आत्महत्या की शिक्षा (जागरण 9-12-15)

कोटा और दूसरे “शहरों में छात्रों द्वारा आत्महत्या की बड़ती ख़बरें रौगटें खड़ी करने वाली हैं। आत्महत्या से पहले छिपाकर छोड़ी गयी पर्चियॉं लिखते वक्त इन मासूमों पर क्या गुजरी होगी। ‘‘यदि मम्मी सलेक्षन नहीं हुआ तो किसी से नज़रें नहीं मिला पाउंगी। मैं चाहती थी कि आप मुझ पर गर्व करें,’’ एक और परची की ईबारत, ‘‘मॉं मैं बहुत पे्रसर में था। पापा के पैसे भी बरबाद हुए। मैं मजबूर हॅूं।’’ कुछ वर्श पहले दिल्ली में भी एक छात्र ने ऐसा पत्र छोड़ा था। ‘‘मैं फस्र्ट नहीं आ पाया। मम्मी-पापा मुझे माफ करना।’’ बताते हैं कि उस दिन इस 14 वर्शीय बच्चे ने सुबह उठते ही अचानक मॉं-बाप के पैर छूएं थे। प्यार और अपराध बोध की कितनी कशमकश से गुजरते होंगे ये बच्चे।

आखिर दोश किसका है? बच्चों का तो कतई नहीं। वे तो कच्चे मिट्टी हैं जैसा ढालोगे, पकाओगे वैसा ही वे बनेंगे।

कोई और देश होता तो पूरा समाज तंत्र सड़कों पर उतर आता। बीस बरस पहले लंदन के नजदीक एक बच्चे की स्कूल में लाश मिली थी तो हफ्तों अख़बारों में यह मौत सुर्खियों में रही थी।

आत्महत्या की इन ख़बरों को हत्या कहना ज्यादा सही होगा। आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी किसी ख़बर या घटना पर देश के पुरूस्कृत लेखक बुद्धिजीवियों, कलाकारों ने कभी कोई प्रतिक्रिया न दी, न देंगे। इससे ज्यादा संवेदनशील मुद्दा क्या हो सकता है जब नन्हें मुन्ने कुछ आरोपित सपनों को पूरा न कर पाने की हताशा में मां-बाप, समाज, दोस्तों की टेड़ी, व्यंग्य नज़रों से भयभीत अपनी ही जान दे देते हैं।  बरसों से यह हो रहा है। मगर इस साल तो अति ही हो गयी है। अभी तक अकेले कोटा  “शहर में दो दर्जन आत्महत्याओं के मामले रिपोर्ट किये जा चुके हैं। मान कर चलिये कि इससे कई गुना ज्यादा होंगे।  दूसरे  “शहरों” में भी और जिन्हें लोकलाज से छिपाया भी जाता रहता है।

यहां पसरी चुप्पी बताती है कि हम सब इन आत्महत्याओं के दोशी हैं। उन्हें उकसाते हैं। पहले व्यवस्था तंत्र का अपराध। दुनिया के सामने हमारे सारे बड़बोले राजनेता इस बात पर तो इतराते हैं कि दुनिया की सबसे नौजवान आबादी भारत में है लेकिन क्या इन नौजवानों के सपनों को कोई जगह व्यवस्था दे पा रही है? न पढ़ने के लिए पर्याप्त मेडिकल कॉलेज, न अच्छे इंजीनियरिंग या दूसरे  “शोध संस्थान”। आई.आई.टी. जैसे संस्थान कुछ ब्रॉड बन गये हैं लेकिन चैदह लाख परीक्षा देने वाले और सीट मात्र दस हजार। वह भी पिछले कुछ वर्शों में बढ़ी है। फिर “शेष कहॉं जायेंगे? दुनिया की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा। बचे हुए कॉलिजों में फीस तो पूरी मगर न शिक्षक न कोई पढ़ने की सुविधा। क्यों राज्य दर राज्य सरकारें इतनी नाकारा बन चुकी हैं जो इन कॉलिजों को ठीक नहीं कर सकती, स्कूल तक नहीं चला सकती। क्यों कोटा की इन आत्महत्याओं में नब्बे प्रतिशत, विहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिन्दी भाषी राज्यों से ही हैं? दूसरा दबाव या अपराध मॉं-बाप का। जब इंजीनियरिंग की डिग्री में पूछ सिर्फ आई.आई.टी., एन.आई.टी. की बची है तो बच्चे के कानों पर स्कूल के दिनों से ही गूंजने लगते हैं ये “शब्द। मॉं-बाप परिवार की ख्वाहिशें। बेटा तू आई.आई.टी. करके दिखा दे। मैं परसाद बॉंटूंगी। तीर्थ जाउंगी, छट मइया को दान करूंगी।’ बच्चा इन सपनों के साथ बड़ा तो होता है, लेकिन गॉंव, देहात के जिन स्कूलों में पढ़ रहा है वहॉ की व्यवस्था पूरी चरमरा रही है। सुपर थ्रर्टी जैसी जुमलीबाजी ने भी कम नुकसान नहीं किया है। बाकी तीस लाख या करोड़ों बच्चों की स्कूली, कॉलेज की शिक्षा तो हमने बरबादी के लिये छोड़ दी। ये सब भागते हैं। कोटा, दिल्ली, जयपुर जैसे “शहरों की तरफ। कुछ ज़मीन बेचकर फीस देते तो कई सरकारी कर्मचारी लोन लेकर या बेईमानी करके भी। कोचिंग की फीस भी इतनी ज्यादा है और उपर से रहना, खाना, किताबें। सपनों और सुविधाओं का इतना बोझ!

इन सपनों, महत्वाकांक्षाओं, गर्वीले भविष्य से धकेले जाते ये बच्चे पहुंच तो गये कोटा जैसे कोचिंग संस्थानों में लेकिन क्या उस माहौल में रातों-रात फिट हो जाना इतना आसान है? ये मानवीय आत्माएं हैं निर्जीव रोवोट नहीं। न मॉं-बाप, भाई-बहन का प्यार दुलार, न खाने पीने की सुविधाएं उपर से रोज-रोज के क्लास टैस्ट जो अस्पताल में भर्ती मरीज की तरह सर्वाजनिक रूप से बताते हैं कि तुम कितने पिछड़ रहे हो। हर कोशिश के बावजूद हजारों बच्चे हताश, निराश, एकाकीपन के कुएं की तरफ बढ़ते जाते हैं। कुछ बाबा की बूटी जैसे नशीली ड्रग्स के चंगुल में तो कुछ कम्प्यूटर, वीडियो गेम्स की गिरफ्त में। कुछ इससे भी दस कदम आगे। चोरी, फिरौती के कारनामों में भी “शामिल। एक अनुमान के अनुसार मेडिकल, इंजीनियरों की कोचिंग ले रहे लगभग बीस प्रतिशत बच्चे पढ़ाई से हटकर इन व्यसनों की गिरफ्त में आ जाते हैं। दिन-रात वही गणित, भौतिक, रसायन के फार्मूले रटते रटते मानसिक रोगी भी कई बच्चे हो चुके हैं। यहॉं शिक्षा विद प्रोफेसर यशपाल की वर्ष 1992 की रिपोर्ट की बातें याद आती हैं। ‘‘जो बच्चे नहीं चुने जा पाते वे तो पूरी उम्र के लिए कुठित होते ही हैं, चुने जाने वाले भी इस रटंत पद्वति के चलते बहुत अच्छा नहीं कर पाते।

ऐसे घने अंधकार में बच्चे ऐसे कदम उठा रहे हैं जो किसी भी सभ्य-समाज की आत्मा को हिला सकता है। इन बढ़ती आत्म हत्याओं की “शुरुआत की ख़बरें इस वर्श के “शुरू से ही आ रही हैं। यूपी कोटा के जिलाधिकारी ने कोचिंग संस्थानों को मनोचिकित्सक खेल, मनोरंजन आदि सुविधाओं के लिये निर्देश जारी किये हैं लेकिन ये गर्म तवे पर पानी की छीटे से ज्यादा कुछ नहीं है। इसका हल तो पूरी षिक्षा व्यवस्था में ढूँढना होगा और तुरंत।

आई.आई.टी. की परीक्षा में पिछले दस बरस में दसियों बार बीसियों परिवर्तन तावड़तोड़ किये गये हैं। कभी दो चरण कभी तीन, कभी आब्जेक्टिब पर जोर तो कभी 12वीं के नम्बरों पर। शिक्षा व्यवस्था में जितने, डॉक्टर उतनी तरह की दवाईयॉं, ऑपरेशन, सर्ज़री। मंत्री या तो वे हैं जो हॉवर्ड और कैम्ब्रिज में पढ़े हैं या वे जो जाति, धर्म के आंकड़ों को ही बांच सकते हैं। आष्चर्य है कि ये दोनों ही पक्ष चुप्पी साधे हैं। नतीजा-न कोचिंग कम हुई न दूर-दूर के गॉंवों, कस्बों से कोचिंग के मक्का-मदीना की तरफ बढ़ता पलायन। बड़ती आत्महत्याएं की षिक्षा के इन नियंताओं के चेहरे पर फिर भी कोई शिकन तक नहीं। क्योंकि इससे वोटों की फसल पर कोई असर नहीं होगा। गनीमत है कि इन्होंने इन आत्महत्याओं में जाति और धर्म की गिनती नहीं की। इससे भी बुरा पक्ष है देश के इन “शीर्ष संस्थानों में पहुंचने वाले छात्रों की प्रतिभा पर प्रष्न चिन्ह। न भाशा पर अधिकार न समाज के प्रति कोई संवेदनशीलता। मानों हम मनुश्य नहीं, तीसरी श्रेणी के रोबोट बनाने रहे हों। इंजीनियर, डॉक्टर बनने की इस नकली होड़ ने समाजविज्ञान के अध्ययन पर भी विपरीत असर डाला है। दुनिया भर से मिल रही रिपोर्ट बता रही है कि ये “शीर्ष संस्थान लगातार पिछड़ रहे हैं। कुछ वर्श पहले एक वैज्ञानिक पत्रकार का कहना था कि आखिर क्या कारण है कि इन “शीर्ष संस्थानों में पढ़ रहे बच्चों में कल्पनाशीलता, अंवेशण और रचनात्मकता, निरंतर ह्रास पर है। पिछले वर्श आई.आई.टी. रूडकी में पहले ही वर्ष में सत्तर छात्रों का फेल होना क्या बताता है? अंगे्रज़ी का कहर तो है ही रंटत षिक्षा की सीमाएं भी साफ हैं। फिर भी इनमें पहुंचने की उतावली या हताषा में आत्महत्यांएँ?

क्या यह बात सिर्फ कोटा की आत्महत्याओं तक ही सीमित मान ली जाये? क्या इसकी जड़े मुज्जफरपुर, सीवान, मुरादाबाद, खुर्जा के उन स्कूलों तक नहीं फैली हुई जहॉं प्राइमरी से लेकर कॉलेज तक भी पूरी शिक्षा चैपट हो चुकी है। लेकिन मॉं-बाप, बड़ों को मीडिया, बाज़ार दिखाता है आई.आई.टी. से निकले छात्रों को मिलने वाले करोड़ों के पैकेज। बस वे धकेलने लगते हैं अपने नौनिहालों को आत्महत्या की डगर पर।

यों आत्महत्याऐं जापान जैसे अमीर मुल्कों में भी कम नहीं है लेकिन असफलता की दुश्चिंता में इस उम्र के सैकड़ों छात्रों का उदाहरण अकेले भारत में ही है। कम से कम हिन्दी पट्टी में नौकरी न मिलने या दाखिला न होने के अवशाद में बहुत कच्ची उम्र में ही यह प्रवृत्ति बढ़ रही है।

वक्त आ गया है जब केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें शिक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर शिक्षा के इस पूरे ढांचे पर ही विचार करें। पहले टुकड़े-टुकड़ों में बॉंटकर और फिर वाहवाही और वोट बैंक की राजनीति  बहुत दूर तक नहीं ले जायेगी। न राजनेताओं को, न देश को। क्या शिक्षा में अलग-अलग जातियॉं, उपजातियों के कोटा से कहीं पहुंचे? दिल्ली के निजी स्कूलों में आर्थिक सामाजिक पिछड़ों को उसी वोट बैंक के अंदाज में कोटा बॉंटने के बजाए सभी सरकारी स्कूलों को और बेहतर किया जाता, उनकी संख्या बढ़ायी जाती तो भ्रष्टाचार, जातिवाद की बीमारियों पर भी लगाम लगती। स्कूल की दीवारों पर तो लिखा है ईश्वर के बनाये सभी मनुश्य बराबर हैं, जातिवाद एक कोढ़ है, लेकिन जब 7 वर्षीय बच्चा पहले दिन ही स्कूल से लौटकर मॉं-बाप से यह प्रश्न पूछता है कि हम गूर्जर हैं या ब्राह्मण? बताओ? तो हम किस देष के लिये विभाजन के लिये ये बीज बो रहे हैं। सकारात्मक कदम दूसरे देशों ने भी उठाये हैं लेकिन ऐसे विभाजनकारी, असमान कदमों का प्रयोग नवजात पीढ़ी पर किसी ने नहीं किया।

तंत्र और समाज सभी को यह समझना होगा कि हर बच्चे की प्रतिभा अलग होती है। सिर्फ आई.आई.टी. या मेडिकल में चुने जाने वाले ही सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं। जो नहीं चुने गये या जो इनके भी हजारों पायदान नीचे हैं वे भी उतने ही मेधावी है। आज समाज को उनकी भी उतनी ही जरूरत है। इजीनियरिंग के ही आकंडे सामने रखे तो नयी स्टार्ट-अप और दूसरी नौकरियों में बेहतर करने वालों में आई.आई.टी. या दूसरे कॉलेजों में कोई विशेष अंतर नहीं है। और भी बड़ी बात कि जिन्होंने आई.आई.एम. से मैनेजमेंट की पढ़ाई नहीं की है वे उतने ही सफल व्यावसायिक प्रबंधक हैं जितने कि लाखों की फीस देकर यहॉं पढ़े। जीवन की शिक्षा जिसमें मेहनत, संघर्श निश्ठा ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, सफलता की कुंजी है। चुनौती यह है कि इसे हमारी शिक्षा व्यवस्था में कैसे समाहित किया जाये।

 

प्रतिस्पर्धा कोई बुरी बात नहीं है लेकिन षिक्षा व्यवस्था में वे बुनियादी परिवर्तन लाने होंगे जो बच्चों को इतना मजबूत बनायें कि जीवन में किसी एक-दो परीक्षाओं में पास-फेल होना कोई माने नहीं रखता। डार्विन, आईस्टाइन से लेकर अमिताभ बच्चन, पे्रमचंद, मंटो की वे जीवनियॉं पढ़ाई जायें जिससे ये जान सके कि स्कूल या प्रतियोगिता में कुछ नम्बरों के कम-ज्यादा होने से खास फर्क नहीं पड़ता। और बच्चों से ज्यादा जरूरी है उनके मॉं-बाप, स्कूल के टीचरों की मानसिकता को बदलना कि तुम अपने नकली सपनों की खातिर क्यों इन लाड़लों की कुर्बानी देने पर तुले हुए हो। माना यह सब करना इतना आसान नहीं है लेकिन अगली पीढ़ियों की खातिर यह करना ही पड़ेगा।

दुनिया भर के शिक्षाविद नीलवाग, गीजूभाई, रवीन्द्र नाथ टैगोर, गॉंधी, जॉन होल्ट उस षिक्षा के हिमायती रहे हैं जहॉं बच्चा मस्ती से पढ़े स्कूल आये न कि स्कूल और इन कोचिंग संस्थानों की कैद में हताश हो। यूरोप, अमेरिका के देशों, समाज ने शिक्षा व्यवस्था की इस चूहा दौड़ से बचने के लिये ठोस कदम उठाये हैं और इसका फायदा पूरे समाज को मिल रहा है। लेकिन हमारे यहॉं तो सामाजिक न्याय और विकास के नाम पर वे बातें जारी हैं जिन पर पंद्रहवीं सदी भी “शरमा जाए। हमारे पूर्वजों ने 21वीं सदी में शिक्षा में ऐसे अंधेरे की कल्पना नहीं की होगी।

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