आओ पत्रिका निकालें

वह छुट्टी का एक सामान्य दिन था । मेज पर चाय । मैं और कथाकार पंकज बिष्ट देश, दुनिया की चिंता में पतले हुए जा रहे थे । तभी वह हाजिर हुआ । बैठने से पहले ही उस पच्चीस वर्षीय युवक ने अपनी मंशा बता दी । ‘हम एक पत्रिका के बारे में आपसे मिलने आये हैं । पत्रिका कैसे निकाली जाए ? कितने पृष्ठ की होनी चाहिये ? उसे छपवाएंगे कहाँ ? बिकेगी कैसे ? नाम कौन सा अच्छा रहेगा आदि-आदि—- । शायद इससे पहले कभी ऐसे उत्साही सज्जन से पाला नही पड़ा था जो लगभग ‘दो मिनट में मैगी या पिज्जा तैयार’ के अंदाज में पत्रिका निकालना चाहता था । उसके प्रश्नों का भोलापन मूर्खता की परिधियों को छू रहा था ।

बिल्कुल इंटरव्यू लेने के अंदाज में आया था वह नौजवान लेकिन खुद दो लोगों के बीच में धंस गया । ‘आपकी अब तक की यात्रा क्या रही है मसलन पढ़ाई, और क्या-क्या किया ? पात्रिका कौन सी पढ़ते हो ? ‘ उसके चेहरे पर पलपल आ जा रहे भावों से स्पष्ट था उसे बताने में बड़ा कष्ट हो रहा है । उसने अटक-अटक कर बताया । ‘बनारस में जे.पी. यूनिवर्सिटी से बी.एस.सी. किया । फिर कम्पटीशन दिये । स्टॉफ सलेक्शन कमीशन, बैंक और बहुत सी जगह । लेकिन मैं देना नहीं चाहता था । घरवालों ने मजबूर किया ।’ ‘क्यों ? फिर आप क्या करना चाहते थे या हो ?’ ‘बस समाज सेवा ।’ लेकिन समाज सेवा में आपको पत्रिका निकालना ही क्यों आया जबकि आप पत्रिकाएं पढ़ते ही नहीं हैं ।’ टाइम नहीं मिलता ।’

लगा नौजवान को किसी ने फियादीन योजना के तहत भेजा है । बोला ‘ अच्छा आप कितने पैसे लेंगे संपादक बनने के और कितने दिन तक लेंगे । ‘ हमने कहा हम तो चाहते हैं पूरी उम्र देते रहे लेकिन आपके पास पैसे आयेंगे कहाँ से ? क्या आपका कोई व्यवसाय है ? बालक मुस्कराने लगा, ‘एक मुख्यमंत्री ने कहा है कि पत्रिका को विज्ञापन मिल जायेगा ।’ उसने अपनी बात फिर आगे बढ़ायी, ‘और लेखक कैसे मिलते हैं ? उनके पते हैं आपके पास ? क्या उनको भी पैसे देने पड़ते हैं ?’

याद आया दिल्ली से निकलने वाली ‘इंडिया’ नाम को समाहित एक पाक्षिक पत्रिका दो-तीन वर्ष से किसी भी लेखक को बिना एक कौड़ी दिये चल रही है । ऐसा नहीं कि उसके मालिक के पास पैसा नहीं है । पैसों के बूते पर तो उसने आज के समाज पर दैनिक अखबार के साथ-साथ चैनल भी शुरू कर दिया है लेकिन सत्ता के करीबी संपादकों ने शायद उसे सलाह दी है कि हिन्दी लेखक तो सिर्फ नाम की खातिर भी लिखने के परोपकार में शामिल हो जायेगा । फोटो छाप दो तो उल्टा पैसे भी दे दे । यदि ऐसा न होता तो जिस राजधानी में मजदूरों के लिये न्यूनतम मजदूरी का प्रावधान हो वहाँ अखबार, पत्रिकाओं का इतना बड़ा प्रतिष्ठान लेखकों को पैसा न देकर भी मीडिया की खबर से क्यों बच पा रहा है ।

उसे ‘वीर बालक’ कहना ज्यादा उचित होगा । बालक तो चला गया लेकिन मेरी फेंटसी में कई ‘प्रसिध्द वीर बालको’ के बचपन तैर रहे हैं । रील-दर-रील । इस पौध ने किसी भी किस्म के श्रम से परहेज करना छोड दिया है । लिखने पढ़ने का भी कौन करे । सीधे पत्रिका के मालिक बनो । राज्य सरकारों से सीधे पैसा लो । उनके फोटो छापो या कुछ सनसनी खबरें । कभी पैसा लेकर तो कभी न छापने की धमकी से वसूलकर । पिछले हफ्ते ही एक खबर थी कि मेरठ के दो टी.वी. पत्रकारों पर आरोप था कि वे किसी खबर की धमकी के संदर्भ में वहाँ के पार्षद से दो लाख मांग रहे थे । कभी इस बात की जांच होनी चाहिये कि उत्तर प्रदेश, बिहार के सैंकडों सरकारी निगमों से कितना पैसा पी.आर. के नाम पर इन जेबी अखबारों, पत्रिकाओं को मिला । अकर्मन्यता के साथ-साथ पिछले दरवाजे से संस्कृति, साहित्य के नाम पर जनता के पैसे की निकासी भी इन संस्थानों के बंद होने का कारण बनी । रोजी रोटी गयी तो उन मजदूरों की जो यहाँ काम करते थे और इनके बंद होने पर बेरोजगार हो गये । याद होगा कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद बिहार के इन सार्वजनिक निगमों को मजदूरी का बकाया भुगतान करना पडा था । लेकिन दिल्ली में बैठे कई संपादक साल में दो-चार पेजी पत्रिका के एकाध अंक निकाल कर मजे में गाड़ियों में घूम रहे हैं । सरकारों का भी क्या जाता है करोड़ों के बजट में एकाध करोड़ इस मद में देकर । इससे कामॅनवेल्थ खेल, कार्बाइड, शिक्षा, यमुना सभी मुद्दों पर इनका मुंह बंद तो भी रहे । थोड़ा बहुत बोलते भी हैं तो बोलने दो इससे लोकतंत्र की लाज बची रहती है और इनका गुस्सा ठंडा । दौलत बड़े बड़ों की रीढ़ को लचकदार बना देती है ।

क्या संपादक या बड़े पत्रकार बनने को लालायित इन नौजवानों का ही सारा दोष है ? वर्षों से संघर्षरत एक अनियतिकालीन पत्रिका के संपादक ने बताया कि जब अखबार, पत्रिका में लेख छपने के बाद साल-दो-साल तक भी उसका भुगतान न करें तो विकल्प क्या बचता है । कई बार तो ऐसा भी हुआ कि लेख किसी का और भुगतान कोई और ले गया । ऐसे ही एक विज्ञापन खाऊ पत्रिका का काम देख रहे शोध छात्र ने बताया कि हिन्‍दी की बजाये अंग्रेजी नाम रखने पर बड़े-बड़े व्यासायिक घराने सत्ता के करीब पहुंचने के लालच में लाखों का विज्ञापन देते हैं ये पत्रिकाएं छापते भी बहुत चिकने चुपड़े कागज और पूरे ग्लेमर के साथ हैं । इन कामों पर कोई कोताही नहीं लेकिन लेखक को कुछ भी देना उन्हें भी अच्छा नहीं लगता । इसी का दुष्परिणाम है कि हिन्‍दी पत्रकारिता पेडन्यूज से लेकर कई तरह के गोरखधंधों में फँसती जा रही है । हिन्‍दी पत्रकार को ऐसे मुफ्त में लेने का असर पूरी पत्रकारिता पर पड़ा है । जब कुछ मिलता ही नहीं है तो कौन मेहनत करे, तथ्य इकट्ठा करने में, उसके निर्पेक्ष विश्लेषण करने में । और क्यों वह साहस जुटाये के भ्रष्ट तंत्र को बेनकाब करने में ? उसे मिलेगा क्या ? मालिक की झिड़की या हो सकता है मालिक के समीकरणों में फिट न बैठने पर उसकी स्टोरी छपे ही नहीं ।

कुछ और प्रश्न – जैसे नौकरशाही लाख बुराईयों की जड़ होते हुए भी तंत्र को चलाने के लिये जरूरी हैं; जैसे लोकतंत्र लाख बुरा होने के बावजूद भी उसका कोई मौजूदा बेहतर विकल्प नहीं है; वैसे ही पत्रिकाओं के नकारात्मक पक्ष के बावजूद वे समाज संस्कृति की ताजा रक्त वाहिनियां हैं इसलिये इनका निकलना या निकाला जाना बहुत जरूरी है । बस खटकने वाली बात है इनकी बेहद घटती प्रसार संख्या । पचास-साठ करोड़ की हिन्‍दी आबादी में किताबें भी घटकर पांच सौ तक आ गयी हैं तो विज्ञापन के लिये निकाली जाने वाली नब्बे प्रतिशत पत्रिकाएं भी इतनी ही छप रही हैं । इनका कोई बिक्री केन्द्र भी नहीं है । अखबार, नुक्क्ड़ पत्रिका बेचने वाले जितने उत्साह से ज्योतिष या अंग्रेजी की कचरा, रंगीन, ग्लेमरस पत्रिकाएं रखते हैं हिन्‍दी की इन पत्रिकाओं को देखकर ही बिदकते हैं । जबरदस्ती रख भी दो तो वे सबसे अंधेरे कोने में रख दी जाती हैं । अब आम पाठक लेना भी चाहे तो कहाँ से ले । बी.बी.सी. के पत्रकार मार्कतुली ने दिल्ली में हिन्‍दी की किताब या पत्रिका के कहीं न मिलने पर क्षोभ व्यक्त करते हुए टिप्पणी की थी कि हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली के पॉश इलाकों में भी हिन्‍दी की किताब ढूढ़े नहीं मिलती और यह भी जड़ा था कि भारतीयों के शेक्सपीयर से लेकर मिल्टन के अंग्रेजी ज्ञान के सामने इंग्लैंड वाले भी कहीं नहीं ठहरते ।

तो इन पत्रिकाओं को ज्यादातर चार दोस्तों को भेजकर ही पत्रिका निकालने का लक्ष्य पूरा कर लिया जाता है । कई बार तो दूसरी पत्रिकाओं में जिस भी लेखक का पता मिल जाये वही इन पत्रिकाओं का शिकार हो जाता है । अब लेख या पाठक पढ़े भी तो कितना । वैसे भी दिल्ली की ज्यादातर गोष्ठियां गवाह हैं कि उपस्थित श्रोताओं की औसत आयु साठ वर्ष जल्दी ही पहुंच जायेगी । यानि सठियाए हुए बुढ़ापे की ओर बढ़ता यह पाठक आखिर ‘दो ऑंखों ‘ से कितना पढ़ेगा ? कभी-कभी तो एक पत्रिका को कामकाजी लेखक-पाठक औसतन दस-पन्द्रह मिनट भी नहीं दे पाता । ऊपर से दिल्ली के छोटे घरों में इन्हें संभालकर रखने की भी जगह नहीं बची । मैंने गाँव के एक स्कूल, पुस्तकालय में पुराने ‘हंस’, ‘कथादेश’ और दूसरी पत्रिकाओं के दस-बीस वर्ष से संचित बंडल उत्साह से भिजवाये लेकिन जल्दी ही पता चला कि उन्हें पढ़ने में कम से कम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नयी पीढ़ी की कोई रुचि नहीं है । उन्हें चाहिये अंग्रेजी ठीक करने की किताबें, पत्रिकाएं या इम्तिहान पास करने की कुंजी । उत्तर प्रदेश का अध्यापक किस्म का प्राणी तो इन सबसे और दूर रहने की कोशिश करता है । उसे इन राज्यों की रोज-रोज की राजनीति भी पढ़ने-लिखने तक नहीं पहुंचने देती ।

तो आखिर डूबती हिन्दी के डूबते प्रदेशों में ये पत्रिकाएं आखिर निकल क्यों रही हैं ? सिर्फ विज्ञापन के लिये ? या छोटी-मोटी संपादकीय ‘सत्ता’ की तलाश में ।

‘इंडियन ओपीनियन’, ‘यंग इंडिया’, ‘हरिजन’- गांधी ने कई अखबार, पत्रिकाएं निकाली लेकिन इस बात का पूरा ख्याल रखा कि उसे विज्ञापन के बहाने पूंजीपति या दूसरे स्वार्थी तत्व अपने रास्ते से न भटका दें । कम साधनों में घाटा उठाकर भी कभी किसी सेठ या सत्ता के आगे घुटने नहीं टेके । प्रेमचंद, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसों से पत्रकारिता की आड़ में विज्ञापनों के लिये हॉफती पीढ़ी सबक ले सकती है । सरकार के पैसे को हड़पना या उस पर हक जताना इनमें कई जनता के पैसे का सही इस्तेमाल मानते हैं । उसमें विचार भले ही ज्यादातर चीन और दूसरे देशों की शह पर हों ।

कुछ-कुछ इन्हीं की ओर इशारा करते हुए कथाकार काशीनाथ सिंह ने ‘काशी का अस्सी’ में लिखा है- ‘तीसरी नस्ल और भी जालिम है- पत्रकारों की । मालिकों को गरियाते हैं, लेकिन छापते वही हैं जो वह चाहता है । ये धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन खबरें धर्मोन्माद की छापते हैं । दंगा, हत्या, लूटपाट, बलात्कार के शानदार अवसरों पर इनके चेहरे की चमक देखते ही बनती है ।’

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