आई.आई.सी.में हिन्‍दी

मुहम्‍मद इकबाल फारसी उर्दू की मशहूर हस्‍ती रहे हैं । इतिहास में उनका नाम ‘पाकिस्‍तान’ शब्‍द के साथ भी जोड़ा जाता है । फारसी में लिखी उनकी मशहूर किताब ‘जावेदनामा’ हाल ही में हिन्‍दी में आयी है । बहुत अच्‍छा अनुवाद किया है मोहम्‍मद शीश खान ने । उन्‍होंने इंडिया इन्‍टरनेशनल सेन्‍टर दिल्‍ली के अहाते, लाइब्रेरी में वर्षों से अपना दिन काटने वाले बुद्धिजीवी मित्र से अनुरोध मिली याचना की कि आप ‘जावेदनामा’ की आई.आई.सी. की लाइब्रेरी में मंगा ले तो कुछ ‘ऊँचे लोग’ भी पढ़ पायेगे । मित्र ने किताब उलट पुलट कर देखी और ईमानदारी से बोले ‘इंडिया इन्‍टरनेशनल सेन्‍टर में हिन्‍दी की किताबें नहीं आतीं । न खरीदी जाती । इक्‍का-दुक्‍का कोई हो, तो हो ।’ यह हम सबके लिए हैरानी की बात थी ।

 

ि‍फर से याद दिला दें कि आई. आई. सी. दिल्‍ली में है और हिन्‍दी क्षेत्र में आता   है । संविधान में उल्लिखित राजभाषा की धाराओं का सहारा न भी लिया जाये तब भी वहॉं जाने वालों में अधिकांश हिन्‍दी जानते हैं । सदस्‍य भी, श्रोता भी और कर्मचारी भी । हिन्‍दी के कई जाने माने नौकरशाह, राजनेता, चित्रकारों के साथ-साथ साहित्‍यकार, कवियों का तो दशकों से अब यही घर, आंगन बन चुका है । कौन गरीब जनता, उनके फटीचर लेखकों के बीच जिंदगी खराब करता रहे, जिंदगी में कभी तो ‘क्रीमीलेयर’ के ठाठ मिलेंगे । पहले गोष्ठियाँ, सादतपुर, कृष्‍णनगर, मॉडल टाउन, विश्‍वविद्यालय, राजस्‍थान सूचना केन्‍द्र, मंडी हाउस कहीं भी हो जाती थीं । अब कुछ ‘स्‍तरीय’ गोष्ठियॉं केवल आई. आई. सी. के भीतरी, बाहरी, टेरेस पर ही होती हैं । इनमें से ज्‍यादातार वे हैं जो ‘शाइनिंग इंडिया’ से नफरत करते हैं और जनवाद की छतरी के नीचे खड़े हैं । अफसोस कि इन्‍होंने कभी यह झांककर भी नहीं देखा कि पुस्‍तकालय इतना हिन्‍दी विरोधी क्‍यों हैं कि वहॉं न प्रेमचंद है, न निराला, न अज्ञेय, न दूसरे बड़े लेखक ।

 

कुतर्क हो सकता है कि यदि हम भारतीय भाषाओं की किताबें रखने लगें तो जगह ही नहीं रहेगी । इसका पहला जवाब तो यह है कि प्रमुख भारतीय भाषाओं की क्‍लासिक, चुनिंदा, सर्वश्रेष्‍ठ किताबों के लिये जगह निकालनी ही चाहिये क्‍योंकि दिल्‍ली के इस अड्डे पर सभी भाषाओं के दिग्‍गज मनीषी आते हैं । और यदि जगह की इतनी ही कमी है तो भी कम से कम हिन्‍दी क्षेत्र में होने के कारण और आधे से ज्‍यादा देश की भाषा होने के कारण हिन्‍दी के लिेसे तो कुछ रास्‍ता देना ही होगा । कई बार मूर्धन्‍य देशी-विदेशी विद्वानों की भी तो ललक हो सकती है प्रांतीय भाषाओं का लिखा जानने की । कुछ तो राष्‍ट्रीय स्‍वाभिमान होता है इन संस्‍थाओं का ।

 

दिल्‍ली में इधर उगे किसी भी प्रबंधन संस्‍थान, टेरी जैसे डीम्‍ड विश्‍वविद्यालय में जाइये, चमचमाते पुस्‍तकालयों में एक भी पुस्‍तक, पत्रिका हिन्‍दी की नहीं मिलेगी । हिन्‍दी का अखबार तक नहीं । मैकाले की आत्‍मा कितनी प्रसन्‍न होती होगी कि उन्‍होंने तो समस्‍त भारतीय भाषाओं के ज्ञान, साहित्‍य को एक आलमारी भर भी मुश्किल से माना था, दो सौ वषों के बाद यहॉं तो अब भारतीय भाषाओं की एक आलमारी भी नहीं है । दुनिया के पन्‍द्रह अब्‍बल बिजनेस स्‍कूलों में सुमार की अकड़ लिये हैदराबाद के इंडियन स्‍कूल ऑफ बिजनेस की कई मंजिला भव्‍य लाइब्रेरी तक में न हिन्‍दी की कोई किताब थी, न तेलगू की । क्‍या सारा ज्ञान सिर्फ अंग्रेजी भाषा में ही होता है ? न केवल भाषा, अंग्रेजी की इन पुस्‍तकों में जो ‘केसस्‍टडी’ होती हैं  वे दुनिया के हर देश और उनकी समस्‍याओं की होगी, अपने देश की नहीं । देश मेरा, जमीन मेरी, पढ़ने वाले मेरे देश के बच्‍चे लेकिन विमर्श सब कुछ  विदेशी, उन्‍हीं की भाषा में । इसीलिये हर समस्‍या के समाधान डालरों के बदले विदेशों से आयात किये जाते हैं – वाया ज्ञान और ज्ञान आयोग के । कहॉं गयी स्‍वराज्‍य, स्‍वदेश, स्‍वालंबन की बातें और भाषा के नाम पर हर साल दौरा करने वाली और होटलों में ठहरने वाली संवैधानिक समितियॉ और उनके नामधारी   सदस्‍य । इन संस्‍थाओं में पढ़ने वालों का दोष नहीं है, दोष उन संवैधानिक संस्‍थाओं को चलाने, बनाने वालों और देश और समाज का है ।

 

पिछले दिनों खांटी देशजता के दावेदार मंत्री, राजनेता भी बाबुओं के इस क्‍लब में शामिल होने की कोशिश और खुशामद करते रहे हैं । सभी की नजरों में कुछ तो है ही वहॉ। जब हमारे बुद्धिजीवी, साहित्‍यकारों को ही हिन्‍दी की किताबें देखने की तमन्‍ना वहॉं नहीं हुई तो राजनेताओं से तो उम्‍मीद ही करनी बेकार है । हॉं ये सब मिलकर न्‍यूयार्क में, लंदन में जरूर हिन्‍दी की किताबें, पत्रिकाएं ले जाते रहे हैं । लगता है देश को दूसरे लोहिया, गांधी की सख्‍त जरूरत है ।

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