‘आप’ का स्‍वयंसेवक

मैं बंगलौर में बैठा दिल्‍ली में आप पार्टी की खबरों से बेचैन हूं । मुझे यकीन नहीं हो रहा कि केजरीवाल, योगेन्‍द्र यादव के बीच ऐसी भी खटास पैदा हो सकती है । अभी तो एक महीना भी पूरा नहीं हुआ चुनाव बीते और गद्दी संभाले । आप पार्टी के वरिष्‍ठ नेता और चिंतक राजमोहन गांधी की ही एक बात याद आती है कि हम दुश्‍मन को हटाने में जितने सक्षम होते हैं उसके बाद के स्‍वप्‍न को साकार करने में नहीं । चुनाव के वक्‍त मैं दिल्‍ली में ही था । मनीष सिसोदिया के क्षेत्र का मैं मतदाता हूं । क्‍या उत्‍साह था कार्यकर्ताओं में, समर्थकों में । ज्‍यादातर अपनी नौकरियों के बीच छुट्टी लेकर आए हुए मेरी उम्र के नौजवान । दर्जनों बंगलौर, मुम्‍बई के दोस्‍त ।

तीस वर्ष के आसपास के उम्र की पीढ़ी बहुत बड़े राजनीतिज्ञ अनुभव का तो दावा नहीं कर सकती लेकिन जो कुछ इस उम्र तक आते-आते हमने देखा उसमें लगा कि आप पार्टी कुछ अलग है । क्‍या इससे पहले किसी पार्टी ने ऐसा कहा कि एक परिवार में एक से ज्‍यादा टिकट नहीं मिलेगा; चुनाव में मिले चंदे और उसके खर्च का पूरा हिसाब-किताब जनता के सामने रहेगा और पार्टी की हर बात सूचनाधिकार के दायरे में रहेगी । गरीबों की समस्‍याओं को सुलझाएगी और धंधे, उद्योग उनको भी बढ़ावा देगी । देखतेदेखते दो साल पहले हम सबके अंदर बंगलौर में ही राजनीति में रस आने लगा था । पिछली बार पहले ही प्रयास में बड़ी कामयाबी मिली और 49 दिन के अपने अल्‍पकाल में इस पार्टी ने यह करके भी दिखाया और उसी पर  दिल्‍ली की जनता ने विश्‍वास जताया जब अगले चुनाव में सत्‍तर पार्टी की विधान सभा में 67 सीटें मिली । यह लोगों के अभूतपूर्व विश्‍वास का प्रतीक था आप पार्टी के लिए । अरविंद केजरीवाल ने अपनी जीत के बाद कहा कि हमारा दायित्‍व बढ़ गया है कि हममें कोई अहंकार न आए ।

लेकिन पार्टी में टूट की जो बातें हो रही हैं यह तो कुछ-कुछ अहंकार को छूती हुई लग रही हैं । अगस्‍त 2014 के किसी लेख के बहाने यदि योगेन्‍द्र यादव या दूसरे साथियों पर उंगली उठाई जा रही है तो यह शायद उस जीत की मदहोशी में ही किया जा रहा है ।  योगेन्‍द्र यादव ने जो कुछ कहा या प्रशांत भूषण ने कुछ संदिग्‍ध उम्‍मीदवारों को टिकट दिये जाने को लेकर जो बातें उठाईं इन सबका स्‍वागत होना चाहिए । प्रशांत भूषण जी ने जिन संदिग्‍ध उम्‍मीदवारों की बात की दिल्‍ली के एक बहुत बड़े समझदार वर्ग ने उस पर यकीन किया और फिर भी आप पार्टी का साथ दिया । इस उम्‍मीद के साथ कि यदि किसी पार्टी में ऐसे निंदक नियरे हैं तो उसका भविष्‍य निश्चित रूप से अच्‍छा होगा ।

कौन नहीं जानता कि अरविंद केजरीवाल आप पार्टी की जीत के सबसे मुख्‍य चेहरे हैं । पिछले वर्ष के  चुनावों में भी वे थे और आज भी हैं । नि:संदेह उनकी राजनीतिक समझ उनके सभी साथियों में सबसे पैनी, चुस्‍त तो है ही उनका व्‍यक्तित्‍व भी उतना ही सहज, आत्‍मीय और निडर । इसीलिए यह अचानक नहीं है कि वे मध्‍य वर्ग के भी चहेते हैं और रेहड़ी, पटरी वालों से लेकर स्‍कूटर चालकों, मजदूरों के बीच भी । गांधी के हाव-भाव, शैली, संघर्ष की 21वीं सदी के कुछ-कुछ प्रतिरूप । काश !  वे इसी तरह आगे बढ़ते रहे तो यह 2015 में गांधी के ठीक सौ वर्ष बाद अफ्रीका से भारत में राजनीतिक संघर्ष की एक नयी शुरूआत की तरह होगा ।

लेकिन असली नेता वही होता है जिसकी बात कुर्सी के बिना भी संगठन मानता हो । 1977 के आंदोलन में जय प्रकाश नारायण ने भी वही भूमिका निभाई थी ।  देश की जनता को यह भी यकीन है कि केजरीवाल किसी भी पद पर रहें या न रहें तब भी जनता आप पार्टी को उनके नाम से ही जानती है । केजरीवाल और उनके निकट  कट्टर समर्थकों को यह बात समझनी चाहिए और शायद बिना कारण ऐसी बातों को तूल भी नहीं देना चाहिए ।

वहीं योगेन्‍द्र यादव, प्रशांत भूषण को भी यह समझने की जरूरत है कि वे केजरीवाल और दूसरे लोगों से बेहतर बुद्धिजीवी हो सकते हैं, लेकिन यह सब गुण यदि राजनैतिक सफलता की तराजू पर तौला जाए तो उन्‍नीस ही ठहरते हैं । यहां राजनीति के मुकाबले कला या बौद्धिक जगत को कम ऑंकना नहीं है बल्कि बस इतना भर कहना है कि राजनीति की दौड़ में इन मूल्‍यों को समझने में कम से कम भारत की जनता को अभी कई दशक लगेंगे । आपपार्टी के लिए सबसे जरूरी था तो अरविंद केजरीवाल और उनकी राजनैतिक क्षमता । जनता संघर्ष के इस प्रतीक को पहचानती है । लेकिन सिर्फ यह प्रतीक ही पर्याप्‍त नहीं थे । दिल्‍ली और देश के एक बड़े वर्ग ने इस सबको नौटंकी कहने में भी देर नहीं लगाई । यहीं शुरू होता है योगेन्‍द्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे सक्रिय बुद्धिजीवियों का हस्‍तक्षेप और योगदान । टेलीविजन के हर चैनल से लेकर राजधानी के प्रतिष्ठित अखबारों में केजरीवाल के समर्थन में । उन्‍होंने आप पार्टी और केजरीवाल के धरने, विरोध, विचार की ऐसी व्‍याख्‍याएं प्रस्‍तुत कीं जिसने मीडिया के मन में भी केजरीवाल के प्रति वैसा ही सम्‍मान जगाया जैसा किसी वक्‍त गांधी के समर्थन में अंग्रेजी प्रेस भी जगाती थी ।

यदि दुर्भाग्‍य से पार्टी का विभाजन हुआ तो क्‍या आप पार्टी की छवि वैसी ही नहीं बन जाएगी जैसे देश के दूसरे दल हैं जहां सिर्फ एक आदमी या परिवार ही सुप्रीम होता है ? मेरे जैसे कार्यकर्ता के लिए एक उम्‍मीद की किरण बन कर उभरी आप पार्टी को यह सिद्ध करना होगा कि उसमें विरोधाभासों के बीच लोकतंत्र को बचाने की क्षमता है ।

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