वितर्क के बाद यह मान लिया गया कि सुरजा नक्सडलपंथी है ।’
यदि इस कहानी को ‘तीस साल का सफरनामा’ के बजाय साठ साल का सफरनामा कह कर फिर से छापा जाए तब भी चमकते भारत की चकबंदी में पाठक पाएंगे कि सुरजा की तकदीर में कोई अंतर नहीं आया । उसे सत्ताे अभी भी नक्सगलवादी या माओवादी बता रही हैं । लेखक की कल्पतना की उड़ान देखिए जो वह कहानी की अंतिम लाइन में कहता है ‘और जनाब कुसुमपुर की नियति को फुला दीजिये तो यह पूरे देश की नियति हो जाएगी ।’ मात्र तीस साल की उम्र में संजीव ने ऐसी ढेरों कहानियॉं हिन्दीत साहित्यख को दी । उनको बड़े बुद्धिजीवियों के बड़े समारोहों में वह कुर्सी भले ही न मिली हो लेकिन हिन्दीय पट्टी के गॉंव के अधिकॉंश नौजवान उनकी एक-एक कहानी को छाती से चिपकाए फिरते हैं ।
एक और कहानी है उनकी ‘भूखे रीछ’ । तीस साल का सफरनामा यदि चकबंदी, गॉंव के किसान की विकट स्थितियों का बयान है तो भूखे रीछ मिलों, फैक्टीरियों में काम करने वाले मजदूरों की । राम लाल एक आयरन की फैक्ट री में काम करता है । सायरन की आवाज उठते ही चटपट फैक्टीरी की तरफ दौड़ लगाता है । दिन के भुकभुके की तरह कहानी की शुरूआत होती है । राम लाल दातौन फाड़कर ‘ओ-ओ’ करते हुए जीभ साफ करके बंगले की फालतू नल पर दो-एक कुल्लीस करने के बाद हर-हर गंगे करता हुआ नल के नीचे नहाने बैठ जाता है । फिर देह का पानी पोंछे बिना ही बसाती बनियान पर कालिख-पुती कमीज डालकर बेडौल पतलून-जूते से लैस होकर आवाज लगाता है, रज्जोु sss ! रज्जोू sss ! अरी ओ तुरकानी, आज फिर लेट करायेगी क्याल !’ (पृष्ठक 56) सूदखोर सिर्फ गॉंव के सिमाने के अंदर ही नहीं मिलों के अंदर भी बैठे हैं । बलदेव राय जैसे सैंकड़ों बिना कोई काम किये तनख्वािह भी पाते हैं और औने-पोने सूद का पैसा भी बटोरते हैं । राम लाल सोचता है कि सूदखोर लोगों को गेट के अन्देर ढुका लिया जाता है । सारे नियम कायदे हम छोटे लोगों के लिये ही हैं । ये ‘वाचन वार्ड’ लोग कॉय को हैं……. खाली इसलिए कि सरकार के हाथ में जाने से पहले कारखाने का सारा माल बाहर बेच दें !’ …..वह कुछ और बोलने वाला है मगर यह सोचकर सिटपिटा जाता है कि कहीं साले झूठी चोरी के इल्जावम में फँसा दें तो….. ? (पृष्ठी 63)
दिल्लीे में बैठे आलोचक कहानी में गॉंव तलाशते हैं ? कहॉं मिलेगा उन्हें3 गॉंव ? कौन गॉंव, देहात, कस्बा फैक्टपरी में रहता है आज या काम करता है ? लेखन में पूरी की पूरी पीढ़ी, आलोचक समेत शहर में आ चुकी है । चंद कथाकार जिनकी कहानियों में गॉंव जिंदा हैं उनमें हैं काशीनाथ सिंह, संजीव… । चाकरी, मरोड़, भूखे रीछ कहानियों में कहानी उतनी नहीं चलती जितनी कथाकार के अन्द र । भूखे रीछ में मजदूर बस्ती का पूरा जीवन है । नल की लाइन में खड़ा रामलाल, ओवरटैम की इच्छाद में किसी साथी की मौत, बीमारी मांगता, सूदखोर राय से बचकर निकलने की कोशिश में गेट पर अचानक राय आवाज से पकड़ा जाता । बसाती, बनियान, कमीज पतलून में फैक्टजरी में छह बजे से पहले घुसने की कोशिश करना । संजीव ने यह जीवन जिया है इसीलिये यह सब लिख पाये ।
सन् अस्सीय के आसपास मिल मालिकों के शोषण की तरकीबों और उनके खिलाफ उठने वाली सभी आवाजों को इस कहानी में सुना जा सकता है । किसी भी मुद्दे पर हड़ताल हो, हड़ताल शुरू तो होती है लेकिन पैसे के बूते मालिक उसे तोड़ने में भी कोई देर नहीं लगाते । पिछले तीस साल पहले के समय पर नजर डालिये, तो इस कहानी में प्रतिरोध की कुछ प्रतिध्वतनियॉं बहुत साफ हैं । साठ साल के बाद तो यूनियन जैसे चीजें ही नहीं बचीं ।
सन् अस्सीस में ‘अपराध’ कहानी ने संजीव को उस दौर का नायक कथाकार बना दिया था । वह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है । दुर्भाग्यउ बस यही है कि हिन्दीय कहानी का वह नायक आज हिन्दी और हिन्दी् की दुनिया की राजनीति के चलते वैसे ही किसी अंधेरे, एकांत की तरफ बढ़ रहा है जहॉं तीस साल के सफरनारमा का सुरजा या ‘बूढ़ा रीछ’ का राम लाल या अपराध कहानी का सचिन पहुँचा था । यदि देश की सत्ताज उनके हाथों में पहुंचती जो वाकई इस देश का पेट भर रहे हैं, तो संजीव, प्रेमचंद के बाद सबसे प्रमाणिक कथाकार होते ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *