अंग्रेजी बोलते भांड

ऐसा कभी नहीं हुआ कि टी.वी. पर मुंबइया फिल्‍मों के नायक-नायिका कहे जाने वाले किसी भांड को अंग्रेजी में कंधे-बाजू मटकाते देखकर मेरा बी.पी. वही रह पाया हो । थर्ड से थर्ड ग्रेड हिन्‍दी फिल्‍मों या चालू टी.वी. सीरियल तक में काम करनेवाले इन नवजातों तक से जैसे ही कोई प्रश्‍न पूछा जाता है, वे तुरंत अपना बैंड बदलते हुए सहज हिन्‍दी में पूछे गए प्रश्‍न का जवाब अंग्रेजी में मिमियाने लगते हैं-‘यू नो आई एम वैरी पजैसिव…. ही इज वैरी इंटेलिजेंट।‘ कई बार न वाक्‍य सही होता है, न भाव । क्‍या यह भाषा उनकी उसी बुनावट और बनावट का हिस्‍सा है जो कुछ भी हो सकती है, बस सच नहीं ? कला की पहली शर्त ईमानदारी होती है । तो क्‍या ये कला के पास तक जाने में डरते हैं ? अफसोस की बात यह कि इनमें से अधिकांश हिन्‍दी-पट्टी के हैं । हिन्‍दी की सी-ग्रेड फिल्‍मों के डॉयलाग ये परदे पर ही नहीं, रोजाना की जिंदगी में भी बोलते हैं ।

शुद्ध नफासत की हिन्‍दी लिखना तो एक बार थोड़ा मुश्‍किल हो सकता है जिसकी आड़ में सरकारी बाबू अंग्रेजी के पच्‍चीस वाक्‍यों से देश पर पिछले पचास साल से ज्‍यादा से रौब मार रहे हैं । लेकिन अपनी भाषा बोलना तो हर मनुष्‍य का हक है । उसका पढ़ा होना या न होना भी यहां अप्रासांगिक है । यहां पब्‍लिसिटी के इसी बैक्‍टिरिया के काटे क्रिकेट का बल्‍ला पकड़े अन्‍य खिलाड़ी-मानो वे मानचेस्‍टर या लंकाशायर में बी.बी.सी. के सामने बोल रहे हों । यह पब्‍लिसिटी का आतंक है या महानता की तरफ कदम रखने का नशा या स्‍वयं को जनता से श्रेष्‍ठ मानने की गरज़, जो उन्‍हें वह नहीं रहने देती जो वे वास्‍तविक हैं ? मेरी भतीजे से बात हो रही थी । मैंने देखा कि बोलते-बोलते वह भी अनावश्‍यक अंग्रेजी में शुरू होना चाह रहा है । मैंने फिर हिन्‍दी में ही बात बढ़ाई । आखिर ये बच्‍चे भी कैसे बचे रहेंगे अपने इन नायकों के प्रभाव से ?

जैसे-जैसे रेल की यात्रा में मेरा कद बढ़ रहा है, वैसे-वैसे मेरा संताप भी । इनमें सफर करने वाले जितने दुखी, तनावग्रस्‍त, जड़ों से कटे, आत्‍मलीन, सुविधाओं के माने हैं, उससे भी ज्‍यादा अंग्रेजी के मारे । मुम्‍बई-मार्ग पर मथुरा से दो सज्‍जन और आप । परिचय के लिए तो अंग्रेजी में शुरुआत ठीक है इस बहुभाषी देश में । आप पता नहीं किस कोने से हों । मैं बातचीत सुन रहा हूं । एक दादरी में नियुक्‍त है एन.टी.पी.सी. में । दूसरे की कोई फैक्‍टरी आदि है नोएडा में-शत-प्रतिशत हिन्‍दी-क्षेत्र, लेकिन हिन्‍दी पर नहीं उतरेंगे । अखबार, पत्रिकाओं का सारा कचरा भी अंग्रेजी का है । वैसे अधिकांशत: पूरी यात्रा में कुछ तस्‍वीरों के अलावा ये इनको खोलकर नहीं पढ़ते । ये सिर्फ रौब मारने, आतंक पैदा करने के लिए रखी जाती हैं । ज्‍यादातर फिल्‍मी या अपराध की बाजारू पत्रिकाएं या अंग्रेजी नॉवल्‍स के गुटके ? पता नहीं ज्‍यादातर उत्‍तर भारतीयों को अंग्रेजी न बोल पाने में इतनी शर्म क्‍यूं होती है ? मराठी, बांग्‍ला के न बोल पाने पर तो नहीं । और कि हिन्‍दी न बोल पाने पर तो वह खुद को साहब ही समझने लगता है ।

थोड़ी देर पहले एक महिला यात्री थीं । पचपन से कम तो क्‍या होंगी ? हो गई शुरू अंग्रेजी में । शिकायत-दर-शिकायत । बैयरों की, सफाई की, खान-पान की । दनादन भकसते हुए । जो भी आया, तुरंत साफ । फिर भी आदेश-दर-आदेश । और फिर-फिर लौटकर अंग्रेजी में । मैं हर बात का जवाब हिन्‍दी में दे रहा था । मैंने उन्‍हें सहज बनाने की पूरी कोशिश की, लेकिन वे नहीं हुई । वे मुम्‍बई में रहती हैं । मथुरा जा रही थीं । पता नहीं कौन-सी गांठ है जो इनसे जबरन अंग्रेजी ही बुलवाती है- पूरी तरह से अपनी बात न कहने की अक्षमता के बावजूद । दूसरा पक्ष इन अंग्रेजीदाओं का हर समय शिकायती लहजा । मानों ये और इनके पुरखे इस देश के लिए इतना कर गए हैं कि इन्‍हें शिकायत का जन्‍मजात अधिकार हासिल हो गया है । ये महिला नेशनल टेक्‍सटाइल में काम करती थीं । वही कम्‍पनी जो अपनी प्रशासनिक कारोबारी अक्षमताओं की खस्‍ताहाल से डूब गई है और छंटनी-दर-छंटनी के बावजूद बंद होने के कगार पर है ओर ये उसी के पेसे से फर्स्‍ट ए.सी. में बैठी अंग्रेजी में शिकायत झाड़ रही हैं । शिकायत तो देश को इनसे, इनकी अंग्रेजी ऐयाशी पर होनी चाहिए ।

इन सबके बीच याद आती है अमिताभ बच्‍चन के ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की । के.बी.सी. में अमिताभ की लोकप्रियता से भी ये सीख सकते हैं । न प्रश्‍न महत्‍त्‍वपूर्ण थे, न उनके उत्‍तर । महत्‍त्‍वपूर्ण था अमिताभ का नफासत के साथ हिन्‍दी  में बोलना, पूरे माहौल को सहज बनाना । न कोई बनावटी पन, न अहं, या रटे हुए वही-वही जुमले । दूसरों से न सीखें ये भाड़ू, अपनी बिरादरी से तो सीख ही सकते हैं ।

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